सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ सात्वतसंहिता वह उपदेश विवेक प्रदान करने वाला है और सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है तथा महान् उपनिषद् रूप है। यह दिव्यमन्त्र क्रियोपेत तथा भोग एवं मोक्षप्रद है ॥ ५ ॥ भगवन्मात्र विषयक होने से इस उपदेश से सारे जगत् का उद्धार होता है। यह दिव्य शास्त्र अनेक प्रकार की संहिता के भेद से भिन्न-भिन्न है और सिद्धि एवं मोक्षप्रद है अर्थात् भोग एवं अपवर्ग को देने वाला है। यह अनेक प्रकार के रहस्य मन्त्रों से संयुक्त है तथा उसमें अन्य देवताओं की चर्चा नहीं है। उस दिव्यशास्त्र में आद्य सात्त्वतशास्त्र को मैं आपसे कह रहा हूँ ॥ ५-६ ॥ अष्टाङ्गयोगसिद्धानां हृद्यागनिरतात्मनाम् ॥ ७ ॥ परव्यूहविभवभेदेन तदधिकारिभेदान् दर्शयन् आदौ परस्य भगवतोऽर्चने योगि- नामधिकारमाह—अष्टाङ्गेति ॥ ७ ॥ योगिनामधिकारः स्यादेकस्मिन् हृदयेशये। व्यामिश्रयागयुक्तानां विप्राणां वेदवादिनाम् ॥ ८ ॥ वेदपारगाणामपि तदुक्तदेवतान्तरव्यामोहरहितानामेव ब्राह्मणानां परव्यूहार्चने समन्त्रमधिकारं व्यामिश्रयाजिनां तदभावं चाह—व्यामिश्रेति ॥ ८ ॥ समन्त्रं तु चतुर्व्यूहे त्वधिकारो न चान्यथा। त्रयाणां क्षत्रियादीनां प्रपन्नानां च तत्त्वतः ॥ ९ ॥ अमन्त्रमधिकारस्तु चतुर्व्यूहक्रियाक्रमे। तदा भगवदेकप्रपत्तिनिष्ठानामेव क्षत्रविट्शूद्राणां व्यूहार्चनेऽमन्त्रमधिकारमाह— त्रयाणामिति ॥ ९-१० ॥ परव्यूह विभवभेद से अधिकारियों का भेद प्रदर्शित करते हुये परमात्मा भगवान् के अर्चन में केवल योगियों का ही अधिकार है अब इस बात को कहते हैं—अष्टाङ्ग योग में तथा मानसिक योग में निरत योगियों का ही केवल एकमात्र हृदय में रहने वाले उस परब्रह्म में अर्चन का अधिकार है।•व्यामिश्रयाग में निरत वेदवादी ब्राह्मणों का परव्यूह अर्चन में समन्त्रक अधिकार है किंतु भगवदेक प्रतिपत्ति निष्ठा वाले क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों इन तीनों को इस व्यूहार्चन में अमन्त्रक भी अधिकार हैं ॥ ७-१० ॥ सक्रिये मन्त्रचक्रे तु वैभवीयेऽविवेकिनाम् ॥ १० ॥ ममतासन्निरस्तानां स्वकर्मनिरतात्मनाम्। कर्मवाङ्मनसैः सम्यग् भक्तानां परमेश्वरे ॥ ११ ॥ चतुर्णामधिकारो वै प्राप्ते दीक्षाक्रमे सति। अहङ्कारममकारग्रस्ततया विवेकरहितानामपि स्वकर्मनिष्ठानां भगवद्भक्तानां दीक्षितानां ब्राह्मणादीनां चतुर्णामपि विभवार्चने समन्त्रमेवाधिकारमाह—सक्रिय इति