सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० सात्वतसंहिता क(ण्ठ)चक्रत्रयोपरि प्रकाशमाना ब्रह्मरन्ध्रेण निःसृता सूर्यपथात् परं गता वायुद्वारेण पातालं भित्त्वा स्वगोचरं याता, आमूलाग्रं यावदन्तं व्याप्तेत्यर्थः । अत एव भगवत्सं- कल्पविषयः सर्वोऽपि सूत्रे मणिगण इव सुषुम्नानाडीसम्बन्धः प्रतितिष्ठति, अतो मध्य- नाडीति स्मृता प्रसिद्धा । तस्यामभ्यन्तरे पूर्वोक्ते लक्ष्यस्थाने, हृदयकमलस्थान इत्यर्थः । निमेषोन्मेषलक्षणे निमीलनोन्मीलनविशिष्टे शशिसूर्याख्ये, निमीलितोर्ध्वकमलस्य शशि- संज्ञत्वम्, उन्मीलिताधःकमलस्य सूर्याख्यत्वम् । तत्र सम्पुटे कमलद्वयसम्पुटे, आर्कम् अर्कसम्बन्धि, अब्जम् अधः कमलमित्यर्थः । आलम्ब्य आश्रित्य, परा सूक्ष्मा, वाग्भ्रमरी वागेव भ्रमरी स्थिता । तां विशिनष्टि—या वाग्भ्रमरी सर्वमन्त्रजननी शान्तात्मनः सूक्ष्मस्य परस्येति यावत्, विभोः शक्तिरित्यनेन इयमपि तथा सूक्ष्मेत्यर्थः । अकारपूर्वो हान्तः अकारादिहकारान्तः, धारासन्तानरूपधृक् तैलधारावदविच्छिन्नः शब्दब्रह्मेति यत् यो नादः, तं वर्णजं नादं नदन्तीति । एवमेव नादस्वरूपमुक्तं लक्ष्मीतन्त्रेऽपि— पृथग्वर्णात्मना याति स्थितयेऽनेकधा स तु ॥ सूक्ष्मवर्णस्वरूपोऽसौ धारासन्तानरूपधृक् । पञ्चाध्वकोशमुक्तस्य मन्त्रिष्ठस्य विवेकिनः ॥ सोऽनुभूतिपदं याति प्रसादात् परमात्मनः । (२०।८-१०) इति । एतादृशं नादं नदन्त्या वाक्शक्तेः स्वरूपमपि तत्रैवोक्तम्— प्रकाशानन्दसाराहं सर्वमन्त्रप्रसूः परा । शब्दानां जननी शक्तिरुदयास्तमयोग्झिता ॥ व्यापकं यत् परं ब्रह्म नारायणसमाह्वयम् । शान्तता नाम याऽवस्था साहं शान्ताखिलप्रसूः ॥ (१८।१८-१९) इति ॥ ६३–६८ ॥ हे महामते ! यही आधार, नाभि और हृदय पर स्थित तीन चक्रों पर तीन ज्योतियों से भासित अव्यक्त ध्वनि की विग्रह वाली सुषुम्ना नाडी विद्यमान है, जो ब्रह्मरन्ध्र से निकल कर सूर्यपथ से बाहर निकल कर वायु द्वार से पाताल भेदन कर मूल से लेकर समस्त शरीर में व्याप्त है जिसमें भगवत् संकल्पित समस्त बाह्य विषय सूत्र में मणिगण के समान सम्बद्ध होकर स्थित हैं । इसलिये उसे मध्यनाडी भी कहा जाता है । उसके भीतर पूर्वोक्त हृदय कमल स्थान में निमेषोन्मेष लक्षण वाले निमलिनोन्मीलन विशिष्ट लक्षण वाले चन्द्र और सूर्य नाम वाले दो कमल स्थित हैं । वहाँ उस कमल द्वय सम्पुट में सूर्य सम्बन्धि अधः कमल को आश्रय लेकर सूक्ष्मा वाग्भ्रमरी स्थित है । वह परा वाग् भ्रमरी सर्वमन्त्रमयी है और पर सूक्ष्म उस शान्तात्मा विभु की शक्ति है जो उसी प्रकार सूक्ष्म भी है । यह परा वाग्भ्रमरी तैलधारावद् अविच्छिन्न रूप से निरन्तर अकार से हकार वर्ण पर्यन्त शब्दब्रह्म नामक नाद करती हुई वहीं शोभित रहती है । विमर्श—नाद, बिन्दु, मध्यमा और बैखरी इन चार अवस्था वाले शब्दब्रह्म की यह वाग्भ्रमरी प्रथमावस्था है यह बात आगे चल कर कहेंगे ॥ ६३-६८ ॥