भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 726

यतः गुरु प्रणव के साथ सम्यग् भगवन्मय है । इतना ही नहीं सप्रणव भगवन्मय के अतिरिक्त कोई चातुरात्म्य नहीं है और ब्रह्मवेत्ताओं के लिये मन्त्र ही तत्त्वतः देवता का स्वरूप है और यह प्रणव मन्त्र ही चतुरात्मा देवता का प्रपञ्च है ॥ ३४४-३४६ ॥ एवं ज्ञात्वा पुरा कर्म स्थापनोत्थापनान्तिकम् ॥ ३४६ ॥ विधिवद् यागपूर्वं तु बिम्बसञ्चालनं विना । यो दिव्यायतनादीनां भक्त्या भूयः करोति च ॥ ३४७ ॥ ध्वजं वा मन्दिरं शुभ्रं पीठं भासं च पिण्डिकाम् । सलोहशैलकाष्ठोत्थैः पद्माद्यैरूर्ध्वतोऽङ्किताम् ॥ ३४८ ॥ एकानेकद लैश्चैव बद्धैरायसपूर्वकैः । सुबद्धां सूर्यसोमाग्निप्रभाढ्यां सुमनोरमाम् ॥ ३४९ ॥ स लोके शाश्वतीं कीर्तिं स्थापयित्वा कुलैः सह । स्थानं सायुज्यतापूर्वमन्ते नूनमवाप्नुयात् ॥ ३५० ॥ एवं शास्त्रज्ञानपूर्वकं प्रतिष्ठाजीर्णोद्धारादिकर्तुः फलमाह—एवमिति सार्धै- श्र्चतुर्भिः ॥ ३४६-३५० ॥ ऐसा समझ कर जो जीर्णोद्धारकर्त्ता भक्तिपूर्वक, शास्त्रज्ञानपूर्वक, यागपूर्वक, दिव्यायतनादि का स्थापन से लेकर उत्थापनान्त कर्म बिम्ब संचालन के बिना पुनः संपन्न करता है वह दिव्यायतन का उद्धार करता है । ध्वज, मन्दिर, शुभ पीठ, भास तथा पिण्डिका को सल्लोह से, शिला से या काष्ठ से और कमलादि का चिह्न बनाता है उस पीठिका को लौहादि द्वारा सुबद्ध करता है । सूर्य, सोम और अग्नि की तरह उसे प्रदीप्त कर मनोरम बनाता है । ऐसा जीर्णोद्धारकर्त्ता आराधक इस लोक में शाश्वती कीर्ति स्थापित कर अपने कुल के साथ निश्चय ही अन्त में सायुज्यता का स्थान प्राप्त करता है ॥ ३४४-३५० ॥ नानारत्नप्रभाढ्यानि लाञ्छनान्यङ्गदानि च । निर्मितानि सुवर्णाद्यैर्विभोः संयोजयन्ति ये ॥ ३५१ ॥ ते धौतकल्मषाः सर्वे देहमासाद्य पावनम् । सम्यग् ज्ञानेन युज्यन्ते भवं नायान्ति येन च ॥ ३५२ ॥ भगवते नानामणिभयभूषणरत्नकवचादिसमर्पणकर्तुः फलमाह— नानेत्यादिभिः ॥ ३५१-३५५ ॥ जो आराधक विभु विष्णु को सुवर्णादि निर्मित नाना रत्नजड़ित देदीप्यमान आभूषणों से सुसज्जित करते हैं, उनके समस्त कालुष्य धुल जाते हैं । तदनन्तर वे पवित्र देह प्राप्त कर सम्यग् ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । उनका इस संसार में पुनः आना सम्भव नहीं होता ॥ ३५१-३५२ ॥