सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६६ सात्वतसंहिता आठों दिशाओं में प्रणवादि एवं प्रणवान्त सभी मन्त्रों से होम करे। उसी प्रकार गायत्री मन्त्र से होम करे ॥ ३३६-३३७ ॥ प्रासादस्य तु होतव्यं गायत्रीभिस्तथैव च। वासुदेवाद्यभिज्ञाभिर्होमान्ते त्वथ तैः सह ॥ ३३८ ॥ न्यासं वाहनमन्त्रेण साङ्गं कृत्वात्मना पुरा। वाहनानां तथा चैव ब्रह्मैव संस्पृशेदथ ॥ ३३९ ॥ सञ्चाल्य हृदयेनैवं जपन्नस्त्रमथोद्धरेत्। विमाने वा रथे कृत्वा ह्यगाधेऽम्भसि निक्षिपेत् ॥ ३४० ॥ फिर होम के अन्त में वासुदेवादि मन्त्रों के साथ वाहन मन्त्र से साङ्गन्यास करे। फिर 'वाहनानां तथा चैव' इस मन्त्र से ब्रह्म का संस्पर्श करे। फिर हृदय (नमः) मन्त्र से बिम्ब संचालन करे और अस्त्र मन्त्र पढ़ते हुये उसे उठाकर विमान अथवा रथ पर स्थापित कर अगाध जल में उसे छोड़ देवे। विमर्श—यह प्रक्षेप मानुष बिम्ब विषयक है, स्वयं व्यक्तादि बिम्ब का सर्वथा संधान ही उचित है। उसका परित्याग उचित नहीं है ॥ ३३८-३३९ ॥ जपेत् संज्ञामनुं पश्चात् प्रायश्चित्तार्थमेव हि। सहस्त्रमेकमर्धं तद्धोतव्यं सर्वशान्तये ॥ ३४१ ॥ पूर्ववत् तोषयेत् सर्वान् काञ्चनाद्यैः स्वशक्तितः। तर्पयेदन्नपानाद्यैः सर्वानार्चायपूर्वकन् ॥ ३४२ ॥ फिर प्रक्षेप के पश्चात् संज्ञा मन्त्र का जप करे। तदनन्तर सर्वशान्ति के लिये एक सहस्र पाँच सौ (१५००) मन्त्रों से होम करे। अपनी शक्ति के अनुसार काञ्चनादि तथा अन्नपानादि से सभी आचार्यादि को सन्तुष्ट करे ॥ ३४१-३४२ ॥ वाच्यं तैर्द्वादशार्णेन ह्यच्छिद्रं हृष्टमानसैः। भूयः संस्थापनं कुर्याद्विहृतस्य कृतस्य च ॥ ३४३ ॥ फिर वे लोग प्रसन्न होकर द्वादशाक्षर मन्त्र पढ़ते हुये 'अच्छिद्रमस्तु' ऐसा कहें। फिर नवीन निर्मित बिम्ब का, उस स्थान पर सामान्य लक्षण मन्त्रों से अथवा चतुर्मूर्ति मन्त्रों से पुनः संस्थापन करे ॥ ३४३ ॥ सामान्यलक्षणैर्मन्त्रैश्चतुर्मूर्तिमयैः सदा। गुरुः सप्रणवेनैव यः सम्यग् भगवन्मयः ॥ ३४४ ॥ यतः सप्रणवादन्यश्चतुरात्म्यं च विद्यते। मन्त्रो वा देवतारूपस्तत्त्वतो ब्रह्मवेदिनाम् ॥ ३४५ ॥ प्रपञ्चः प्रणवो मन्त्रो देवस्य चतुरात्मनः।