भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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विरुद्ध नहीं होता । किन्तु स्थापन से अतिरिक्त काल में पूर्व स्थापित देवता से अन्य देवता के स्थापन का विधान विरुद्ध है । अतः भगवत्पीठ पर व्यत्यय के बिना पूर्व स्थापन काल में यथाक्रम स्थापन का ही विधान है ॥ २९९-३०० ॥ यथा भवोपकरणदेवानां मण्डलेऽर्चनम् । विहितं न तथा पीठे ह्येकस्मिन् सन्निवेशनम् ॥ ३०१ ॥ पूर्वोक्तचतुर्विंशतिभवोपकरणदेवतानां तु सर्वासामप्येकस्मिन्नेव मण्डले पूर्वं यथा सन्निवेशनमुक्तम्, तथैवास्मिन्नेव पीठे सन्निवेशनं न विहितमित्याह—यथेति ॥ ३०१ ॥ जिस प्रकार एक मण्डल में अनेक विभव देवों के अर्चन का विधान है उसी प्रकार एक पीठ पर अनेक विभव देवों का सन्निवेश भी विहित नहीं है ॥ ३०१ ॥ भिन्नक्रमोऽपि यः कुर्यात् पृथग् वा पिण्डिकोपरि । वामदक्षिणयोरेवं देवानाम्प्रदक्षिणम् ॥ ३०२ ॥ सदक्षिणस्य वै तेन प्रतिष्ठाख्यमखस्य च । निहिता चोन्नता कीर्तिस्तेनाथ स्वयमेव हि ॥ ३०३ ॥ सर्वप्रकारैरपि बिम्बानां पृथङ् निवेशनमेव कार्यमित्याह— भिन्नेत्यादिभिः ॥ ३०२-३०८ ॥ जो भिन्न क्रम से एक ही पिण्डिका (पीठों) पर (बायें को दाहिने और दायें को बायें) बिम्बों को स्थापित करता है, अथवा अलग-अलग पिण्डिका पर इस प्रकार स्थापित करता है, वह स्वयं ही प्रदक्षिण क्रम से स्थापित प्रतिष्ठामख की उन्नति तथा कीर्ति का विस्तार करता है ॥ ३०२-३०३ ॥ प्राक्स्थितस्याधिकं मानाद्दक्षिणेनोर्जहानिकृत् । जो पहले से प्रतिष्ठित है किन्तु मान से अधिक है उसकी प्रदक्षिणा करने से ऊर्जा की हानि होती है ॥ ३०४ ॥ शस्तमद्यतनस्यैव प्राक्स्थितं यत् ततोऽधिकम् ॥ ३०४ ॥ नेच्छत्यन्योन्यसाम्यं तु स्थानवृत्तिं धनैः सह । उन्नतासनसंस्थोऽपि मानहीनस्तु सर्वदा ॥ ३०५ ॥ उसकी अपेक्षा मान युक्त आज का स्थापित बिम्ब प्रशस्त है, अधिक भी है। जिस प्रकार एक ओर ऊँचे स्थान पर रहने वाला दूसरी ओर सर्वदा से मानहीन धन के कारण एक दूसरे से साम्य तथा स्थान परिवर्तन परस्पर मानहीन हो और ऊँचा हो यह सम्भव नहीं ॥ ३०४-३०५ ॥ मानहीनस्तु कर्तॄणां कुर्यात् सुतसुखक्षयम् ।