भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 729

६७० सात्वतसंहिता जो प्राकार (=चहारदीवारी) से युक्त है नाना पुष्प फलोपेत, वापी, वृक्ष समन्वित कमल और जलाशय से संयुक्त मारवङ्ग समन्वित उद्यान बनवाकर विष्णु को समर्पित कर देता है वह नन्दनवन में सभी प्रकार के भोगों को भोगकर विष्णु लोक को जाता है ॥ ३६६-३६७ ॥ क्षोणीं यः सस्यसम्पूर्णां युक्तां वा गन्धशालिना । केदारं जलपातैस्तु परिच्छन्नं समन्ततः ॥ ३६८ ॥ संयच्छति जगद्योनेः कालमासाद्य शाश्वतम् । स यायात् सुसितद्वीपं तत्रास्ते भगवानिव ॥ ३६९ ॥ जो हरे भरे जल से परिपूर्ण, सुगन्धशाली एवं धान्य से युक्त पृथ्वी को तथा नहर से चारो ओर सिञ्चित की जाने वाली क्यारियों को विष्णु के लिये समर्पित करता है । वह समय पाकर सदैव के लिये श्वेतद्वीप चला जाता है और वहाँ विष्णु के समान निवास करता है ॥ ३६८-३६९ ॥ स्नानोपभोगमन्त्रार्थं सवृषेन्द्रं तु गोगणम् । समर्पयित्वा योऽर्चां वै वैष्णवीं प्रतिपादयेत् ॥ ३७० ॥ सोऽचिरन्मुक्तदोषस्तु विष्णुलोकं प्रयाति च । जो स्नान उपभोग तथा मन्त्र के लिये महावृषभ सहित गो समूहों का अर्चन कर विष्णु की अर्चा के लिये दान में देता है, वह शीघ्र ही सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और विष्णु लोक प्राप्त कर लेता है ॥ ३७०-३७१ ॥ गजं रथं वराश्वं च दीपस्थालीं सुलक्षणाम् ॥ ३७१ ॥ व्यजनं चामरं छत्रं वाद्यं गणिकागणम् । शुभ्रवस्त्राणि नेत्राणि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ३७२ ॥ वितानं वैजयन्तीं च चित्रपत्रलतागणम् । सुस्वरामुपघण्टां च धूपस्थालीं सुलक्षणाम् ॥ ३७३ ॥ भृङ्गारं दर्पणं तोयकुम्भं गन्धोपलं महत् । पूर्वोद्दिष्टानि चान्यानि धान्यानि विविधानि च ॥ ३७४ ॥ यो ददाति हरेर्भक्त्या स तल्लोकमवाप्नुयात् । ईक्षमाणं विभोर्वक्त्रं वहन्तं दीपभाजनम् ॥ ३७५ ॥ हाथी, रथ, श्रेष्ठ घोड़ा, सुलक्षणा दीप, स्थाली, पङ्खा, चामर, छत्र, वाद्य, गणिकाओं का समूह, शुभ्र वस्त्र, नेत्र, दिव्य आभरण, वितान (चाँदनी), वैजयन्ती चित्र, पत्र, लतायें, सुन्दर स्वर करने वाली क्षुद्र घण्टिकायें, सुलक्षणा धूपस्थाली, भृङ्गार, दर्पण, जलकलश, गन्धोपल (कस्तूरी), पूर्वकथित अन्य अन्य विविध