सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः परिच्छेदः ३३ सदोदितस्वरूपस्य वासुदेवस्य वै विभोः । त्रयाणामच्युतादीनां तद्भेदानां तथैव च ॥ शान्तोदितस्वरूपस्य परस्य चतुरात्मनः । (१५।२२-२४) इत्येवं सर्वत्र परात्परत्वसंज्ञायां नित्योदितत्वदशायां परत्वसंज्ञायां शान्तोदितत्व- दशायां च वासुदेवादिचातुरात्म्यसद्भावाद् व्यूहशब्दचातुरात्म्यशब्दौ स्वरसावेव । किन्तु परत्वदशाद्वयेऽपि वासुदेवस्यैव प्राधान्यम्, एक एव मन्त्रः, तदर्चनेनैवोपसर्जनभूताना- मन्येषामप्यर्चनसिद्धिरित्यादिकं बोध्यम् ॥ ६९-७३ ॥ इस प्रकार हृदयकमल में शब्दब्रह्म के स्थान का निरूपण कर उसके अन्त में परब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करते हैं—शब्दब्रह्म की अन्तिम अवस्था में अनन्त समन्वित संवित्स्वरूप शान्तदेव, भक्तों पर अनुग्रह करने की इच्छा से अमूर्त्त होकर भी अत्यन्त मनोहर शरीर धारण कर मूर्त्त रूप में प्रगट हो जाते हैं और अयुत चन्द्रमा के समान अपनी उस मनोहर कान्ति से विश्व का आप्यायन करते हैं ॥ ६९-७० ॥ वे भगवान् शङ्खचक्र के चिह्नों वाले वर और अभयमुद्रा धारण किये हुये, त्रैलोक्य का उद्धार करने में समर्थ अपने दो हाथों से संयुक्त हैं, जिस प्रकार भगवान् सूर्य अपनी अनन्त किरणों से तथा जिस प्रकार समुद्र अपनी अनन्त ऊर्मियों (=लहरों) से संयुक्त हैं उसी प्रकार भगवान् अमूर्त्ति होकर अपने अच्युतादि अनन्त मूर्तियों से समन्वित हैं ॥ ७१-७२ ॥ अर्थात् परात्पर दशा में अच्युतादि मूर्तियों से समन्वित होकर भी वासुदेव रूप से प्रधान बने रहते हैं । वे सम्पूर्ण आभरणों से पूर्ण हैं किन्तु उनके पादादि विग्रह में कोई विकार नहीं होता ॥ ७३ ॥ ततः खाब्जकमध्यात्तु ह्यूर्ध्वस्थ्यात् संस्मरेच्च्युताम् । गङ्गां भगवतो मूर्ध्नि तेनामृतजलेन तु ॥ ७४ ॥ अर्घ्याद्यखिलभोगानां कार्या वै शुभकल्पना । अर्घ्यादिपरिकल्पनार्थं गङ्गावतणभावनाप्रकारमाह—तत इति सार्धेन । ऊर्ध्व- स्थादित्यब्जविशेषणम्, हृदयकमलद्वयसम्पुटे ऊर्ध्वकमलादित्यर्थः । ऊर्ध्वस्थितामिति पाठे गङ्गाविशेषणं सुस्पष्टम् । इममर्थं विस्तरेण वक्ष्यति नृसिंहकल्पपरिच्छेदे आप्या- यनप्रकरणे । अत्रापेक्षितं पीठकल्पनं नृसिंहकल्पे वक्ष्यति— अथ प्रणवपूर्वेण स्वनाम्ना नतिना सह ॥ शेषपूर्वं तु वह्न्यन्तमासनं परिकल्पयेत् । तथाक्रम्याथ तस्यैव कार्या स्वहृदि कल्पना ॥ (१७।३६-३७) इति ॥ ७४-७५ ॥ अब निर्विकार भगवान् की मानसी पूजा के लिये उपयुक्त अर्घ्यादि की भावना-