सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६६९ लगे हुये अन्य लोगों को परमेश्वर की प्रीति के लिये, पत्थर या पके हुये ईंटों से युक्त आयतनों को तथा शाला आदि का निर्माण कर उसे ग्रामधान्य और अरण्यधान से पूर्ण कर सद्वृत्ति, वणिक्, कुटुम्ब, सेवक, रक्षपाल आदि से संयुक्त कर देता है वह अन्त में जब तक चन्द्रमा और तारागण विद्यमान हैं तावत्काल पर्यन्त उत्तम लोक में शाश्वती संस्थिति प्राप्त करता है और अक्षय यश भी प्राप्त करता है ॥ ३५६-३६१ ॥ भोगोपभोगिनीं भद्रां रम्यां पूर्वोक्तलक्षणाम् । यागनिष्पत्तये कुर्याद् योऽग्रतः पीठसन्निधेः ॥ ३६२ ॥ पूजोपकरणानां समर्पणफल कथनम् बहिराराधनार्थं वा कर्मिणां ब्रह्मयाजिनाम् । मनुष्यपितृदेवाख्यान्मुच्यते स ऋणत्रयात् ॥ ३६३ ॥ भद्रपीठबलिपीठग्रामारामक्षेत्रगोगजरथाश्वादीनां दीपस्थाल्यादिपूजोपकरणानां च समर्पणफलान्याह— भोगोपभोगिनीमित्यादिभिः ॥ ३६२-३७७ ॥ अब भद्रपीठ, बलिपीठ, ग्रामाराम क्षेत्र, गौ, गज, रथ, अश्व, दीप, स्थाल्यादि पूजोपकरणों का विष्णु के लिये समर्पण का फल कहते हैं—जो पीठ सन्निधान में, यागनिष्पत्ति के लिये, पीठ के आगे, भोगोपभोगिनी पूर्वोक्त लक्षणा भद्रा का निर्माण करता है, अथवा ब्रह्म याजी जीवों के लिये बाहर आराधना के लिये भद्रा का निर्माण करता है, वह मनुष्य, पितर और देव इन तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है ॥ ३६२-३६३ ॥ मध्यतो गरुडाक्रान्तं सचक्राम्बुरुहाङ्कितम् । तुर्याश्रमथवा वृत्तं कुण्डवत्पदवीयुतम् ॥ ३६४ ॥ बलिपीठं बहिः कुर्याद् भक्त्या यस्त्वच्युतालये । स याति चाच्युतं स्थानं विमानैरिन्दुवर्चसैः ॥ ३६५ ॥ जो भक्तिपूर्वक अच्युत के मन्दिर के मध्य में, अथवा बाहर, गरुडाक्रान्त चक्र और कमल के चिहं से अति चौकोर, अथवा कुण्ड की तरह वृत्त (गोला) के आकार का 'बलिपीठ' निर्माण करता है वह चन्द्रमा के समान सुन्दर विमान से अच्युत के स्थान को प्राप्त करता है ॥ ३६४-३६५ ॥ यः सप्राकारमारामं सम्प्रयच्छति वै विभोः । नानापुष्पफलोपेतं वापीद्रुमसमाकुलम् ॥ ३६६ ॥ साब्जतोयाशयोपेतं मारखड्गसमन्वितम् । स नन्दनवने भोगान् भुक्त्वा यात्यच्युतालयम् ॥ ३६७ ॥