भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 727

६६८ सात्वतसंहिता आत्मनश्चोपकाराय सर्वदुःखानिवृत्तये । अङ्गुष्ठाग्राच्च गुल्फान्तमाजान्वंसावधीह वा ॥ ३५३ ॥ मणिमुक्ताप्रवालाढ्यकवचं काञ्चनादिकम् । यः क्षिपत्यतिभक्त्या वै स्वशक्त्यार्चागतेऽच्युते ॥ ३५४ ॥ स याति परमं स्थानं सपुत्रपशुबान्धवः । अपने उपकार के लिये एवं सभी प्रकार के दुःखों की निवृत्ति के लिये अङ्गुष्ठाग्र से गुल्फ पर्यन्त जानु से लेकर कन्धा पर्यन्त, मणि, मुक्ता एवं प्रवाल जड़ित कवच तथा काञ्चनादि से अथवा अपनी शक्ति के अनुसार जो भक्त भक्ति के अनुसार उन विष्णु की अर्चा करता है वह वैष्णव भक्त पुत्र, पशु, बान्धव सहित परम पद को प्राप्त करता है ॥ ३५३-३५४ ॥ लग्नं यद्भगवन्मूर्ताविङ्गदं नूपुरादिकम् ॥ ३५५ ॥ वियोजयति यो मोहात् तस्य वीचौ स्थिरा स्थितिः । भगवद्भूषणापहर्तुः फलमाह—लग्नमिति ॥ ३५५-३५६ ॥ जो भगवन्मूर्ति में पधराये गये अङ्गद एवं नूपुरादि आभूषणों की चोरी करता है वह वीची नामक नरक में निरन्तर निवास करता है ॥ ३५५ ॥ यः पञ्चकालसक्तानां विप्राणामधिकारिणाम् ॥ ३५६ ॥ पञ्चरात्रविदां चैव द्विजानां सिद्धिकाङ्क्षिणाम् । अथ योऽच्छिन्नशाखानां नारायणरतात्मनाम् ॥ ३५७ ॥ तपस्विनां वा व्रतिनां स्नातकब्रह्मचारिणाम् । भक्तानामथवाऽन्येषां मार्जनादौ रतात्मनाम् ॥ ३५८ ॥ प्रीतये परमेशाय कृत्वा सम्यक् प्रयच्छति । शालाद्यायतनोपेतमश्मपक्वेष्टकान्वितम् ॥ ३५९ ॥ ग्राम्यैर्धान्यैस्तथारण्यैः पूर्णं सद्वृत्तिसंयुतम् । वणिक्कुटुम्बभृतकरक्षापालैः समन्वितम् ॥ ३६० ॥ सोऽन्तं फलमाप्नोति कालमाचन्द्रतारकम् । संस्थितिं शाश्वतीं लोके प्राप्नुयादक्षयं यशः ॥ ३६१ ॥ भागवतानामग्रहारादिप्रदातुः फलमाह—य इत्यादिभिः ॥ ३५६-३६१ ॥ जो पाँचों काल पूजा में निरत अधिकारी ब्राह्मणों को, पञ्चरात्र वेत्ताओं को, सिद्धि चाहने वाले ब्राह्मणों को, जिनकी वेद शाखा उच्छिन्न नहीं हुई है ऐसे वैदिकों को, नारायण-परायणों को, तपस्वियों को, व्रत धारण करने वालों को, स्नातकों एवं ब्रह्मचारियों को, भक्तों को, अथवा भगवन्मन्दिरों के मार्जनादि कार्य में