भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 724

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६६५ अब भूचलादि के कारण प्रासाद पीठ और बिम्ब का जीर्णोद्धार कहते हैं— क्षमाभङ्ग (भूदोल) आदि दोष में तथा ध्वजादि के फटने पर उसके उद्धार में प्रणवादि पञ्चक मन्त्र का प्रयोग करे। भूचाल आने पर होमार्चन विधान से सृष्टि के संहार कर्म में ध्वजादि का उद्धार करे ॥ ३२९-३३१ ॥ चक्रप्रासादभङ्गेषु सोर्ध्वं बिम्बं महामते ॥ ३३१ ॥ पीठभङ्गे तु वै बिम्बं बिम्बभङ्गे तदैव हि। यद्यदिच्छति चोद्धर्तुं तत्तदादौ तु संयजेत् ॥ ३३२ ॥ हे महामते! चक्र प्रासाद के भङ्ग हो जाने पर आधार से लेकर उपल पर्यन्त पुनः बिम्ब का सन्निवेश करे। पीठ भङ्ग में और बिम्ब तथा बिम्बभङ्ग में भी वही कार्य करे। जिसका-जिसका उद्धार करना चाहता हो, आदि में उसी-उसी का संयजन करे ॥ ३३१-३३२ ॥ मध्वाज्यगुग्गुलुक्षीरदधिलाजादिभिः क्रमात् । सन्तर्प्य तिलहोमैस्तु सहस्रशतसंख्यया ॥ ३३३ ॥ मधु, आज्य, गुग्गुलु, क्षीर, दधि, लावा तथा तिल आदि का ग्यारह सौ की संख्या में हवन कर सन्तर्पण करे ॥ ३३३ ॥ मन्त्रौघं हृदयात् तस्मिन् समुच्चार्य विनिक्षिपेत् । जालवद् भासुराकारं तत्र चिच्छक्तयोऽखिलाः ॥ ३३४ ॥ विशन्ति पूर्वसंरुद्धा मन्त्रौघं पुनराहरेत्। पाठयेदृङ्मयान् सर्वानुत्तिष्ठेत्यथ तद्विदः ॥ ३३५ ॥ जिस प्रकार वन के मध्य में मृग-ग्रहण के लिये जाल फैला देने पर सभी मृग उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार अपने हृदय से बिम्बादि पर्यन्त मन्त्र फैला देने पर वहाँ रहने वाले सभी मन्त्र उसमें आकर प्रवेश कर जाते हैं। इसके बाद साधक को ऋग्वेदियों से 'उत्तिष्ठ' इत्यादि सभी ऋग्वेद की ऋचाओं का पाठ कराना चाहिए ॥ ३३४-३३५ ॥ कर्म्मारम्भे तदन्ते वै परमां प्रकृतिं त्विति । चतुर्भिरनिरुद्धाद्यैः संज्ञामन्त्रैः पृथक् पृथक् ॥ ३३६ ॥ कृत्वा होमं च तदनु तत्संज्ञार्णैर्विलोमतः । प्रणवाद्यन्तगैः सर्वैः प्राग्वदष्टासु दिक्षु च ॥ ३३७ ॥ कर्म के आरम्भ में अथवा उसके अन्त में 'परमां प्रकृतिं' आदि का पाठ करावे। फिर अनिरुद्धादि चार संज्ञा मन्त्रों से पृथक्-पृथक् होम कराकर पुनः उन संज्ञा मन्त्रों का विलोम कर उससे पाठ करावे। फिर पूर्व की भाँति प्रासाद के सा० सं० - 46