भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६५९ साधारमालयं पीठं भवाख्यं विभवात्मनाम् । देवानां मर्त्यधर्मस्थैः प्रतिष्ठायज्ञकर्मणि ॥ २९५ ॥ संसारदेवतानां च स्थापितानां तु वै पुरा । कृत्वा तु भगवद्विम्बमालये वा तदासने ॥ २९६ ॥ निवेशयति यो मोहाद् बिम्बेन सह तस्य वै । जायते च भयं घोरमिहामुष्मिकदोषदम् ॥ २९७ ॥ नाप्नोत्याराधकानां तु सकाशादर्चनं परम् । यथा बिम्बं तथा कर्ता नाप्नुयादुत्तमं फलम् ॥ २९८ ॥ विभवादेवानां प्रतिष्ठायज्ञे आधारालयपीठाद्यूक्तक्रमं विना केवलमर्त्यधर्मस्थैः सह स्वेच्छया विभिन्नमन्त्रतन्त्रलक्षणानि न कुर्यादिति, पूर्वं प्रतिष्ठितानां देवानामालये तदासने वा तेन बिम्बेन सह पुनस्तत्समभगवद्विम्बान्तरस्थापनं दोषावहमिति चाह— भिन्नमन्त्रक्रियारूपमित्यारभ्य नाप्नुयादुत्तमं फलमित्यन्तम् ॥ २९४-२९८ ॥ उनकी देखा-देखी अन्य लोग भिन्न मन्त्र एवं क्रिया रूप से प्रतिष्ठापना न करें । विभव देवताओं के प्रतिष्ठा यज्ञ में आधार, आलय एवं पीठ में उक्त क्रम को छोड़कर केवल मनुष्यों के साथ स्वेच्छापूर्वक विभिन्न मन्त्र-तन्त्रों वाला लक्षण न करें । पूर्व प्रतिष्ठित देवताओं के आलय में उनके आसन पर उस बिम्ब के साथ पुनः उनके समान अन्य भगवद्विम्ब का स्थापन दोषावह होता है । जो मोहवश पूर्व में स्थापित देवालय में उनके आसन पर अन्य बिम्बों का मोहवश स्थापन करता है उसे इस लोक में तथा परलोक में दोष उत्पन्न करने वाला महामोह होता है । ऐसा प्रतिष्ठित बिम्ब आराधकों के द्वारा किया गया अर्चन नहीं प्राप्त करता और जिस प्रकार बिम्ब निष्फल होता है उसी प्रकार कर्त्ता को भी कोई फल नहीं होता ॥ २९५-२९८ ॥ अर्चायामधिके पीठे ह्यपेक्षालक्षणोज्झिते । सकृद् विभवदेवानां स्थापनं न विरोधकृत् ॥ २९९ ॥ नान्यकाले न चान्यस्य नान्यमूर्तिनिवेशनम् । विहितं भगवत्पीठे निविष्टव्यत्ययं विना ॥ ३०० ॥ एकस्मिन् पीठे विभवदेवानां सकृत् स्थापनमविरुद्धम्, पुनरन्यकाले स्थापनम् अन्यस्य स्थापनम्, अन्यमूर्तिस्थापनं च न विहितमित्याह—अर्चायामिति द्वाभ्याम् । व्यत्ययं विनेत्यनेन पूर्वं स्थापनकाले स्थानाद्यव्यत्यये पुनर्यथाक्रमस्थापनं विहितमित्युक्तं भवति ॥ २९९-३०० ॥ यदि अर्चा में अपेक्षित लक्षण से पीठ का मान अधिक हो, तो उस एक पीठ पर उसी काल में एक विभव देव के साथ अन्य विभव देव का स्थापन

विरुद्ध नहीं होता । किन्तु स्थापन से अतिरिक्त काल में पूर्व स्थापित देवता से अन्य देवता के स्थापन का विधान विरुद्ध है । अतः भगवत्पीठ पर व्यत्यय के बिना पूर्व स्थापन काल में यथाक्रम स्थापन का ही विधान है ॥ २९९-३०० ॥ यथा भवोपकरणदेवानां मण्डलेऽर्चनम् । विहितं न तथा पीठे ह्येकस्मिन् सन्निवेशनम् ॥ ३०१ ॥ पूर्वोक्तचतुर्विंशतिभवोपकरणदेवतानां तु सर्वासामप्येकस्मिन्नेव मण्डले पूर्वं यथा सन्निवेशनमुक्तम्, तथैवास्मिन्नेव पीठे सन्निवेशनं न विहितमित्याह—यथेति ॥ ३०१ ॥ जिस प्रकार एक मण्डल में अनेक विभव देवों के अर्चन का विधान है उसी प्रकार एक पीठ पर अनेक विभव देवों का सन्निवेश भी विहित नहीं है ॥ ३०१ ॥ भिन्नक्रमोऽपि यः कुर्यात् पृथग् वा पिण्डिकोपरि । वामदक्षिणयोरेवं देवानाम्प्रदक्षिणम् ॥ ३०२ ॥ सदक्षिणस्य वै तेन प्रतिष्ठाख्यमखस्य च । निहिता चोन्नता कीर्तिस्तेनाथ स्वयमेव हि ॥ ३०३ ॥ सर्वप्रकारैरपि बिम्बानां पृथङ् निवेशनमेव कार्यमित्याह— भिन्नेत्यादिभिः ॥ ३०२-३०८ ॥ जो भिन्न क्रम से एक ही पिण्डिका (पीठों) पर (बायें को दाहिने और दायें को बायें) बिम्बों को स्थापित करता है, अथवा अलग-अलग पिण्डिका पर इस प्रकार स्थापित करता है, वह स्वयं ही प्रदक्षिण क्रम से स्थापित प्रतिष्ठामख की उन्नति तथा कीर्ति का विस्तार करता है ॥ ३०२-३०३ ॥ प्राक्स्थितस्याधिकं मानाद्दक्षिणेनोर्जहानिकृत् । जो पहले से प्रतिष्ठित है किन्तु मान से अधिक है उसकी प्रदक्षिणा करने से ऊर्जा की हानि होती है ॥ ३०४ ॥ शस्तमद्यतनस्यैव प्राक्स्थितं यत् ततोऽधिकम् ॥ ३०४ ॥ नेच्छत्यन्योन्यसाम्यं तु स्थानवृत्तिं धनैः सह । उन्नतासनसंस्थोऽपि मानहीनस्तु सर्वदा ॥ ३०५ ॥ उसकी अपेक्षा मान युक्त आज का स्थापित बिम्ब प्रशस्त है, अधिक भी है। जिस प्रकार एक ओर ऊँचे स्थान पर रहने वाला दूसरी ओर सर्वदा से मानहीन धन के कारण एक दूसरे से साम्य तथा स्थान परिवर्तन परस्पर मानहीन हो और ऊँचा हो यह सम्भव नहीं ॥ ३०४-३०५ ॥ मानहीनस्तु कर्तॄणां कुर्यात् सुतसुखक्षयम् ।

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६६१ बिम्बस्य बिम्बकर्तुर्वै देहिनां स्थापकस्य च ॥ ३०६ ॥ वामकृत्स्थापनं वामे सममूनं तु वाधिकम् । एवं ज्ञात्वा यथाशक्ति पृथक् कुर्यान्निवेशनम् ॥ ३०७ ॥ सिद्धये चापवर्गार्थमर्चना देवालये । मानहीन बिम्ब के स्थापित करने से बिम्ब कर्त्ता देही साधक तथा संस्थापक के सुत और सुख का क्षय होता है, इसी प्रकार बाईं ओर स्थापित की जाने वाली मूर्त्ति बाईं ओर स्थापित करने पर भी यदि मान में कम, अथवा अधिक हो, तो वह भी बिम्ब कर्त्ता स्थापक एवं देही साधक के सुत का एवं सुख का क्षय करती है । अतः बिम्ब को पृथक्-पृथक् सन्निवेश करे ॥ ३०६-३०७ ॥ प्रतोली साङ्गना चैव जगती देवमन्दिरम् ॥ ३०८ ॥ सपीठं भगवद्विम्बं भक्तानां यत्र युज्यते । सम्यक् प्रदक्षिणीकर्तुं बलिधूपपुरःसरम् ॥ ३०९ ॥ श्वेतद्वीपसमं विद्धि देवतायतनं तु तत् । सन्निवेशस्त्वयं मुख्यस्त्वमुख्यस्त्वपरो हि यः ॥ ३१० ॥ मुख्यात् पूर्णफलप्राप्तिर्मुख्याभासात् तथाविधा । प्रतोत्यादिभिः सहितं भगवन्मन्दिरं सपीठं भगवद्विम्बं च यत्र प्रदक्षिणीकर्तुं योग्यं भवति, तत्स्थानस्य श्वेतद्वीपसदृशमुख्यत्वम्, तत्प्रदक्षिणानवकाशस्थानस्या- मुख्यत्वं चाह—प्रतोलीति त्रिभिः ॥ ३०८-३११ ॥ जहाँ भक्तों की सिद्धि के लिये और उनकी मोक्ष प्राप्ति के लिये देवालय में अर्चना, प्रतोली, आँगन, जगती तथा देवमन्दिर है, पीठ सहित भगवद् बिम्ब है, बलिदान, धूपदानादि, पुरःसर प्रदक्षिणा के लिये सम्यक् स्थान है, वह देवतायतन श्वेतद्वीप के समान है । इस प्रकार सन्निवेश (प्रतिष्ठा स्थान) मुख्य है । इसके अतिरिक्त जहाँ प्रदक्षिणा के लिये अनवकाश हो वह स्थान अमुख्य (गौण) है । मुख्य से फल प्राप्ति होती है और मुख्याभास फलाभास होता है ॥ ३०८-३११ ॥ सम्यक्स्थास्त्वादिदेवीया मूर्तयो याः पुरोदिताः ॥ ३११ ॥ स्थूलं विना न चैवार्च्या नित्यं विप्रैस्तु बिम्बगाः । गृहे पीठगता बिम्बे पुनस्ताः पत्रगा बहिः ॥ ३१२ ॥ सदैव तैः समाराध्या भूतयेऽपि हि मुक्तये । ब्राह्मणैः पूर्वोक्तपरवासुदेवीयमूर्तीनां स्वगृहे मण्डलं विना बिम्बेष्वर्चनं कार्य- मिति, मण्डले तदर्चनस्थानविभागादिकं चाह—सम्यक्स्था इति द्वाभ्याम् । एवं च ब्राह्मणैरालये तद्बिम्बार्चनं कार्यमित्युक्तं भवति ॥ ३११-३१३ ॥

६६२ सात्वतसंहिता सवाहनाऽवाहना वा बहिर्वा स्वगृहान्तरे ॥ ३१३ ॥ नार्चनीया नृपाद्यैस्ता बिम्बे वे मण्डलादृते । क्षत्रियाद्यैस्तूभयत्रापि मण्डल एवार्चनं कार्यम्, न बिम्ब इत्याह— सवाहनेति ॥ ३११-३१४ ॥ सुपर्णसंस्थिताः सर्वे बिम्बा वै ब्राह्मणैर्नृपैः ॥ ३१४ ॥ स्वगृहादौ च सर्वत्र पूजनीयाः सदैव हि । ब्राह्मणैः क्षत्रियैश्च सुपर्णारूढा मूर्तयः स्वगृहेऽन्यत्र वा बिम्बेष्वेवार्चनीया इत्याह—सुपर्णेति ॥ ३१४-३१५ ॥ पूर्व में आदिदेव सम्बन्धिनी पर-वासुदेवादि की मूर्त्तियाँ यदि स्थूल न हों, तब वे अर्चन के योग्य नहीं होती । किन्तु ब्राह्मण पूर्वोक्त वासुदेवादि मूर्त्तियों की पूजा अपने घर पर मण्डल के बिना बिम्ब पर भी नित्य कर सकते हैं । घर के बाहर पत्र (वाहन) पर स्थित का भी कर सकते है । इस प्रकार उन्हें भूति के लिये अथवा मुक्ति के लिये सवाहना एवं अवाहना मूर्त्ति की बाहर और घर पर सर्वत्र पूजा करनी चाहिये । क्षत्रियादि को बाहर या घर पर उभयत्र मण्डल में ही अर्चना करनी चाहिये, बिम्ब पर नहीं । सुपर्ण पर स्थित बिम्बों की ब्राह्मण एवं क्षत्रियों दोनों को अपने घर पर अथवा सर्वत्र पूजा करनी चाहिये । इसी प्रकार वैश्यान्त सभी को सर्वत्र सभी की पूजा करनी चाहिये ॥ ३११-३१५ ॥ एवमन्यास्तु वैश्यान्तैः सत्तमैरखिलास्तु याः ॥ ३१५ ॥ सह शक्तीशभेदैस्तु न शक्तीशस्त्ववाहनः । बिम्बगो ब्राह्मणाद्यैश्च नित्यमर्च्यः पृथग्विना ॥ ३१६ ॥ एवं गरुडताक्ष्या॑रिरूढमूर्तयो विभवमूर्तिभेदैः सह ब्रह्मक्षत्रियवैश्यैर्बिम्बेष्वेव सर्व- त्रार्चनीयाः । किन्तु वाहनारूढं विना केवलशक्तीशबिम्बं गृहे ब्राह्मणादिभिर्नार्च्यमिति चाह—एवमिति सार्धेन ॥ ३१५-३१६ ॥ गरुड़ ताक्ष्यादि पर अधिरूढ़ मूर्त्तियाँ विभवादि मूर्त्ति भेद से बिम्ब में ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों को अर्चना करनी चाहिये । किन्तु वाहन पर आरूढ़ के बिना केवल शक्तीश बिम्ब की गृह पर ब्राह्मणादि अर्चन न करे ॥ ३१६ ॥ स्वाश्रमे बन्धुवर्गस्य मध्यस्थो ह्यनिशं तु वै । अविनासौम्यरूपेण अव्युत्पन्नजनस्य च ॥ ३१७ ॥ दृग्गते भगवद्वक्त्रे कार्ये त्रैलोक्यभीतिदे । यच्छन्ति शुभमात्रार्थाश्चित्रस्थाश्चाशुभं गृहे ॥ ३१८ ॥ बहिष्कृता विशेषेण हर्म्यप्रासादभूमिषु ।

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६६३ आढ्यैर्भोगपदस्थैस्तु साम्प्रतं सिद्धिलालसैः॥ ३१९ ॥ निष्प्रभत्वान्न मृच्छैली कार्या दारुमयी गृहे । ऋते सांन्यासिकैः शान्तैः शश्वन्मोक्षपरायणैः ॥ ३२० ॥ तदुत्थाश्च बहिः सर्वैः कार्यास्तासु सदैव हि । जनयन्ति महादीप्तिं चन्द्रसूर्यादयोऽनिशम् ॥ ३२१ ॥ गृहे सौम्यरूपं विनोग्ररूपबिम्बस्यानर्च्यत्वम्, तथैव चित्रलोहमयबिम्बं विना शैलमृद्दारुममयबिम्बस्यापि गृहस्थैरनर्च्यत्वम्, तस्य हेतुं चाह—स्वाश्रम इत्यारभ्य चन्द्र- सूर्यादयोऽनिशमित्यन्तम् ॥ ३१७-३२१ ॥ सौम्य रूप से बिना उग्र रूप वाला बिम्ब अर्चा के योग्य नहीं होता । इसी प्रकार चित्रमय एवं लौहमय बिम्ब के बिना शैल, मिट्टी और दारु का बनाया हुआ बिम्ब गृहस्थों द्वारा अर्चा के योग्य नहीं होता । समृद्धि एवं भोगपद पर स्थित सिद्धि की लालसा करने वालों गृहस्थों को सुवर्णमय प्रासाद भूमि में तथा गृह में निष्प्रभ होने के कारण शान्त प्रकृति वाले और निरन्तर मोक्ष की इच्छा रखने वाले सन्यासियों के अतिरिक्त मिट्टी की या शिला की तथा दारु की मूर्त्ति का निर्माण नहीं करना चाहिये । इसके अतिरिक्त अन्य पदार्थों द्वारा निर्मित मूर्त्ति चन्द्र, सूर्य के समान निरन्तर महादीप्ति प्रदान करती है ॥ ३१८-३२१ ॥ आ चैकमूर्तेः सर्वासां मूर्तीनां तु महामते । तथा मूर्त्यन्तराणां च प्रादुर्भावगणस्य च ॥ ३२२ ॥ प्रादुर्भावान्तराणां तु स्थितानां यत्र कुत्रचित् । सर्वेषां सर्वदा तेषां हित आराधनाय च ॥ ३२३ ॥ प्रणवः पीठपूजार्थं नमस्कारपदान्वितः । प्रसिद्धं चातुरात्मीयसंज्ञामन्त्रचतुष्टयम् ॥ ३२४ ॥ अर्चने सजितन्तं तु विना मन्त्रेण योऽन्यथा । करोति पूजनं मूढश्चलबिम्बगणस्य च ॥ ३२५ ॥ गृहे वाऽज्ञातमन्त्रस्य दोषस्तस्य प्रजायते । अथ यत्र कुत्र वा पुण्यक्षेत्रादिषु स्वयंव्यक्तादिरूपेण स्थितानां परव्यूहविभव- बिम्बानां सामान्यतः प्रणवेन वासुदेवादिमन्त्रचतुष्टयेन वा जितन्ताख्यमन्त्रेण वाऽ - र्च्यत्वं मन्त्रं विनाऽर्चने प्रत्यवायं चाह—आ चेति सार्द्धैश्चतुर्भिः । एकमूर्तेः परवासु- देवस्य, सर्वासां मूर्तीनां व्यूहवासुदेवादिमूर्तीनाम्, मूर्त्यन्तराणां केशवादीनाम्, प्रादुर्भावगणस्य पद्मनाभादिविभवावतारगणस्य, प्रादुर्भावान्तराणां विभवान्तराणा- मित्यर्थः । तद्विवरणं तु नवमपरिच्छेदे विचारितं द्रष्टव्यम् ॥ ३२२-३२६ ॥ एक मूर्त्ति (पर वासुदेव), सभी मूर्त्ति (व्यूह वासुदेवादि मूर्त्ति), मूर्त्यन्तर

६६४ | सात्वतसंहिता (केशवादि मूर्त्ति), प्रादुर्भावगण (पद्मनाभादि मूर्त्ति, प्रादुर्भावान्तर विभवान्तर मूर्त्ति) अथवा जहाँ कहीं स्वयं व्यक्त मूर्त्तियों की पूजा, हित के लिये तथा आराधना के लिये, सामान्यतः प्रणव से युक्त वासुदेवादि संज्ञा मन्त्र चतुष्टय से अथवा जितन्ताख्य मन्त्र से ही करनी चाहिये ॥ ३२२-३२६ ॥ विना सामान्यमन्त्रैर्यश्चलबिम्बगतस्य च॥ ३२६ ॥ कुर्याद् विशेषमन्त्रेण विशेषाख्यस्य चार्चनम्। तदुत्थमचिरेणैव शबलं तस्य दोषकृत्॥ ३२७ ॥ ज्ञातैवं सावधानेन क्रियासक्तेन सर्वदा। भवितव्यं विशेषाद् वै गृहाश्रमपरेण तु॥ ३२८ ॥ गृहे चलबिम्बानां प्रणवाष्टाक्षरादिम(न्त्रा:?न्त्रैः) नानातत्तन्मूर्त्तिविशेषमन्त्रै- रर्चननिषेधमाह—विनेति सार्द्धद्वाभ्याम् । सामान्यमन्त्रैर्व्यापकमन्त्रैरित्यर्थः प्रणवाष्टाक्षर-द्वादशाक्षर-षडक्षर-जितन्ताख्यमन्त्रैरिति यावत्, एषां सर्वमूर्त्ति- साधारण्यात् ॥ ३२६-३२८ ॥ चल बिम्ब की प्रणव से और अष्टाक्षर से एवं नाना तत्तन्मूर्त्ति मन्त्र विशेष से अर्चना न करे, सामान्य मन्त्र से ही इनकी पूजा करे । विशेष मूर्त्तियों की विशेष मन्त्र से पूजा करे । जो इसके विपरीत पूजन करता है उसे प्रत्यवाय (हानि) होता है । ऐसा समझ कर क्रियासक्त गृहस्थाश्रमी को विशेष रूप से पूजा में सावधानी करनी चाहिये ॥ ३२६-३२८ ॥ जीर्णोद्धारविधानम् क्ष्माभङ्गाद्येषु दोषेषु ध्वजान्तेष्वेवमेव हि। उपोद्धारे प्रयोक्तव्यं प्रणवाद्यं च पञ्चकम्॥ ३२९ ॥ होमार्चनविधानेषु सृष्टिसंहारकर्मणि। ध्वजाद्यमुद्धरेत् सर्वमवनीचलने सति ॥ ३३० ॥ आधारोपलपर्यन्तं सन्निवेश्य तथा पुनः। अथ क्ष्माभङ्गादिदोषसंभवे प्रासादपीठबिम्बादीनां जीर्णोद्धारविधानमाह—क्ष्मा- भङ्गाद्येषु दोषेष्वित्यारभ्य देवस्य चतुरात्मन इत्यन्तम् । प्रणवाद्यं पञ्चकं प्रणवाष्टा- क्षरादिव्यापकमन्त्रपञ्चकमित्यर्थः । अथवा पूर्वोक्तं वासुदेवादिंसंज्ञामन्त्रजितन्ताख्य- पञ्चकमित्यर्थः । अत्र जालवदित्यनेन यथा वनमध्ये मृगग्रहणार्थं जालप्रसारेण कृते सर्वे मृगास्तत्र प्रविशन्ति, तद्वत् स्वहृदयाद् बिम्बादिषु मन्त्रप्रसारणे कृते तत्रत्या मन्त्राः सर्वेऽपि तत्र प्रविशन्तीति भावो बोद्ध्यते । अगाधेऽम्भसि निक्षिपेदिति मानुष- बिम्बविषयम्, स्वयंव्यक्तादिबिम्बानां सर्वथा संधेयत्वोक्त्या ह्यपरित्याज्यत्वात् । अत्र बहवो विचारा ईश्वरपारमेश्वरादिषूपबृंहिता द्रष्टव्याः ॥ ३२९-३४६ ॥

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६६५ अब भूचलादि के कारण प्रासाद पीठ और बिम्ब का जीर्णोद्धार कहते हैं— क्षमाभङ्ग (भूदोल) आदि दोष में तथा ध्वजादि के फटने पर उसके उद्धार में प्रणवादि पञ्चक मन्त्र का प्रयोग करे। भूचाल आने पर होमार्चन विधान से सृष्टि के संहार कर्म में ध्वजादि का उद्धार करे ॥ ३२९-३३१ ॥ चक्रप्रासादभङ्गेषु सोर्ध्वं बिम्बं महामते ॥ ३३१ ॥ पीठभङ्गे तु वै बिम्बं बिम्बभङ्गे तदैव हि। यद्यदिच्छति चोद्धर्तुं तत्तदादौ तु संयजेत् ॥ ३३२ ॥ हे महामते! चक्र प्रासाद के भङ्ग हो जाने पर आधार से लेकर उपल पर्यन्त पुनः बिम्ब का सन्निवेश करे। पीठ भङ्ग में और बिम्ब तथा बिम्बभङ्ग में भी वही कार्य करे। जिसका-जिसका उद्धार करना चाहता हो, आदि में उसी-उसी का संयजन करे ॥ ३३१-३३२ ॥ मध्वाज्यगुग्गुलुक्षीरदधिलाजादिभिः क्रमात् । सन्तर्प्य तिलहोमैस्तु सहस्रशतसंख्यया ॥ ३३३ ॥ मधु, आज्य, गुग्गुलु, क्षीर, दधि, लावा तथा तिल आदि का ग्यारह सौ की संख्या में हवन कर सन्तर्पण करे ॥ ३३३ ॥ मन्त्रौघं हृदयात् तस्मिन् समुच्चार्य विनिक्षिपेत् । जालवद् भासुराकारं तत्र चिच्छक्तयोऽखिलाः ॥ ३३४ ॥ विशन्ति पूर्वसंरुद्धा मन्त्रौघं पुनराहरेत्। पाठयेदृङ्मयान् सर्वानुत्तिष्ठेत्यथ तद्विदः ॥ ३३५ ॥ जिस प्रकार वन के मध्य में मृग-ग्रहण के लिये जाल फैला देने पर सभी मृग उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार अपने हृदय से बिम्बादि पर्यन्त मन्त्र फैला देने पर वहाँ रहने वाले सभी मन्त्र उसमें आकर प्रवेश कर जाते हैं। इसके बाद साधक को ऋग्वेदियों से 'उत्तिष्ठ' इत्यादि सभी ऋग्वेद की ऋचाओं का पाठ कराना चाहिए ॥ ३३४-३३५ ॥ कर्म्मारम्भे तदन्ते वै परमां प्रकृतिं त्विति । चतुर्भिरनिरुद्धाद्यैः संज्ञामन्त्रैः पृथक् पृथक् ॥ ३३६ ॥ कृत्वा होमं च तदनु तत्संज्ञार्णैर्विलोमतः । प्रणवाद्यन्तगैः सर्वैः प्राग्वदष्टासु दिक्षु च ॥ ३३७ ॥ कर्म के आरम्भ में अथवा उसके अन्त में 'परमां प्रकृतिं' आदि का पाठ करावे। फिर अनिरुद्धादि चार संज्ञा मन्त्रों से पृथक्-पृथक् होम कराकर पुनः उन संज्ञा मन्त्रों का विलोम कर उससे पाठ करावे। फिर पूर्व की भाँति प्रासाद के सा० सं० - 46

६६६ सात्वतसंहिता आठों दिशाओं में प्रणवादि एवं प्रणवान्त सभी मन्त्रों से होम करे। उसी प्रकार गायत्री मन्त्र से होम करे ॥ ३३६-३३७ ॥ प्रासादस्य तु होतव्यं गायत्रीभिस्तथैव च। वासुदेवाद्यभिज्ञाभिर्होमान्ते त्वथ तैः सह ॥ ३३८ ॥ न्यासं वाहनमन्त्रेण साङ्गं कृत्वात्मना पुरा। वाहनानां तथा चैव ब्रह्मैव संस्पृशेदथ ॥ ३३९ ॥ सञ्चाल्य हृदयेनैवं जपन्नस्त्रमथोद्धरेत्। विमाने वा रथे कृत्वा ह्यगाधेऽम्भसि निक्षिपेत् ॥ ३४० ॥ फिर होम के अन्त में वासुदेवादि मन्त्रों के साथ वाहन मन्त्र से साङ्गन्यास करे। फिर 'वाहनानां तथा चैव' इस मन्त्र से ब्रह्म का संस्पर्श करे। फिर हृदय (नमः) मन्त्र से बिम्ब संचालन करे और अस्त्र मन्त्र पढ़ते हुये उसे उठाकर विमान अथवा रथ पर स्थापित कर अगाध जल में उसे छोड़ देवे। विमर्श—यह प्रक्षेप मानुष बिम्ब विषयक है, स्वयं व्यक्तादि बिम्ब का सर्वथा संधान ही उचित है। उसका परित्याग उचित नहीं है ॥ ३३८-३३९ ॥ जपेत् संज्ञामनुं पश्चात् प्रायश्चित्तार्थमेव हि। सहस्त्रमेकमर्धं तद्धोतव्यं सर्वशान्तये ॥ ३४१ ॥ पूर्ववत् तोषयेत् सर्वान् काञ्चनाद्यैः स्वशक्तितः। तर्पयेदन्नपानाद्यैः सर्वानार्चायपूर्वकन् ॥ ३४२ ॥ फिर प्रक्षेप के पश्चात् संज्ञा मन्त्र का जप करे। तदनन्तर सर्वशान्ति के लिये एक सहस्र पाँच सौ (१५००) मन्त्रों से होम करे। अपनी शक्ति के अनुसार काञ्चनादि तथा अन्नपानादि से सभी आचार्यादि को सन्तुष्ट करे ॥ ३४१-३४२ ॥ वाच्यं तैर्द्वादशार्णेन ह्यच्छिद्रं हृष्टमानसैः। भूयः संस्थापनं कुर्याद्विहृतस्य कृतस्य च ॥ ३४३ ॥ फिर वे लोग प्रसन्न होकर द्वादशाक्षर मन्त्र पढ़ते हुये 'अच्छिद्रमस्तु' ऐसा कहें। फिर नवीन निर्मित बिम्ब का, उस स्थान पर सामान्य लक्षण मन्त्रों से अथवा चतुर्मूर्ति मन्त्रों से पुनः संस्थापन करे ॥ ३४३ ॥ सामान्यलक्षणैर्मन्त्रैश्चतुर्मूर्तिमयैः सदा। गुरुः सप्रणवेनैव यः सम्यग् भगवन्मयः ॥ ३४४ ॥ यतः सप्रणवादन्यश्चतुरात्म्यं च विद्यते। मन्त्रो वा देवतारूपस्तत्त्वतो ब्रह्मवेदिनाम् ॥ ३४५ ॥ प्रपञ्चः प्रणवो मन्त्रो देवस्य चतुरात्मनः।

यतः गुरु प्रणव के साथ सम्यग् भगवन्मय है । इतना ही नहीं सप्रणव भगवन्मय के अतिरिक्त कोई चातुरात्म्य नहीं है और ब्रह्मवेत्ताओं के लिये मन्त्र ही तत्त्वतः देवता का स्वरूप है और यह प्रणव मन्त्र ही चतुरात्मा देवता का प्रपञ्च है ॥ ३४४-३४६ ॥ एवं ज्ञात्वा पुरा कर्म स्थापनोत्थापनान्तिकम् ॥ ३४६ ॥ विधिवद् यागपूर्वं तु बिम्बसञ्चालनं विना । यो दिव्यायतनादीनां भक्त्या भूयः करोति च ॥ ३४७ ॥ ध्वजं वा मन्दिरं शुभ्रं पीठं भासं च पिण्डिकाम् । सलोहशैलकाष्ठोत्थैः पद्माद्यैरूर्ध्वतोऽङ्किताम् ॥ ३४८ ॥ एकानेकद लैश्चैव बद्धैरायसपूर्वकैः । सुबद्धां सूर्यसोमाग्निप्रभाढ्यां सुमनोरमाम् ॥ ३४९ ॥ स लोके शाश्वतीं कीर्तिं स्थापयित्वा कुलैः सह । स्थानं सायुज्यतापूर्वमन्ते नूनमवाप्नुयात् ॥ ३५० ॥ एवं शास्त्रज्ञानपूर्वकं प्रतिष्ठाजीर्णोद्धारादिकर्तुः फलमाह—एवमिति सार्धै- श्र्चतुर्भिः ॥ ३४६-३५० ॥ ऐसा समझ कर जो जीर्णोद्धारकर्त्ता भक्तिपूर्वक, शास्त्रज्ञानपूर्वक, यागपूर्वक, दिव्यायतनादि का स्थापन से लेकर उत्थापनान्त कर्म बिम्ब संचालन के बिना पुनः संपन्न करता है वह दिव्यायतन का उद्धार करता है । ध्वज, मन्दिर, शुभ पीठ, भास तथा पिण्डिका को सल्लोह से, शिला से या काष्ठ से और कमलादि का चिह्न बनाता है उस पीठिका को लौहादि द्वारा सुबद्ध करता है । सूर्य, सोम और अग्नि की तरह उसे प्रदीप्त कर मनोरम बनाता है । ऐसा जीर्णोद्धारकर्त्ता आराधक इस लोक में शाश्वती कीर्ति स्थापित कर अपने कुल के साथ निश्चय ही अन्त में सायुज्यता का स्थान प्राप्त करता है ॥ ३४४-३५० ॥ नानारत्नप्रभाढ्यानि लाञ्छनान्यङ्गदानि च । निर्मितानि सुवर्णाद्यैर्विभोः संयोजयन्ति ये ॥ ३५१ ॥ ते धौतकल्मषाः सर्वे देहमासाद्य पावनम् । सम्यग् ज्ञानेन युज्यन्ते भवं नायान्ति येन च ॥ ३५२ ॥ भगवते नानामणिभयभूषणरत्नकवचादिसमर्पणकर्तुः फलमाह— नानेत्यादिभिः ॥ ३५१-३५५ ॥ जो आराधक विभु विष्णु को सुवर्णादि निर्मित नाना रत्नजड़ित देदीप्यमान आभूषणों से सुसज्जित करते हैं, उनके समस्त कालुष्य धुल जाते हैं । तदनन्तर वे पवित्र देह प्राप्त कर सम्यग् ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । उनका इस संसार में पुनः आना सम्भव नहीं होता ॥ ३५१-३५२ ॥

६६८ सात्वतसंहिता आत्मनश्चोपकाराय सर्वदुःखानिवृत्तये । अङ्गुष्ठाग्राच्च गुल्फान्तमाजान्वंसावधीह वा ॥ ३५३ ॥ मणिमुक्ताप्रवालाढ्यकवचं काञ्चनादिकम् । यः क्षिपत्यतिभक्त्या वै स्वशक्त्यार्चागतेऽच्युते ॥ ३५४ ॥ स याति परमं स्थानं सपुत्रपशुबान्धवः । अपने उपकार के लिये एवं सभी प्रकार के दुःखों की निवृत्ति के लिये अङ्गुष्ठाग्र से गुल्फ पर्यन्त जानु से लेकर कन्धा पर्यन्त, मणि, मुक्ता एवं प्रवाल जड़ित कवच तथा काञ्चनादि से अथवा अपनी शक्ति के अनुसार जो भक्त भक्ति के अनुसार उन विष्णु की अर्चा करता है वह वैष्णव भक्त पुत्र, पशु, बान्धव सहित परम पद को प्राप्त करता है ॥ ३५३-३५४ ॥ लग्नं यद्भगवन्मूर्ताविङ्गदं नूपुरादिकम् ॥ ३५५ ॥ वियोजयति यो मोहात् तस्य वीचौ स्थिरा स्थितिः । भगवद्भूषणापहर्तुः फलमाह—लग्नमिति ॥ ३५५-३५६ ॥ जो भगवन्मूर्ति में पधराये गये अङ्गद एवं नूपुरादि आभूषणों की चोरी करता है वह वीची नामक नरक में निरन्तर निवास करता है ॥ ३५५ ॥ यः पञ्चकालसक्तानां विप्राणामधिकारिणाम् ॥ ३५६ ॥ पञ्चरात्रविदां चैव द्विजानां सिद्धिकाङ्क्षिणाम् । अथ योऽच्छिन्नशाखानां नारायणरतात्मनाम् ॥ ३५७ ॥ तपस्विनां वा व्रतिनां स्नातकब्रह्मचारिणाम् । भक्तानामथवाऽन्येषां मार्जनादौ रतात्मनाम् ॥ ३५८ ॥ प्रीतये परमेशाय कृत्वा सम्यक् प्रयच्छति । शालाद्यायतनोपेतमश्मपक्वेष्टकान्वितम् ॥ ३५९ ॥ ग्राम्यैर्धान्यैस्तथारण्यैः पूर्णं सद्वृत्तिसंयुतम् । वणिक्कुटुम्बभृतकरक्षापालैः समन्वितम् ॥ ३६० ॥ सोऽन्तं फलमाप्नोति कालमाचन्द्रतारकम् । संस्थितिं शाश्वतीं लोके प्राप्नुयादक्षयं यशः ॥ ३६१ ॥ भागवतानामग्रहारादिप्रदातुः फलमाह—य इत्यादिभिः ॥ ३५६-३६१ ॥ जो पाँचों काल पूजा में निरत अधिकारी ब्राह्मणों को, पञ्चरात्र वेत्ताओं को, सिद्धि चाहने वाले ब्राह्मणों को, जिनकी वेद शाखा उच्छिन्न नहीं हुई है ऐसे वैदिकों को, नारायण-परायणों को, तपस्वियों को, व्रत धारण करने वालों को, स्नातकों एवं ब्रह्मचारियों को, भक्तों को, अथवा भगवन्मन्दिरों के मार्जनादि कार्य में

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६६९ लगे हुये अन्य लोगों को परमेश्वर की प्रीति के लिये, पत्थर या पके हुये ईंटों से युक्त आयतनों को तथा शाला आदि का निर्माण कर उसे ग्रामधान्य और अरण्यधान से पूर्ण कर सद्वृत्ति, वणिक्, कुटुम्ब, सेवक, रक्षपाल आदि से संयुक्त कर देता है वह अन्त में जब तक चन्द्रमा और तारागण विद्यमान हैं तावत्काल पर्यन्त उत्तम लोक में शाश्वती संस्थिति प्राप्त करता है और अक्षय यश भी प्राप्त करता है ॥ ३५६-३६१ ॥ भोगोपभोगिनीं भद्रां रम्यां पूर्वोक्तलक्षणाम् । यागनिष्पत्तये कुर्याद् योऽग्रतः पीठसन्निधेः ॥ ३६२ ॥ पूजोपकरणानां समर्पणफल कथनम् बहिराराधनार्थं वा कर्मिणां ब्रह्मयाजिनाम् । मनुष्यपितृदेवाख्यान्मुच्यते स ऋणत्रयात् ॥ ३६३ ॥ भद्रपीठबलिपीठग्रामारामक्षेत्रगोगजरथाश्वादीनां दीपस्थाल्यादिपूजोपकरणानां च समर्पणफलान्याह— भोगोपभोगिनीमित्यादिभिः ॥ ३६२-३७७ ॥ अब भद्रपीठ, बलिपीठ, ग्रामाराम क्षेत्र, गौ, गज, रथ, अश्व, दीप, स्थाल्यादि पूजोपकरणों का विष्णु के लिये समर्पण का फल कहते हैं—जो पीठ सन्निधान में, यागनिष्पत्ति के लिये, पीठ के आगे, भोगोपभोगिनी पूर्वोक्त लक्षणा भद्रा का निर्माण करता है, अथवा ब्रह्म याजी जीवों के लिये बाहर आराधना के लिये भद्रा का निर्माण करता है, वह मनुष्य, पितर और देव इन तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है ॥ ३६२-३६३ ॥ मध्यतो गरुडाक्रान्तं सचक्राम्बुरुहाङ्कितम् । तुर्याश्रमथवा वृत्तं कुण्डवत्पदवीयुतम् ॥ ३६४ ॥ बलिपीठं बहिः कुर्याद् भक्त्या यस्त्वच्युतालये । स याति चाच्युतं स्थानं विमानैरिन्दुवर्चसैः ॥ ३६५ ॥ जो भक्तिपूर्वक अच्युत के मन्दिर के मध्य में, अथवा बाहर, गरुडाक्रान्त चक्र और कमल के चिहं से अति चौकोर, अथवा कुण्ड की तरह वृत्त (गोला) के आकार का 'बलिपीठ' निर्माण करता है वह चन्द्रमा के समान सुन्दर विमान से अच्युत के स्थान को प्राप्त करता है ॥ ३६४-३६५ ॥ यः सप्राकारमारामं सम्प्रयच्छति वै विभोः । नानापुष्पफलोपेतं वापीद्रुमसमाकुलम् ॥ ३६६ ॥ साब्जतोयाशयोपेतं मारखड्गसमन्वितम् । स नन्दनवने भोगान् भुक्त्वा यात्यच्युतालयम् ॥ ३६७ ॥

६७० सात्वतसंहिता जो प्राकार (=चहारदीवारी) से युक्त है नाना पुष्प फलोपेत, वापी, वृक्ष समन्वित कमल और जलाशय से संयुक्त मारवङ्ग समन्वित उद्यान बनवाकर विष्णु को समर्पित कर देता है वह नन्दनवन में सभी प्रकार के भोगों को भोगकर विष्णु लोक को जाता है ॥ ३६६-३६७ ॥ क्षोणीं यः सस्यसम्पूर्णां युक्तां वा गन्धशालिना । केदारं जलपातैस्तु परिच्छन्नं समन्ततः ॥ ३६८ ॥ संयच्छति जगद्योनेः कालमासाद्य शाश्वतम् । स यायात् सुसितद्वीपं तत्रास्ते भगवानिव ॥ ३६९ ॥ जो हरे भरे जल से परिपूर्ण, सुगन्धशाली एवं धान्य से युक्त पृथ्वी को तथा नहर से चारो ओर सिञ्चित की जाने वाली क्यारियों को विष्णु के लिये समर्पित करता है । वह समय पाकर सदैव के लिये श्वेतद्वीप चला जाता है और वहाँ विष्णु के समान निवास करता है ॥ ३६८-३६९ ॥ स्नानोपभोगमन्त्रार्थं सवृषेन्द्रं तु गोगणम् । समर्पयित्वा योऽर्चां वै वैष्णवीं प्रतिपादयेत् ॥ ३७० ॥ सोऽचिरन्मुक्तदोषस्तु विष्णुलोकं प्रयाति च । जो स्नान उपभोग तथा मन्त्र के लिये महावृषभ सहित गो समूहों का अर्चन कर विष्णु की अर्चा के लिये दान में देता है, वह शीघ्र ही सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और विष्णु लोक प्राप्त कर लेता है ॥ ३७०-३७१ ॥ गजं रथं वराश्वं च दीपस्थालीं सुलक्षणाम् ॥ ३७१ ॥ व्यजनं चामरं छत्रं वाद्यं गणिकागणम् । शुभ्रवस्त्राणि नेत्राणि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ३७२ ॥ वितानं वैजयन्तीं च चित्रपत्रलतागणम् । सुस्वरामुपघण्टां च धूपस्थालीं सुलक्षणाम् ॥ ३७३ ॥ भृङ्गारं दर्पणं तोयकुम्भं गन्धोपलं महत् । पूर्वोद्दिष्टानि चान्यानि धान्यानि विविधानि च ॥ ३७४ ॥ यो ददाति हरेर्भक्त्या स तल्लोकमवाप्नुयात् । ईक्षमाणं विभोर्वक्त्रं वहन्तं दीपभाजनम् ॥ ३७५ ॥ हाथी, रथ, श्रेष्ठ घोड़ा, सुलक्षणा दीप, स्थाली, पङ्खा, चामर, छत्र, वाद्य, गणिकाओं का समूह, शुभ्र वस्त्र, नेत्र, दिव्य आभरण, वितान (चाँदनी), वैजयन्ती चित्र, पत्र, लतायें, सुन्दर स्वर करने वाली क्षुद्र घण्टिकायें, सुलक्षणा धूपस्थाली, भृङ्गार, दर्पण, जलकलश, गन्धोपल (कस्तूरी), पूर्वकथित अन्य अन्य विविध

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६७१ धान्य इन सभी वस्तुओं को जो भक्तिपूर्वक विष्णु को प्रदान करता है वह विष्णु लोक प्राप्त करता है ॥ ३७२-३७५ ॥ महान्तमथवा दीपं यन्त्रं कूर्मादिरूपधृक्। शरयज्ञासनस्थं च चित्रसम्पुटभूषितम्॥ ३७६ ॥ सच्छास्त्रपीठं विविधं श्रद्धया यो महामते। ददाति देवदेवस्य स तत्स्थानं प्रयाति च॥ ३७७ ॥ भगवान् का मुख देखते हुये महान् दीप भाजन वहन करते हुये, ऐसे चित्र का, अथवा भगवान् का मुख देखते हुये केवल दीप वहन करते हुये चित्र को अथवा कूर्मादि रूप धारण करने वाले यन्त्र को, अथवा सरपत के आसन पर संस्थापित चित्र सम्पुट भूषित विविध सच्छास्त्र पीठ (रेहल) का दान जो वैष्णव साधक श्रद्धापूर्वक विष्णु को देता है । हे महामते! वह देव देव विष्णु के लोक को प्राप्त करता है ॥ ३७६-३७७ ॥ पुरस्कृत्य जगद्योनिं यद्यद् भक्त्या प्रदीयते । तदाराधनसक्तानां तत्तदक्षय्यतामियात्॥ ३७८ ॥ भगवत्सन्निधौ भागवतेभ्यः प्रदानफलमाह—पुरस्कृत्येति ॥ ३७८ ॥ इस प्रकार आराधक वैष्णव भगवान् के सन्निधान में जो-जो वस्तु भक्तिपूर्वक प्रदान करता है उस-उस आराधन में आसक्त भक्त को वह-वह वस्तु अक्षय होकर प्राप्त होती है ॥ ३७८ ॥ इति सम्बोधितो विप्रा लोकधर्मव्यवस्थिताः । लाङ्गली देवदेवेन सर्वानुग्रहकाम्यया ॥ ३७९ ॥ मया प्राप्तं जगद्धातुः प्रसादान्मोक्षसिद्धये । यथावदथ सर्वेषामग्रतः प्रकटीकृतम्॥ ३८० ॥ इदं शास्त्रं सर्वानुग्रहार्थं भगवता वासुदेवेन सङ्कर्षणायोपदिष्टं मया भग- वत्प्रसादाल्लब्धं भवतामप्यग्रे यथावत् प्रकाशितम् । तदिदमास्तिकेभ्यः प्रकाशनीयं नास्तिकेभ्यो गोपनीयम्, तथा प्रकाशगोपने यः करोति स तु ममापि मान्यो भवति, भवतामैहिकामुष्मिकरूपं निरवधिकं स्वस्त्यस्तु, अहं व्रजामिति भगवान् नारदो मुनीन् प्रत्युपदिष्टवानित्याह—इतीति ॥ ३७९-३८४ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये पञ्चविंशः परिच्छेदः ॥ २५ ॥ — 𑁍 ❀ 𑁍 —

६७२ सात्वतसंहिता हे लोकधर्म में व्यवस्थित ब्राह्मणो! देवाधिदेव भगवान् ने सभी के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से सङ्कर्षण के लिये यह शास्त्र प्रकाशित किया । मैंने भी मोक्ष सिद्धि के लिये यह शास्त्र भगवान् की प्रसन्नता से प्राप्त किया और आप लोगों के सामने प्रकाशित किया है ॥ ३७९-३८० ॥ परं पापहरं पुण्यं पावनं सद्धिभूतिदम् । इदं भव्याशयानां च वक्तव्यं भावितात्मनाम् ॥ ३८१ ॥ भक्तानामप्रमत्तानां पुण्डरीकाक्षसेविनाम् । धर्मापवर्गसत्कीर्तिसाधुसङ्गाभिलाषिणाम् ॥ ३८२ ॥ भोगेप्सूनाभक्तानां वाक्छलादिरतात्मनाम् । अन्यायेनोपसन्नानां नास्तिकानां विशेषतः ॥ ३८३ ॥ यो गोपायत्ययोग्यानां योग्यानां सम्प्रयच्छति । इममर्थं स मान्यो मे स्वस्ति वोऽस्तु व्रजाम्यहम्॥ ३८४ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां प्रतिष्ठाविधिर्नाम पञ्चविंशः परिच्छेदः ॥ २५ ॥ — ☙ ❊ ❧ — यह पापहर है, पुण्य प्रदान करने वाला है, पावन है और सद् विभूति प्रदान करने वाला है । यह शास्त्र भवितात्मा भव्याशयों से, अप्रमत्त भक्तों से, विष्णु की सेवा करने वालों से, धर्म एवं अपवर्ग, सत्कीर्ति साधु के सङ्ग की अभिलाषा करने वालों से ही प्रकाशित करना चाहिये । जो भोग की इच्छा करने वाले हैं, भगवद् भक्त नहीं हैं उनसे, जो वाक्छल में निरत हैं उनसे, अन्यायपूर्वक समीप आये हैं उनसे, विशेष कर नास्तिकों से, यह शास्त्र कदापि प्रकाशित न करे । इस प्रकार जो अयोग्यों से इस शास्त्र का संगोपन करता है और योग्यों को प्रकाशित करता है अर्थात् इस शास्त्र के प्रकाशन और संगोपन दोनों विधियों को जानता है, वह मेरा भी सम्मान्य होता है । आप लोगों का ऐहिक एवं आमुष्मिक रूप निरवधिक स्वास्ति हो । भगवान् नारद मुनियों को इस प्रकार उपदेश कर चले गये ॥ ३८१-३८४ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के प्रतिष्ठाविधि नामक पच्चीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २५ ॥ — ☙ ❊ ❧ —

भाष्यगतग्रन्थग्रन्थकारानुक्रमणिका अनिरुद्धसंहिता ७८, १९२ | गर्गकुलीनरामानुजः २० अमरकोशः ८२, ९९, १५४, २७९, | गरुडपुराणम् १९१ २९१, २२७, ५०५, ६२१, ६२२ | गुणरत्नकोशव्याख्यानम् २० अष्टाङ्गहृदयः ३९५ | चन्द्रिका १८९ अहिर्बुध्न्यसंहिता ४२, १७३, २१३, २१५ | छान्दोग्योपनिषद् १३२, ३५० आगमप्रामाण्यम् ३७२ | जयाख्यसंहिता ८, १३, १६, २५, २८, आचार्यहृदयम् २१४ | ७५, ७७, ८०, ८८, ९६, ९७, आदित्यपुराणम् ४६१ | ९८, १००, १०३, १०५, १०६, आपस्तम्बधर्मसूत्रम् १४६ | १११, १२८, १३४, १७८, १८५, ईश्वर(संहिता)तन्त्रम् १३, २४, २५, | १९७, २०१, २२०, २३६, २५५, ३२, ३४, ६९, ७८, ९०, ९१, | २९८, ३०५, ३०६, ३१३, ३२९, ९४, ९६, ९८, १००, १०३, १०६, | ३३०, ३३८, ३४३, ३५०, ३५१, १०८, १०९, १२०, १२४, १३०, | ३५५, ३५७, ३६२, ३६४, ३६६, १३१, १३२, १७५, १७८, १८५, | ३७२, ४३१, ४३२, ४५३, ४६०, २१३, २१७, २९१, २९२, ३०५, | ४८५, ४९२, ४९३, ४९८, ५०६ ३०६, ३२५, ३२८, ३३२, ३५०, | जैमिनिः ३६९ ३६५, ४३२, ४३४, ४६२, ६३६, | तत्त्वत्रयव्याख्यानम् २१, १९७, २१३, ६३८, ६३९, ६४१, ६४६, ४६०, | २१५ ४६२, ६६५, ६७२ | तैत्तिरीयसंहिता ६४६ ईश्वरपारमेश्वरसंहिते २३, २५, | तैत्तिरीयोपनिषद् २० ७१-७४, ७६, ८०, ८३, ८६-८८, | दक्षः १३१ ९०-९५, ९८, १०६, ११०-११२, | दर्शानिर्णयः १८९ १२०, १२७, १२२, १२७, १८५, | दिव्यप्रबन्धः ५०५ २१३, २६८, ३५७ | धातुपाठः १०३, २७६, ६१२ ईश्वरसंहिताव्याख्यानम् १२१, २८८ | निगमान्तदेशिकः १५८ एकायनश्रुतिः १, १३ | निघण्टुः (वैद्यकशास्त्रम्) ६२१, ६२२ कठोपनिषद् ६ | नित्यग्रन्थः १२१, १२५, १२७ कपिञ्जलसंहिता ८१ | नित्यव्याख्यानम् ३४६ क्रियादीपः १२१ | नित्याराधनप्रकरणम् १५९, ४६२

६७४ सात्वतसंहिता नित्यार्चनकारिका १६३ | १६७, २१२, २१८, २८८, २९१, नृसिंहः १, ११७ | ३११, ३२२, ३५७, ४२७, ५८५, नैघण्टुकाः ४२७ | ६०८, ६२८, ६४६, ६४७, ६५७, पराशरः (विष्णुपुराणम् ) १३१ | ६६५, ६६६, ६६७, ६६९ पराशरभट्टारकः १०, ११, २६१ | पौष्करसंहिता १३, १००, १२२, पाञ्चरात्ररक्षा २५, ९६, १२३, १२६, | १२६, १७३, १७५, २१३, २१५, १२८-१३१, १३३, ३५०, ३७२, | २१६, २२६, २२७, २६१, २६२, ४६२, ५०६, ५१०, ५२२ | २६४-२७२, २७४, २७६, २७७, पाणिनिः ५०८ | २७८, २८०, २८१, २८२, २८६, पाद्मसंहिता २३, ७२, ७५-७९, ८३, | २८७, २८८, २९८, ३७२, ५८५, ८५, ९२, ११३, १२३, १२७, | ५८६ १२८, १३९, १४१, १४२, १७४, | प्रपन्नामृतम् ४६३ १७६, २२७, ४६०, ४६१, ४६२, | प्रयोगपद्धतिरत्नावली २४० ४६५, ४८५, ५००, ५०४, ५०६, | ब्रह्मसूक्तम् ८४, ८५ ५०८, ५०९ | ब्रह्मसूत्रम् १५८ पारमेश्वरसंहिता २३, ६९, ७१-७३, | ब्रह्माण्डपुराणम् १३८ ७६, ८३, ८४, ८६, ९०, ९३, | ब्रह्मोपनिषत् १३ ९४, ११०, १११, ११५, १२०, | भगवद्गीता १५८, १२९, १९६ १२१, १२३, १२७, १५६, १६४, | भागवतपुराणम् १३८, १९६, २१६, १६६-१६८, १७१, १७३, १७८, | २२७, ५१२ १७९, १८५, २१८, २२६, २२७, | भारद्वाजसंहिता ४६३ २३६, २३९, २४७, २५०, २५१, | भाष्यकारः १२१, १२५, १२७, २५५, २८८, २९१, २९२, २९७, | १३२, १६४, ३५०, ४६२, ४६३ २९८, ३०५, ३१०, ३११, ३२२- | भोजराजः २४० ३२४, ३२६, ३३१, ३४०, ३४६, | मनुः १२६, १२७ ३४७, ३४९, ३५१, ३५५, ३५७, | महाभारतम् ३२, २१४, ४६२ ३७१, ३७६, ४२२, ४२७-४२९, | महोपनिषद् ८४, ८५ ४३१, ४३२, ४७३, ४७६, ४८९, | मुण्डकोपनिषद् ६, १५८ ५०४, ५०६, ५२२, ५८४, ५८५, | मुनिभावप्रकाशिका २१६ ५९१, ६०८, ६१०, ६१५, ६१७, | याज्ञवल्क्यः १३१ ६२०-६२२, ६२६-६२८, ६३७, | योगानन्दः १ ६३८, ६४५-६४८, ६५२, ६५४, | रङ्गराजस्तवव्याख्यानम् २० ६६४, ६७१, ६७२ | रम्यजामातृमुनिः २१३ पारमेश्वरप्रयोग ८३, ११० | लक्ष्मीतन्त्रम् १०, ११, १५, ३७, पारमेश्वरव्याख्यानम् २३, ७२, ८७-८८, | ४६, ५३, ५४, ६५, ७२, ७६, १०२, १०३, ११३, १२२, १२८, | ८६, ८८, ९०, ९१, ९८, १९७,

भाष्यगतग्रन्थग्रन्थकारानुक्रमणिका ६७५ २०५, २०७, २०८, २१२, २१३, | श्रीभाष्यम् १६४ २२१, २२३, ४५४, ४९० | श्रीभाष्यकारः १३२, १२५ वङ्गिवंशेश्वरः १६३, १५९ | श्रुतिः १२५, १२७, १५८ वरदराजस्तवव्याख्यानम् २० | संहितान्तरम् ३५०, ५०६, ६२७ विष्णुचित्तीयम् २७० | सच्चरित्ररक्षा ८५, ११५, ११७, विष्णुपुराणम् ११८, २१४, २५८, | १२२, १२४, १३२, १३८, २६६, २६८, २६९, | १५९, २४०, ४६० २७८, ४०२ | समाराधनग्रन्थः ३५० विष्वक्सेनंसंहिता २१३-२१५ | सम्प्रदायप्रदीपिका १२१ वेदान्ताचार्यः १३३ | सहस्रनामभाष्यम् १०, २१४, २१६, वैकुण्ठाभरणः ५०५ | २२१, २६१, २६७, २७३ वैजयन्ती (कोशः) २६, ७२, १७०, | सात्त्वतामृतम् ८०, ११०, १६३, २८१, ४२७, ६१८, ६७० | १६९, १७८, ४३४, ४३७, वैद्यक ग्रन्थाः | ४८५, ४८९, ५४७, ५९६ शठकोपः ५०५ | सिद्धान्तचन्द्रिका ८५, ४६१, ४६२, शाण्डिल्यस्मृतिः १३०, ३३७, | ४८५ ५०४-५०५ | स्मृतिः १५८ — ❦ —

The provided image is completely overexposed/faded (blank white), making the printed text entirely washed out and illegible for accurate transcription. Please provide a clearer scan or photo of this page with proper contrast and lighting.

श्लोकार्थानुक्रमणिका अकण्टकद्रुमोत्थाश्च ५०६ | अग्रपर्वार्धमानेन ५६० अकस्मादुपसन्नानां ५०९ | अग्राह्येणाथ वपुषा ४४९ अकामानां सकामाना- १४९ | अङ्गनादिकसंसार- ३०१ अकारपूर्वो हान्तश्च २९ | अङ्गभावगतत्वाच्च ६०४ अकारस्त्वप्यये चैव ४८२ | अङ्गसङ्गं तदीयं च ६८ अकाराक्षरनालं तु ५३ | अङ्गाङ्गिभावगुणवद् ५५३ अकाराक्षरमूलं तु ५३ | अङ्गारराशिसदृशं ३०७ अकाराद्यो विसर्गान्तः १६ | अङ्गारारण्यर्चिषश्चैव १०८ अकालमूलनिर्गर्भं ४२३ | अङ्गुलाद् द्विकलान्तं तु ५५८ अक्लिष्टकर्मा देवेश- २७५ | अङ्गुलादष्टभागो यः ५५६ अक्षसूत्रकरो मन्त्री ४०६ | अङ्गुलिद्वितयेनैव १४३ अक्षस्थबीजं तदनु ६२ | अङ्गुलीयरूपं च १०६ अक्षस्थमक्षरं नाभे- ५१ | अङ्गुष्ठद्वितयाद् यावत् २७ अक्षस्थमुद्धरेत् पूर्वं १७ | अङ्गुष्ठमङ्गुलं चाग्रात् ५६० अक्षस्थं नाभिपूर्वं च ५१ | अङ्गुष्ठाग्राच्च गुल्फान्त- ६६८ अक्षस्थं षोडशं नाभे- ६१ | अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं ३६३ अक्षाद् दक्षिणदिक्संस्थं २१० | अङ्गुष्ठायामतुल्याऽथ ५६४ अक्षान्तर्गतमादाय ५८ | अचलं योगपट्टेन १३० अखण्डनाय नित्यस्य ३१९ | अचिरादेव भविनां १३५ अग्निकार्योपयोगीनि ९८ | अच्छिन्नधूपप्रसरं ३७५ अग्निगेहेऽथ संस्कृत्य ४३४ | अच्छिन्नप्रसरं धूपं ३८९ अग्नीनामेकदेहानां १०९ | अजस्य नाभावध्येक- ५९२ अग्नीशरक्षोवायव्य- ३५६ | अजस्य नाभावित्यादि- ६३८ अग्नीषोममयीं मूर्तिं २७४ | अज्ञातानां विशेषेण ३८६ अग्नीषोममयो देह ३१४ | अज्ञानखण्डनपदं ५४० अग्नीषोमौ समीकृत्य ३०२,६४५ | अज्ञानगहनेनैव ६३५ अग्रतो मूलदेशाच्च ५८२ | अज्ञानं व्यापकत्वं च ४३९ अग्रतो हासमायाति ५६९ | अञ्जनं सशलाकं च ८९ अग्रदेशेऽथ बिम्बस्य ६४० | अञ्जनाद्रिप्रतीकाशं ५६

६७८ सात्वतसंहिता अञ्जनाशमप्रतीकाशं ३५९ | अथ कर्मात्मतत्त्वे तु ३५ अणिमादिगुणैर्युक्तं ३२९ | अथ कामोपभोगात् तु ४१० अणिमाद्यष्टकं चापि ३४० | अथ केसरकोटिस्थं २२५ अणिमाद्यष्टकं चैव २०७ | अथ क्रमोदितैः कुम्भै- ६२९ अत ऊर्ध्वं तिर्यगाभि- ५९० | अथ क्षमामण्डलोर्ध्वस्थ- ४४१ अतन्द्रितः सदा कुर्याद् ५०२ | अथ तेषां क्रमात् कुर्या- ११८ अतश्च विहितं यत्नात् ४२१ | अथ त्रितययुक्तस्य १८३ अतसीपुष्पसङ्काशं ५६ | अथ त्रिविक्रमं देवं १८५ अतसीपुष्पसंकाशः २७० | अथ दक्षिणदिग्भागे ६०८ अतस्तद् रक्षणीयं च ४५५ | अथ दर्शकशब्दं तु ५३५ अतस्तस्य स्वमन्त्रेण ४०८ | अथ दामोदरान्ताभि- १८१ अतस्तु यद्यत् संवेद्यं ४४९ | अथ द्वितीयदशमा- ४० अतिशुद्धाशयत्वेन ५८ | अथ द्वितीयं दशमात् ४२ अतृप्तमशनं कुर्या- ३३७ | अथ द्वितीयं नवमात् ६१ अतोऽधः संस्थिताः सर्वे ६०९ | अथ द्वितीयं नवमान्ना- १७ अतोऽन्यथा न दोषोऽस्ति ५०७ | अथ नाभितृतीयेन ४२ अतोऽन्यथा यदुद्दिष्ट- २०५ | अथ नाभितृतीयं तु ३८२ अतोऽन्यथा समाश्रित्य ५७२ | अथ नाभिद्वितीयेन ४१, ४९, ६२ अतोऽन्यमस्तका कीर्ति- ५५१ | अथ नाभैर्यदादिस्थं ४२ अतोऽन्ये दृढमूलाश्च ५४३ | अथ नारायणं देवं २८२ अतोऽन्येषां तु भक्तानां ४६६ | अथ निद्रायमाणं तु ६३९ अतोऽन्वितांशमेकं तु ६४० | अथ पाणिद्वयेनैव ४३० अतो ब्रह्मपदादीषद् ६४५ | अथ प्रणवपूर्वेण ३५० अतो य आश्रयः क्ष्माद्यः ४३९ | अथ प्रत्येकतेजोंऽशा- १७३ अतः पुरोदितेनैव ४३५ | अथ प्रद्युम्नमन्त्रं तु १३१ अतः प्रणालं विहितं ५८३ | अथ बद्धशिखो मौनी ३८७ अतः समाचरेद् यत्नाद् ५७२ | अथ भिन्नतनोर्मन्त्रं ४८ अतः सव्यभिचारं तु ११८ | अथ मङ्गलकुम्भाना- ७४ अत्र चित्रमयं विद्धि ५४२ | अथ मण्टपमध्ये तु ६४८ अत्र राजोपचारैस्तु १८६ | अथ मण्डलदृष्टस्य ४९१ अत्रापि पूर्वमेवोक्तं ३८ | अथ मन्त्रचतुष्कं तु ३९ अत्रापि पूर्ववद् दृष्ट्या ५६१ | अथ मन्त्रवरस्यास्य २४ अत्रापि वेष्टनाद् विद्धि ५६३ | अथ मन्त्रवराद् धर्म- ४०४ अत्रैकैका परिज्ञेया ४८२ | अथ मन्त्राकृतिं स्वां वै ४१० अथ ऊर्ध्वं इदं चोक्त्वा ४९६ | अथ मार्गद्वयं त्यक्त्वा ४६८