सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
चतुर्दशसमुल्लासः ४४३
७०—और उस मनुष्य से अधिक पापी कौन है जो अल्लाह पर झूठ बांध लेता है और कहता है कि मेरी ओर वही की गई परन्तु वही उस की ओर नहीं की गई और जो कहता है कि मैं भी उतारूँगा कि जैसे अल्लाह उतारता है॥ —मं० २। सि० ७। सू० ६। आ० ९३॥
( समीक्षक ) इस बात से सिद्ध होता है कि जब मुहम्मद साहेब कहते थे कि मेरे पास खुदा की ओर से आयतें आती हैं तब किसी दूसरे ने भी मुहम्मद साहेब के तुल्य लीला रची होगी कि मेरे पास भी आयतें उतरती हैं, मुझ को भी पैगम्बर मानो। इस को हटाने और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये मुहम्मद साहेब ने यह उपाय किया होगा॥७०॥
७१—अवश्य हम ने तुम को उत्पन्न किया, फिर तुम्हारी सूरतें बनाईं। फिर हम ने फरिश्तों से कहा कि आदम को सिजदा करो, बस उन्होंने सिजदा किया परन्तु शैतान सिजदा करने वालों में से न हुआ॥ कहा जब मैंने तुझे आज्ञा दी फिर किस ने रोका कि तूने सिजदा न किया, कहा मैं उस से अच्छा हूँ, तूने मुझ को आग से और उस को मिट्टी से उत्पन्न किया॥ कहा बस उस में से उतर, यह तेरे योग्य नहीं है कि तू उस में अभिमान करे॥ कहा उस दिन तक ढील दे कि कब्रों में से उठाये जावें॥ कहा निश्चय तू ढील दिये गयों से है॥ कहा बस इस की कसम है कि तूने मुझ को गुमराह किया, अवश्य मैं उन के लिये तेरे सीधे मार्ग पर बैठूंगा॥ और प्रायः तू उन को धन्यवाद करने वाला न पावेगा॥ कहा उस से दुर्दशा के साथ निकल, अवश्य जो कोई उन में से तेरा पक्ष करेगा तुम सब से दोज़ख को भरूंगा॥ —मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ११।१२।१३।१४।१५।१६।१७॥
( समीक्षक ) अब ध्यान देकर सुनो खुदा और शैतान के झगड़े को। एक फ़रिश्ता, जैसा कि चपरासी हो, था। वह भी खुदा से न दबा और खुदा उस के आत्मा को पवित्र भी न कर सका। फिर ऐसे बागी को जो पापी बना कर ग़दर करने वाला था उस को खुदा ने छोड़ दिया। खुदा की यह बड़ी भूल है। शैतान तो सब को बहकाने वाला और खुदा शैतान को बहकाने वाला होने से यह सिद्ध होता है कि शैतान का भी शैतान खुदा है। क्योंकि शैतान प्रत्यक्ष कहता है कि तूने मुझे गुमराह किया। इस से खुदा में पवित्रता भी नहीं पाई जाती और सब बुराइयों का चलाने वाला मूल कारण खुदा हुआ। ऐसा खुदा मुसलमानों ही का हो सकता है, अन्य श्रेष्ठ विद्वानों का नहीं। और फ़रिश्तों से मनुष्यवत् वार्तालाप करने से देहधारी, अल्पज्ञ, न्यायरहित मुसलमानों का खुदा है। इसी से विद्वान् लोग इसलाम के मज़हब को पसन्द नहीं करते॥ ७१॥
७२—निश्चय तुम्हारा मालिक अल्लाह है जिस ने आसमानों और पृथिवी को छः दिन में उत्पन्न किया। फिर करार पकड़ा अर्श पर॥ दीनता से अपने मालिक को पुकारो॥ —मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ५४।५६॥
( समीक्षक ) भला! जो छः दिन में जगत् को बनावे, (अर्श) अर्थात् ऊपर के आकाश में सिंहासन पर आराम करे वह ईश्वर सर्वशक्तिमान् और व्यापक कभी हो सकता है? इस के न होने से वह खुदा भी नहीं कहा सकता। क्या तुम्हारा खुदा बधिर है जो पुकारने से सुनता है? ये सब बातें अनीश्वरकृत हैं। इस से कुरान ईश्वरकृत नहीं हो सकता। यदि छः दिनों में जगत् बनाया, सातवें दिन अर्श पर आराम किया
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तो थक भी गया होगा और अब तक सोता है वा जागा है ? यदि जागता है तो अब कुछ काम करता है वा निकम्मा सैल सपट्टा और ऐश करता फिरता है ॥७२ ॥
७३—मत फिरो पृथिवी पर झगड़ा करते ॥ —मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ७४॥
( समीक्षक ) यह बात तो अच्छी है परन्तु इस से विपरीत दूसरे स्थानों में जिहाद करना काफ़िरों को मारना भी लिखा है। अब कहो यह पूर्वापर विरुद्ध नहीं है ? इस से यह विदित होता है कि जब मुहम्मद साहेब निर्बल हुए होंगे तब उन्होंने यह उपाय रचा होगा और जब सबल हुए होंगे तब झगड़ा मचाया होगा। इसी से ये बातें परस्पर विरुद्ध होने से दोनों सत्य नहीं हैं ॥ ७३ ॥
७४—बस एक ही बार अपना असा डाल दिया और वह अजगर था प्रत्यक्ष ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १०७ ॥
( समीक्षक ) अब इस के लिखने से विदित होता है कि ऐसी झूठी बातों को खुदा और मुहम्मद साहेब भी मानते थे। जो ऐसा है तो ये दोनों विद्वान् नहीं थे क्योंकि जैसे आंख से देखने को और कान से सुनने को अन्यथा कोई नहीं कर सकता। इसी से ये इन्द्रजाल की बातें हैं ॥ ७४ ॥
७५—बस हम ने उन पर मेह का तूफान भेजा ! टीडी, चिचड़ी और मेंढक और लोहू ॥ बस उन से हम ने बदला लिया और उन को डुबो दिया दरियाव में ॥ और हम ने बनी इसराईल को दरियाव से पार उतार दिया ॥ निश्चय वह दीन झूठा है कि जिस में वे हैं और उन का कार्य्य भी झूठा है ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १३३। १३६ । १३७। १३९ ॥
( समीक्षक ) अब देखिये ! जैसा कोई पाखण्डी किसी को डरावे कि हम तुझ पर सर्पों को काटने के लिये भेजेंगे। ऐसी ही यह भी बात है। भला ! जो ऐसा पक्षपाती कि एक जाति को डुबा दे और दूसरी को पार उतारे वह अधर्मी खुदा क्यों नहीं। जो दूसरे मतों को कि जिन में हज़ारों क्रोड़ों मनुष्य हों झूठा बतलावे और अपने को सच्चा, उस से परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है ? क्योंकि किसी मत में सब मनुष्य बुरे और भले नहीं हो सकते। यह इकतर्फी डिगरी करना महामूर्खों का मत है। क्या तौरेत ज़बूर का दीन, जो कि उन का था; झूठा हो गया ? वा उन का कोई अन्य मज़हब था कि जिस को झूठा कहा और जो वह अन्य मज़हब था तो कौन सा था कहो कि जिस का नाम कुरान में हो ॥ ७५ ॥
७६—बस तू मुझ को अलबत्ता देख सकेगा, जब प्रकाश किया उस के मालिक ने पहाड़ की ओर उस को परमाणु-परमाणु किया। गिर पड़ा मूसा बेहोश ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १४३ ॥
( समीक्षक ) जो देखने में आता है वह व्यापक नहीं हो सकता। और ऐसे चमत्कार करता फिरता था तो खुदा इस समय ऐसा चमत्कार किसी को क्यों नहीं दिखलाता ? सर्वथा विद्या विरुद्ध होने से यह बात मानने योग्य नहीं ॥ ७६ ॥
७७—और अपने मालिक को दीनता डर से मन में याद कर, धीमी आवाज़ से सुबह को और शाम को ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० २०५ ॥
( समीक्षक ) कहीं-कहीं कुरान में लिखा है कि बड़ी आवाज़ से अपने मालिक को पुकार और कहीं-कहीं धीरे-धीरे मन में ईश्वर का स्मरण कर। अब कहिये ! कौन सी बात सच्ची ? और कौन सी झूठी ? जो एक दूसरी बात से विरोध
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करती है वह बात प्रमत्त गीत के समान होती है। यदि कोई बात भ्रम से विरुद्ध निकल जाय उस को मान ले तो कुछ चिन्ता नहीं॥ ७७॥
७८—प्रश्न करते हैं तुझ को लूटों से कह लूटें वास्ते अल्लाह के और रसूल के और डरो अल्लाह से॥ —मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० १॥
( समीक्षक ) जो लूट मचावें, डाकू के कर्म करें करावें और खुदा तथा पैग़म्बर और ईमानदार भी बनें, यह बड़े आश्चर्य की बात है और अल्लाह का डर बतलाते और डाकादि बुरे काम भी करते जायें और ‘उत्तम मत हमारा है’ कहते लज्जा भी नहीं। हठ छोड़ के सत्य वेदमत्त का ग्रहण न करें इस से अधिक कोई बुराई दूसरी होगी ? ॥ ७८ ॥
७९—और काटे जड़ काफ़िरों की॥ मैं तुम को सहाय दूंगा। साथ सहस्र फ़रिश्तों के पीछे पीछे आने वाले॥ अवश्य मैं काफ़िरों के दिलों में भय डालूंगा। बस मारो ऊपर गर्दनों के मारो उन में से प्रत्येक पोरी (सन्धि) पर॥ —मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ७।९।१२॥
( समीक्षक ) वाह जी वाह ! कैसा खुदा और कैसे पैग़म्बर दयाहीन। जो मुसलमानी मत से भिन्न काफ़िरों की जड़ कटवावे। और खुदा आज्ञा देवे उन की गर्दन पर मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्मति देवे ऐसा खुदा लंकेश से क्या कुछ कम है ? यह सब प्रपञ्च कुरान के कर्त्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हम से दूर और हम उस से दूर रहें॥ ७९ ॥
८०—अल्लाह मुसलमानों के साथ है॥ ऐ लोगो जो ईमान लाये हो पुकारना स्वीकार करो वास्ते अल्लाह के और वास्ते रसूल के ॥ ऐ लोगो जो ईमान लाये हो मत चोरी करो अल्लाह की रसूल की और मत चोरी करो अमानत अपनी की॥ और मकर करता था अल्लाह और अल्लाह भला मकर करने वालों का है॥ —मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० १९।२०।२९।३०॥
( समीक्षक ) क्या अल्लाह मुसलमानों का पक्षपाती है, जो ऐसा है तो अधर्म करता है। नहीं तो ईश्वर सब सृष्टि भर का है। क्या खुदा बिना पुकारे नहीं सुन सकता। बधिर है ? और उस के साथ रसूल को शरीक करना बहुत बुरी बात नहीं है ? अल्लाह का कौन सा ख़जाना भरा है जो चोरी करेगा ? क्या रसूल और अपने अमानत की चोरी छोड़कर अन्य सब की चोरी किया करे ? ऐसा उपदेश अविद्वान् और अधर्मियों का हो सकता है ? भला ! जो मकर करता और जो मकर करने वालों का संगी है वह खुदा कपटी, छली और अधर्मी क्यों नहीं ? इसलिये यह कुरान खुदा का बनाया हुआ नहीं है। किसी कपटी छली का बनाया होगा। नहीं तो ऐसी अन्यथा बातें लिखित क्यों होतीं ? ॥ ८० ॥
८१—और लड़ो उन से यहां तक कि न रहे फ़ितना अर्थात् बल काफ़िरों का और होवे दीन तमाम वास्ते अल्लाह के॥ और जानो तुम यह कि जो कुछ तुम लूटो किसी वस्तु से निश्चय वास्ते अल्लाह के है पाँचवाँ हिस्सा उस का और वास्ते रसूल के॥ —मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ३९।४१॥
( समीक्षक ) ऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शान्तिभङ्गकर्त्ता दूसरा कौन होगा ? अब देखिये यह मज़हब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत् को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है ? और लूट
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के माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैगम्बर संसार में ऐसी उपाधि और शान्तिभङ्ग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिये कहां से आया? जो ऐसे-ऐसे मत जगत् में प्रचलित न होते तो सब जगत् आनन्द में बना रहता॥ ८१॥
८२—और कभी देखे तू जब काफ़िरों को फ़रिश्ते कब्ज करते हैं, मारते हैं, मुख उन के और पीठें उन की और कहते चखो अज़ाब जलने का॥ हम ने उन के पाप से उन को मारा और हम ने फ़िराओन की कौम को डुबा दिया॥ और तैयारी करो वास्ते उन के जो कुछ तुम कर सको॥ —मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ५०। ५४। ६०॥
(समीक्षक) क्यों जी! आजकल रूस ने रूम आदि और इंग्लैण्ड ने मिश्र की दुर्दशा कर डाली; फ़रिश्ते कहां सो गये? और अपने सेवकों के शत्रुओं को खुदा पूर्व मारता डुबाता था यह बात सच्ची हो तो आजकल भी ऐसा करे जिस से ऐसा नहीं होता इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं? अब देखिये! यह कैसी बुरी आज्ञा है कि जो कुछ तुम कर सको वह भिन्न मत वालों के लिये दुःखदायक कर्म करो। ऐसी आज्ञा विद्वान् और धार्मिक दयालु की नहीं हो सकती। फिर लिखते हैं कि खुदा दयालु और न्यायकारी है। ऐसी बातों से मुसलमानों के खुदा से न्याय और दयादि सद्गुण दूर बसते हैं॥ ८२॥
८३—ऐ नबी किफ़ायत है तुझ को अल्लाह और उन को जिन्होंने मुसलमानों से तेरा पक्ष किया॥ ऐ नबी रग़बत अर्थात् चाह चस्का दे मुसलमानों को ऊपर लड़ाई के, जो हों तुम में से २० आदमी सन्तोष करने वाले तो पराजय करें दो सौ का॥ बस खाओ उस वस्तु से कि लूटा है तुमने हलाल पवित्र और डरो अल्लाह से वह क्षमा करने वाला दयालु है॥ —मं० २। सि० १०। सू० ८। आ० ६४। ६५। ६९॥
(समीक्षक) भला यह कौन सी न्याय, विद्वत्ता और धर्म की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहें अन्याय भी करे उसी का पक्ष और लाभ पहुँचावे? और जो प्रजा में शान्तिभङ्ग करके लड़ाई करे करावे और लूट मार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी का नाम क्षमावान् दयालु लिखे यह बात खुदा की तो क्या किन्तु किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी-ऐसी बातों से कुरान ईश्वरवाक्य कभी नहीं हो सकता॥ ८३॥
८४—सदा रहेंगे बीच उस के, अल्लाह समीप है उस के पुण्य बड़ा॥ ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो मत पकड़ो बापों अपने को और भाइयों अपने को मित्र जो दोस्त रखें कुफ्र को ऊपर ईमान के॥ फिर उतारी अल्लाह ने तसल्ली अपनी ऊपर रसूल अपने के और ऊपर मुसलमानों के और उतारे लश्कर नहीं देखा तुम ने उन को और अज़ाब किया उन लोगों को और यही सज़ा है काफ़िरों को॥ फिर-फिर आवेगा अल्लाह पीछे उस के ऊपर॥ और लड़ाई करो उन लोगों से जो ईमान नहीं लाते॥ —मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० २२। २३। २६। २७॥
(समीक्षक) भला जो बहिश्तवालों के समीप अल्लाह रहता है तो सर्वव्यापक क्योंकर हो सकता है? जो सर्वव्यापक नहीं तो सृष्टिकर्त्ता और न्यायाधीश नहीं हो सकता। और अपने माँ, बाप, भाई और मित्र को छुड़वाना केवल अन्याय की बात है। हां! जो वे बुरा उपदेश करें; न मानना परन्तु उन की सेवा
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सदा करनी चाहिये। जो पहले खुदा मुसलमानों पर बड़ा सन्तोषी था; और उनके सहाय के लिए लश्कर उतारता था सच हो तो अब ऐसा क्यों नहीं करता ? और जो प्रथम काफ़िरों को दण्ड देता और पुनः उसके ऊपर आता था तो अब कहाँ गया ? क्या विना लड़ाई के ईमान खुदा नहीं बना सकता ? ऐसे खुदा को हमारी ओर से सदा तिलाञ्जलि है, खुदा क्या है एक खिलाड़ी है ? ॥ ८४ ॥
८५—और हम बाट देखने वाले हैं वास्ते तुम्हारे यह कि पहुँचावें तुम को अल्लाह अज़ाब अपने पास से वा हमारे हाथों से ॥ —मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० ५२ ॥
( समीक्षक ) क्या मुसलमान ही ईश्वर की पुलिस बन गये हैं कि अपने हाथ वा मुसलमानों के हाथ से अन्य किसी मत वालों को पकड़ा देता है ? क्या दूसरे क्रोड़ों मनुष्य ईश्वर को अप्रिय हैं ? मुसलमानों में पापी भी प्रिय हैं ? यदि ऐसा है तो अन्धेर नगरी गवरगण्ड राजा की सी व्यवस्था दीखती है। आश्चर्य है कि जो बुद्धिमान् मुसलमान हैं वे भी इस निर्मूल अयुक्त मत को मानते हैं ॥ ८५ ॥
८६—प्रतिज्ञा की है अल्लाह ने ईमान वालों से और ईमानवालियों से बहिश्तें चलती हैं नीचे उन के से नहरें सदैव रहने वाली बीच उस के और घर पवित्र बीच बहिश्तों अदन के और प्रसन्नता अल्लाह की ओर बड़ी है और यह कि वह है मुराद पाना बड़ा ॥ बस ठट्ठा करते हैं उन से, ठट्ठा किया अल्लाह ने उन से ॥ —मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० ७३।८० ॥
( समीक्षक ) यह खुदा के नाम से स्त्री पुरुषों को अपने मतलब के लिये लोभ देना है। क्योंकि जो ऐसा प्रलोभन न देते तो कोई मुहम्मद साहेब के जाल में न फंसता। ऐसे ही अन्य मत वाले भी किया करते हैं। मनुष्य लोग तो आपस में ठट्ठा किया ही करते हैं परन्तु खुदा को किसी से ठट्ठा करना उचित नहीं है। यह कुरान क्या है बड़ा खेल है ॥ ८६ ॥
८७—परन्तु रसूल और जो लोग कि साथ उसके ईमान लाये जिहाद किया उन्होंने साथ धन अपने के तथा जानों अपनी के और इन्हीं लोगों के लिये भलाई है ॥ और मोहर रक्खी अल्लाह ने ऊपर दिलों उन के, बस वे नहीं जानते ॥ —मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० ८८।९३ ॥
( समीक्षक ) अब देखिये मतलबसिन्धु की बात ! कि वे ही भले हैं जो मुहम्मद साहेब के साथ ईमान लाये और जो नहीं लाये वे बुरे हैं ! क्या यह बात पक्षपात और अविद्या से भरी हुई नहीं है ? जब खुदा ने मोहर ही लगा दी तो उन का अपराध पाप करने में कोई भी नहीं किन्तु खुदा ही का अपराध है क्योंकि उन बिचारों को भलाई से दिलों पर मोहर लगा के रोक दिये; यह कितना बड़ा अन्याय है ! ! ! ॥ ८७ ॥
८८—ले माल उनके से खैरात कि पवित्र करे तू उन को अर्थात् बाहरी और शुद्ध करे तू उन को साथ उन के अर्थात् गुप्त में ॥ निश्चय अल्लाह ने मोल ली हैं मुसलमानों से जानें उन की और माल उन के बदले, कि वास्ते उन के बहिश्त है। लड़ेंगे बीच मार्ग अल्लाह के बस मारेंगे और मर जावेंगे ॥ —मं० २। सि० ११। सू० ९। आ० १०३।१११ ॥
( समीक्षक ) वाह जी वाह मुहम्मद साहेब ! आपने तो गोकुलिये गुसाइयों की बराबरी कर ली क्योंकि उन का माल लेना और उन को पवित्र करना यही
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बात तो गुसांइयों की है। वाह खुदा जी ! आपने अच्छी सौदागरी लगाई कि मुसलमानों के हाथ से अन्य गरीबों के प्राण लेना ही लाभ समझा और उन अनाथों को मरवा कर उन निर्दयी मनुष्यों को स्वर्ग देने से दया और न्याय से मुसलमानों का खुदा हाथ धो बैठा और अपनी खुदाई में बट्टा लगा के बुद्धिमान् धार्मिकों में घृणित हो गया ॥ ८८ ॥
८९—ऐ लोगो जो ईमान लाये हो लड़ो उन लोगों से कि पास तुम्हारे हैं काफिरों से और चाहिये कि पावें बीच तुम्हारे दृढ़ता ॥ क्या नहीं देखते यह कि वे बलाओं में डाले जाते हैं बीच हर वर्ष के एक बार वा दो बार। फिर वे नहीं तोबा करते और न वे शिक्षा पकड़ते हैं॥ —मं० २। सि० ११। सू० ९। आ० १२३। १२६॥
( समीक्षक ) देखिये ! ये भी एक विश्वासघात की बातें खुदा मुसलमानों को सिखलाता है कि चाहें पड़ोसी हो वा किसी के नौकर हों जब अवसर पावें तभी लड़ाई वा घात करें। ऐसी बातें मुसलमानों से बहुत बन गई हैं इसी कुरान के लेख से। अब तो मुसलमान समझ के इन कुरानोक्त बुराइयों को छोड़ दें तो बहुत अच्छा है ॥ ८९ ॥
९०—निश्चय परवरदिगार तुम्हारा अल्लाह है जिस ने पैदा किया आसमानों और पृथिवी को बीच छः दिन के। फिर करार पकड़ा ऊपर अर्श के, तदबीर करता है काम की ॥ —मं० ३। सि० ११। सू० १०। आ० ३॥
( समीक्षक ) आसमान आकाश एक और बिना बना अनादि है। उस का बनाना लिखने से निश्चय हुआ कि वह कुरानकर्त्ता पदार्थविद्या को नहीं जानता था ? क्या परमेश्वर के सामने छः दिन तक बनाना पड़ता है ? तो जो ‘हो मेरे हुक्म से और हो गया’ जब कुरान में ऐसा लिखा है फिर छः दिन कभी नहीं लग सकते ॥ इससे छः दिन लगना झूठ है। जो वह व्यापक होता तो ऊपर अर्श के क्यों ठहरता ? और जब काम की तदबीर करता है तो ठीक तुम्हारा खुदा मनुष्य के समान है क्योंकि जो सर्वज्ञ है वह बैठा-बैठा क्या तदबीर करेगा ? इस से विदित होता है कि ईश्वर को न जानने वाले जंगली लोगों ने यह पुस्तक बनाया होगा ॥ ९० ॥
९१—शिक्षा और दया वास्ते मुसलमानों के ॥ —मं० ३। सि० ११। सू० १०। आ० ५७॥
( समीक्षक ) क्या यह खुदा मुसलमानों ही का है ? दूसरों का नहीं ? और पक्षपाती है जो मुसलमानों ही पर दया करे अन्य मनुष्यों पर नहीं। यदि मुसलमान ईमानदारों को कहते हैं तो उन के लिये शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं और मुसलमानों से भिन्नों को उपदेश नहीं करता तो खुदा की विद्या ही व्यर्थ है ॥ ९१ ॥
९२—परीक्षा लेवे तुम को, कौन तुम में से अच्छा है कर्मों में। जो कहे तू! अवश्य उठाये जाओगे तुम पीछे मृत्यु के ॥ —मं० ३। सि० १२। सू० ११। आ० ७॥
( समीक्षक ) जब कर्मों की परीक्षा करता है तो सर्वज्ञ ही नहीं। और जो मृत्यु पीछे उठाता है तो दौड़ा सुपुर्द रखता है और अपने नियम जो कि मरे हुए न जीवें उस को तोड़ता है। यह खुदा को बट्टा लगता है ॥ ९२ ॥
९३—और कहा गया ऐ पृथिवी अपना पानी निगल जा और ऐ आसमान बस कर और पानी सूख गया ॥ और ऐ कौम यह है कि निशानी ऊंटनी अल्लाह
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की वास्ते तुम्हारे, बस छोड़ दो उस को बीच पृथिवी अल्लाह के खाती फिरे॥ —मं० ३। सि० १२। सू० ११। आ० ४४।६४॥
(समीक्षक) क्या लड़केपन की बात है! पृथिवी और आकाश कभी बात सुन सकते हैं? वाह जी वाह! खुदा के ऊंटनी भी है तो ऊंट भी होगा ? तो हाथी घोड़े, गधे आदि भी होंगे? और खुदा का ऊंटनी से खेत खिलाना क्या अच्छी बात है? क्या ऊंटनी पर चढ़ता भी है? जो ऐसी बातें हैं तो नवाबी की सी घसड़पसड़ खुदा के घर में भी हुई॥ ९३॥
९४—और सदैव रहने वाले बीच उस के जब तक कि रहें आसमान और पृथिवी॥ और जो लोग सुभागी हुए बस बहिश्त के सदा रहने वाले हैं; जब तक रहें आसमान और पृथिवी॥ —मं० ३। सि० १२। सू० ११। आ० १०७।१०८॥
(समीक्षक) जब दोज़ख और बहिश्त में कयामत के पश्चात् सब लोग जायेंगे फिर आसमान और पृथिवी किस लिए रहेगी? और जब दोज़ख और बहिश्त के रहने की आसमान पृथिवी के रहने तक अवधि हुई तो सदा रहेंगे बहिश्त वा दोज़ख में, यह बात झूठी हुई। ऐसा कथन अविद्वानों का होता है; ईश्वर वा विद्वानों का नहीं॥ ९४॥
९५—जब यूसुफ ने अपने बाप से कहा कि ऐ बाप मेरे मैंने एक स्वप्न में देखा॥ —मं० ३। सि० १२। सू० १२। आ० ४ से ५९ तक॥
(समीक्षक) इस प्रकरण में पिता पुत्र का संवादरूप किस्सा कहानी भरी है इसलिये कुरान ईश्वर का बनाया नहीं। किसी मनुष्य ने मनुष्यों का इतिहास लिख दिया है॥ ९५॥
९६—अल्लाह वह है कि जिस ने खड़ा किया आसमानों को बिना खम्भे के देखते हो तुम उस को। फिर ठहरा ऊपर अर्श के। आज्ञा वर्तने वाला किया सूरज और चांद को॥ और वही है जिस ने बिछाया पृथिवी को॥ उतारा आसमान से पानी बस बहे नाले साथ अन्दाजे अपने के॥ अल्लाह खोलता है भोजन को वास्ते जिस को चाहे और तंग करता है॥ —मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० २।३।१७।२६॥
(समीक्षक) मुसलमानों का खुदा पदार्थविद्या कुछ भी नहीं जानता था। जो जानता तो गुरुत्व न होने से आसमान को खम्भे लगाने की कथा कहानी कुछ भी न लिखता। यदि खुदा अर्शरूप एक स्थान में रहता है तो वह सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक नहीं हो सकता। और जो खुदा मेघविद्या जानता तो आकाश से पानी उतारा लिखा पुनः यह क्यों न लिखा कि पृथिवी से पानी ऊपर चढ़ाया। इससे निश्चय हुआ कि कुरान का बनाने वाला मेघ की विद्या को भी नहीं जानता था। और जो बिना अच्छे बुरे कामों के सुख दुःख देता है तो पक्षपाती अन्यायकारी निरक्षर भट्ट है॥ ९६॥
९७—कह निश्चय अल्लाह गुमराह करता है जिस को चाहता है और मार्ग दिखलाता है तर्फ अपनी उस मनुष्य को रुजू करता है॥ —मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० २७॥
(समीक्षक) जब अल्लाह गुमराह करता है तो खुदा और शैतान में क्या भेद हुआ? जब कि शैतान दूसरों को गुमराह अर्थात् बहकाने से बुरा कहाता है तो खुदा भी वैसा ही काम करने से बुरा शैतान क्यों नहीं? और बहकाने के पाप
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से दोज़खी क्यों नहीं होना चाहिये ? ॥ ९७ ॥
९८—इसी प्रकार उतारा हम ने इस कुरान को अर्बी में, जो पक्ष करेगा तू उन की इच्छा का पीछे इस के आई तेरे पास विद्या से ॥ बस सिवाय इस के नहीं कि ऊपर तेरे पैग़ाम पहुँचाना है और ऊपर हमारे है हिसाब लेना ॥ —मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० ३७।४० ॥
( समीक्षक ) कुरान किधर की ओर से उतारा ? क्या खुदा ऊपर रहता है ? जो यह बात सच है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैगाम पहुँचाना हल्कारे का काम है और हल्कारे की आवश्यकता उसी को होती है जो मनुष्यवत् एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है; ईश्वर का नहीं क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया कुरान है ॥ ९८ ॥
९९—और किया सूर्य चन्द्र को सदैव फिरने वाला ॥ निश्चय आदमी अवश्य अन्याय और पाप करने वाला है ॥ —मं० ३। सि० १३। सू० १४। आ० ३३।३४ ॥
( समीक्षक ) क्या चन्द्र, सूर्य सदा फिरते और पृथिवी नहीं फिरती ? जो पृथिवी नहीं फिरे तो कई वर्षों का दिन रात होवे। और जो मनुष्य निश्चय अन्याय और पाप करने वाला है तो कुरान से शिक्षा करना व्यर्थ है। क्योंकि जिन का स्वभाव पाप ही करने का है तो उन में पुण्यात्मता कभी न होगी और संसार में पुण्यात्मा और पापात्मा सदा दीखते हैं। इसलिये ऐसी बात ईश्वरकृत पुस्तक की नहीं हो सकती ॥ ९९ ॥
१००—बस जब ठीक करूँ मैं उस को और फूंक दूं बीच उसके रूह अपनी से। बस गिर पड़ो वास्ते उस के सिजदा करते हुए ॥ कहा ऐ रब मेरे, इस कारण कि गुमराह किया तू ने मुझ को अवश्य जीनत दूंगा मैं वास्ते उन के बीच पृथिवी के और गुमराह करूंगा ॥ —मं० ३। सि० १४। सू० १५। आ० २९। से ३९। तक ॥
( समीक्षक ) जो खुदा ने अपनी रूह आदम साहेब में डाली तो वह भी खुदा हुआ और जो वह खुदा न था तो सिजदा अर्थात् नमस्कारादि भक्ति करने में अपना शरीक क्यों किया ? जब शैतान को गुमराह करने वाला खुदा ही है तो वह शैतान का भी शैतान बड़ा भाई गुरु क्यों नहीं ? क्योंकि तुम लोग बहकाने वाले को शैतान मानते हो तो खुदा ने भी शैतान को बहकाया और प्रत्यक्ष शैतान ने कहा कि मैं बहकाऊंगा। फिर भी उस को दण्ड देकर कैद क्यों न किया ? और मार क्यों न डाला ? ॥ १०० ॥
१०१—और निश्चय भेजे हम ने बीच हर उम्मत के पैगम्बर ॥ जब चाहते हैं हम उस को, यह कहते हैं हम उस को हो! बस हो जाती है ॥ —मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० ३५।४० ॥
( समीक्षक ) जो सब कौमों पर पैग़म्बर भेजे हैं तो सब लोग जो कि पैग़म्बर की राय पर चलते हैं वे काफ़िर क्यों ? क्या दूसरे पैग़म्बर का मान्य नहीं सिवाय तुम्हारे पैग़म्बर के ? यह सर्वथा पक्षपात की बात है। जो सब देश में पैग़म्बर भेजे तो आर्य्यावर्त्त में कौन सा भेजा ? इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं। जब खुदा चाहता है और कहता है कि पृथिवी हो जा, वह जड़ कभी नहीं सुन सकती। खुदा का हुक्म क्योंकर बजा सकेगा ? और सिवाय खुदा के दूसरी चीज नहीं मानते तो सुना किस ने ? और हो कौन गया ? ये सब अविद्या की बातें हैं। ऐसी बातों को
चतुर्दशसमुल्लासः ४५१
अनजान लोग मानते हैं॥ १०१ ॥
१०२—और नियत करते हैं वास्ते अल्लाह के बेटियां—पवित्रता है उस को—और वास्ते उनके हैं जो कुछ चाहें॥ कसम अल्लाह की अवश्य भेजे हम ने पैग़म्बर॥ —मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० ५७। ६३॥
(समीक्षक) अल्लाह बेटियों से क्या करेगा? बेटियां तो किसी मनुष्य को चाहिये, क्यों बेटे नियत नहीं किये जाते और बेटियां नियत की जाती हैं? इस का क्या कारण है? बताइये? कसम खाना झूठों का काम है, खुदा की बात नहीं। क्योंकि बहुधा संसार में ऐसा देखने में आता है कि जो झूठा होता है वही कसम खाता है। सच्चा सौगन्ध क्यों खावे?॥ १०२ ॥
१०३—ये लोग वे हैं कि मोहर रक्खी अल्लाह ने ऊपर दिलों उन के और कानों उन के और आंखों उन की के और ये लोग वे हैं बेखबर॥ और पूरा दिया जावेगा हर जीव को जो कुछ किया है और वे अन्याय न किये जावेंगे॥ —मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० १०८-१११॥
(समीक्षक)—जब खुदा ही ने मोहर लगा दी तो वे बिचारे बिना अपराध मारे गये क्योंकि उन को पराधीन कर दिया। यह कितना बड़ा अपराध है? और फिर कहते हैं कि जिस ने जितना किया है उतना ही उस को दिया जायगा; न्यूनाधिक नहीं। भला! उन्होंने स्वतन्त्रता से पाप किये ही नहीं किन्तु खुदा के कराने से किये। पुनः उन का अपराध ही न हुआ। उन को फल न मिलना चाहिये। इस का फल खुदा को मिलना उचित है। और जो पूरा दिया जाता है तो क्षमा किस बात की जाती है? जो क्षमा की जाती है तो न्याय उड़ जाता है। ऐसा गड़बड़ाध्याय ईश्वर का कभी नहीं हो सकता किन्तु निर्बुद्धि छोकरों का होता है॥ १०३ ॥
१०४—और किया हमने दोज़ख को वास्ते काफ़िरों के घेरने वाला स्थान॥ और हर आदमी को लगा दिया हम ने उस को अमलनामा उस का बीच गर्दन उस की के और निकालेंगे हम वास्ते उस के दिन कयामत के एक किताब कि देखेगा उस को खुला हुआ॥ और बहुत मारे हम ने कुरनून से पीछे नूह के॥ —मं० ४। सि० १५। सू० १७। आ० ८-१३। १७॥
(समीक्षक) यदि काफ़िर वे ही हैं कि जो कुरान, पैग़म्बर और कुरान के कहे खुदा, सातवें आसमान और नमाज़ आदि को न मानें और उन्हीं के लिये दोज़ख होवे तो यह बात केवल पक्षपात की ठहरे क्योंकि कुरान ही के मानने वाले सब अच्छे और अन्य के मानने वाले सब बुरे कभी हो सकते हैं? यह बड़ी लड़कपन की बात है कि प्रत्येक की गर्दन में कर्मपुस्तक! हम तो किसी एक की भी गर्दन में नहीं देखते। यदि इस का प्रयोजन कर्मों का फल देना है तो फिर मनुष्यों के दिलों, नेत्रों आदि पर मोहर रखना और पापों का क्षमा करना क्या खेल मचाया है? कयामत की रात को किताब निकालेगा खुदा तो आज कल वह किताब कहां है? क्या साहूकार की बही समान लिखता रहता है? यहां यह विचारना चाहिये कि जो पूर्वजन्म नहीं तो जीवों के कर्म ही नहीं हो सकते फिर कर्म की रेखा क्या लिखी? जो बिना कर्म के लिखा तो उन पर अन्याय किया क्योंकि बिना अच्छे बुरे कर्मों के उन को दुःख-सुख क्यों दिया? जो कहो कि खुदा की मरजी, तो भी उसने अन्याय किया। अन्याय उस को कहते हैं कि बिना बुरे भले कर्म किये दुःख सुखरूप फल न्यूनाधिक देना और उस समय खुदा ही किताब बांचेगा वा
४५२ || सत्यार्थप्रकाशः
कोई सरिश्तेदार सुनावेगा ? जो खुदा ही ने दीर्घकाल सम्बन्धी जीवों को विना अपराध मारा तो वह अन्यायकारी हो गया। जो अन्यायकारी होता है वह खुदा ही नहीं हो सकता ॥ १०४ ॥
१०५—और दिया हमने समूद को ऊंटनी प्रमाण ॥ और बहका जिस को बहका सके ॥ जिस दिन बुलावेंगे हम सब लोगों को साथ पेशवाओं उन के बस जो कोई दिया गया अमलनामा उस का बीच दहिने हाथ उस के ॥ —मं० ४। सि० १५। सू० १७। आ० ५९।६४।७१॥
( समीक्षक ) वाह जी ! जितनी खुदा की साश्चर्य निशानी हैं उन में से एक ऊंटनी भी खुदा के होने में प्रमाण अथवा परीक्षा में साधक है। यदि खुदा ने शैतान को बहकाने का हुक्म दिया तो खुदा ही शैतान का सरदार और सब पाप कराने वाला ठहरा। ऐसे को खुदा कहना केवल कम समझ की बात है। जब कयामत की रात अर्थात् प्रलय ही में न्याय करने कराने के लिये पैगम्बर और उन के उपदेश मानने वालों को खुदा बुलावेगा तो जब तक प्रलय न होगा तब तक सब दौरा सुपुर्द रहे और दौरा सुपुर्द सब को दुःखदायक है जब तक न्याय न किया जाय। इसलिये शीघ्र न्याय करना न्यायाधीश का उत्तम काम है। यह तो पोपांबाई का न्याय ठहरा। जैसे कोई न्यायाधीश कहे कि जब तक पचास वर्ष तक के चोर और साहूकार इकट्ठे न हों तब तक उन को दण्ड वा प्रतिष्ठा न करनी चाहिये। वैसा ही यह हुआ कि एक तो पचास वर्ष तक दौरा सुपुर्द रहा और एक आज ही पकड़ा गया। ऐसा न्याय का काम नहीं हो सकता। न्याय तो वेद और मनुस्मृति का देखो जिस में क्षण मात्र विलम्ब नहीं होता और अपने-अपने कर्मानुसार दण्ड वा प्रतिष्ठा सदा पाते रहते हैं। दूसरा पैगम्बरों को गवाही के तुल्य रखने से ईश्वर की सर्वज्ञता की हानि है। भला ! ऐसा पुस्तक ईश्वरकृत और ऐसे पुस्तक का उपदेश करने वाला ईश्वर कभी हो सकता है ? कभी नहीं ॥ १०५ ॥
१०६—ये लोग वास्ते उन के हैं बाग़ हमेशाह रहने के, चलती हैं नीचे उन के से नहरें, गहना पहिराये जावेंगे बीच उस के कंगन सोने के से और पोशाक पहिनेंगे वस्त्र हरित लाहि की से और ताफ़ते की से तकिये किये हुए बीच उस के ऊपर तख़्तों के। अच्छा है पुण्य और अच्छी है बहिश्त लाभ उठाने की ॥ —मं० ४। सि० १५। सू० १८। आ० ३१ ॥
( समीक्षक ) वाह जी वाह ! क्या कुरान का स्वर्ग है जिस में बाग़, गहने, कपड़े, गद्दी, तकिये आनन्द के लिये हैं। भला ! कोई बुद्धिमान् यहां विचार करे तो यहां से वहाँ मुसलमानों के बहिश्त में अधिक कुछ भी नहीं है सिवा अन्याय के, वह यह कि कर्म उन के अन्त वाले और फल उन का अनन्त। और जो मीठा नित्य खावे तो थोड़े दिन में विष के समान प्रतीत होता है। जब सदा वे सुख भोगेंगे तो उन को सुख ही दुःखरूप हो जायगा। इसलिये महाकल्प पर्यन्त मुक्तिसुख भोग के पुनर्जन्म पाना ही सत्य सिद्धान्त है ॥ १०६ ॥
१०७—और यह बस्तियां हैं कि मारा हम ने उन को जब अन्याय किया उन्होंने और हम ने उन के मारने की प्रतिज्ञा स्थापन की ॥ —मं० ४। सि० १५। सू० १८। आ० ५९ ॥
( समीक्षक ) भला ! सब बस्ती भर पापी कभी हो सकती है ? और पीछे से प्रतिज्ञा करने से ईश्वर सर्वज्ञ नहीं रहा क्योंकि जब उन का अन्याय देखा तो
चतुर्दशसमुल्लासः ४५३
प्रतिज्ञा की, पहिले नहीं जानता था। इस से दयाहीन भी ठहरा॥ १०७॥
१०८—और वह जो लड़का, बस थे माँ बाप उस के ईमान वाले, बस डरे हम यह कि पकड़े उन को सरकशी में और कुफ्र में॥ यहां तक कि पहुँचा जगह डूबने सूर्य्य की, पाया उसको डूबता था बीच चश्मे कीचड़ के ॥ कहा उन ने ऐज़ुलकरनैन ! निश्चय याजूज माजूज फिसाद करने वाले हैं बीच पृथिवी के॥ —मं० ४। सि० १६। सू० १८। आ० ८०।८६।९४॥
( समीक्षक ) भला! यह खुदा की कितनी बेसमझ है! शङ्का से डरा कि लड़के के माँ बाप कहीं मेरे मार्ग से बहका कर उलटे न कर दिये जावें। यह कभी ईश्वर की बात नहीं हो सकती। अब आगे की अविद्या की बात देखिये कि इस किताब का बनाने वाला सूर्य्य को एक झील में रात्रि को डूबा जानता है, फिर प्रातःकाल निकलता है। भला! सूर्य्य तो पृथिवी से बहुत बड़ा है। वह नदी वा झील वा समुद्र में कैसे डूब सकेगा? इस से यह विदित हुआ कि कुरान के बनाने वाले को भूगोल खगोल की विद्या नहीं थी। जो होती तो ऐसी विद्याविरुद्ध बात क्यों लिख देता । और इस पुस्तक को मानने वालों को भी विद्या नहीं है। जो होती तो ऐसी मिथ्या बातों से युक्त पुस्तक को क्यों मानते? अब देखिये खुदा का अन्याय! आप ही पृथिवी को बनाने वाला राजा न्यायाधीश है और याजूज माजूज को पृथिवी में फ़साद भी करने देता है। यह ईश्वरता की बात से विरुद्ध है। इस से ऐसी पुस्तक को जङ्गली लोग माना करते हैं; विद्वान् नहीं॥ १०८॥
१०९—और याद करो बीच किताब के मर्यम को, जब जा पड़ी लोगों अपने से मकान पूर्वी में॥ बस पड़ा उन से इधर पर्दा, बस भेजा हम ने रूह अपनी को अर्थात् फ़रिश्ता, बस सूरत पकड़ी वास्ते उस के आदमी पुष्ट की॥ कहने लगी निश्चय मैं शरण पकड़ती हूँ रहमान की तुझ से, जो है तू परहेज़गार॥ कहने लगा सिवाय इस के नहीं कि मैं भेजा हुआ हूं मालिक तेरे के से, ताकि दे जाऊं मैं तुझ को लड़का पवित्र॥ कहा कैसे होगा वास्ते मेरे लड़का नहीं हाथ लगाया मुझ को आदमी ने, नहीं मैं बुरा काम करने वाली॥ बस गर्भित हो गई साथ उस के और जा पड़ी साथ उस के मकान दूर अर्थात् जंगल में॥ —मं० ४। सि० १६। सू० १९। आ० १६।१७।१८।१९।२०-२३॥
( समीक्षक ) अब बुद्धिमान् विचार लें कि फ़रिश्ते सब खुदा की रूह हैं तो खुदा से अलग पदार्थ नहीं हो सकते। दूसरा यह अन्याय कि वह मर्यम कुमारी के लड़का होना। किसी का संग करना नहीं चाहती थी परन्तु खुदा के हुक्म से फरिश्ते ने उस को गर्भवती किया। यह न्याय से विरुद्ध बात है। यहां अन्य भी असभ्यता की बातें बहुत लिखी हैं उन को लिखना उचित नहीं समझा॥ १०९॥
११०—क्या नहीं देखा तू ने यह कि भेजा हम ने शैतानों को ऊपर काफ़िरों के बहकाते हैं उन को बहकाने कर॥ —मं० ४। सि० १६। सू० १९। आ० ८३॥
( समीक्षक ) जब खुदा ही शैतानों को बहकाने के लिये भेजता है तो बहकने वालों का कुछ दोष नहीं हो सकता और न उन को दण्ड हो सकता और न शैतानों को। क्योंकि यह खुदा के हुक्म से सब होता है। इस का फल खुदा को होना चाहिये। जो सच्चा न्यायकारी है तो उस का फल दोजख आप ही भोगे और जो न्याय को छोड़ के अन्याय को करे तो अन्यायकारी हुआ। अन्यायकारी ही पापी कहाता है॥११०॥
४५४ | सत्यार्थप्रकाशः
१११—और निश्चय क्षमा करने वाला हूँ वास्ते उस मनुष्य के तोबाः की और ईमान लाया और कर्म किये अच्छे, फिर मार्ग पाया ॥ —मं० ४। सि० १६। सू० २०। आ० ८२ ॥
( समीक्षक ) जो तोबाः से पाप क्षमा करने की बात कुरान में है यह सब को पापी कराने वाली है क्योंकि पापियों को इस से पाप करने का साहस बहुत बढ़ जाता है। इस से यह पुस्तक और इस का बनाने वाला पापियों को पाप करने में हौसला बढ़ाने वाले हैं। इस से यह पुस्तक परमेश्वरकृत और इस में कहा हुआ परमेश्वर भी नहीं हो सकता ॥ १११ ॥
११२—और किये हम ने बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे ॥ —मं० ४। सि० १७। सू० २१। आ० ३० ॥
( समीक्षक ) यदि कुरान का बनाने वाला पृथिवी का घूमना आदि जानता तो यह बात कभी नहीं कहता कि पहाड़ों के धरने से पृथिवी नहीं हिलती। शंका हुई कि जो पहाड़ नहीं धरता तो हिल जाती ! इतने कहने पर भी भूकम्प में क्यों डिग जाती है ? ॥ ११२ ॥
११३—और शिक्षा दी हम ने उस औरत को और रक्षा की उस ने अपने गुह्य अङ्गों की। बस फूंक दिया हम ने बीच उस के रूह अपनी को ॥ —मं० ४। सि० १७। सू० २१। आ० ९१ ॥
( समीक्षक ) ऐसी अश्लील बातें खुदा की पुस्तक में खुदा की क्या और सभ्य मनुष्य की भी नहीं होतीं। जब कि मनुष्यों में ऐसी बातों का लिखना अच्छा नहीं तो परमेश्वर के सामने क्योंकर अच्छा हो सकता है ? ऐसी-ऐसी बातों से कुरान दूषित होता है। यदि अच्छी बात होती तो अति प्रशंसा होती; जैसे वेदों की ॥ ११३ ॥
११४—क्या नहीं देखा तूने कि अल्लाह को सिजदा करते हैं जो कोई बीच आसमानों और पृथिवी के हैं, सूर्य और चन्द्र तारे और पहाड़, वृक्ष और जानवर ॥ पहिनाये जावेंगे बीच उस के कंगन सोने और मोती के और पहिनावा उन का बीच उसके रेशमी है ॥ और पवित्र रख घर मेरे को वास्ते गिर्द फिरने वालों के और खड़े रहने वालों के ॥ फिर चाहिये कि दूर करें मैल अपने और पूरी करें भेंटें अपनी और चारों ओर फिरें घर कदीम के ॥ ताकि नाम अल्लाह का याद करें ॥ —मं० ४। सि० १७। सू० २२। आ० १८। २३। २६। २८। ३३ ॥
( समीक्षक ) भला ! जो जड़ वस्तु हैं, परमेश्वर को जान ही नहीं सकते, फिर वे उस की भक्ति क्योंकर कर सकते हैं ? इस से यह पुस्तक ईश्वरकृत तो कभी नहीं हो सकता किन्तु किसी भ्रान्त का बनाया हुआ दीखता है। वाह ! बड़ा अच्छा स्वर्ग है जहाँ सोने मोती के गहने और रेशमी कपड़े पहिरने को मिलें। यह बहिश्त यहां के राजाओं के घर से अधिक नहीं दीख पड़ता। और जब परमेश्वर का घर है तो वह उसी घर में रहता भी होगा फिर बुतपरस्ती क्यों न हुई ? और दूसरे बुतपरस्तों का खण्डन क्यों करते हैं ? जब खुदा भेंट लेता, अपने घर की परिक्रमा करने की आज्ञा देता है और पशुओं को मरवा के खिलाता है तो यह खुदा मन्दिर वाले और भैरव, दुर्गा के सदृश हुआ और महाबुतपरस्ती का चलाने वाला हुआ क्योंकि मूर्तियों से मस्जिद बड़ा बुत् है। इस से खुदा और मुसलमान बड़े बुतपरस्त और पुराणी तथा जैनी छोटे बुतपरस्त हैं ॥ ११४ ॥
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११५-फिर निश्चय तुम दिन कयामत के उठाये जाओगे॥ —मं० ४। सि० १८। सू० २३। आ० १६॥
(समीक्षक) कयामत तक मुर्दे कब्रों में रहेंगे वा किसी अन्य जगह? जो उन्हीं में रहेंगे तो सड़े हुए दुर्गन्धरूप शरीर में रहकर पुण्यात्मा भी दुःख भोग करेंगे? यह न्याय अन्याय है। और दुर्गन्ध अधिक होकर रोगोत्पत्ति करने से खुदा और मुसलमान पापभागी होंगे॥ ११५॥
११६-उस दिन की गवाही देवेंगे ऊपर उन के ज़बानें उन की और हाथ उन के और पांव उन के साथ उस वस्तु के कि थे करते॥ अल्लाह नूर है आसमानों का और पृथिवी का, नूर उस के कि मानिन्द ताक़ की है बीच उस के दीप हो और दीप बीच कंदील शीशों के हैं, वह कंदील मानो कि तारा है चमकता, रोशन किया जाता है दीपक वृक्ष मुबारिक जैतून के से, न पूर्व की ओर है न पश्चिम की, समीप है तेल उस का रोशन हो जावे जो न लगे ऊपर रोशनी के मार्ग दिखाता है अल्लाह नूर अपने के जिस को चाहता है॥ —मं० ४। सि० १८। सू० २४। आ० २४। ३५॥
(समीक्षक) हाथ पग आदि जड़ होने से गवाही कभी नहीं दे सकते यह बात सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से मिथ्या है। क्या खुदा आगी बिजुली है? जैसा कि दृष्टान्त देते हैं ऐसा दृष्टान्त ईश्वर में नहीं घट सकता। हां! किसी साकार वस्तु में घट सकता है॥ ११६॥
११७-और अल्लाह ने उत्पन्न किया हर जानवर को पानी से बस कोई उन में से वह है कि जो चलता है पेट अपने के॥ और जो कोई आज्ञा पालन करे अल्लाह की रसूल उस के की॥ कह आज्ञा पालन करे खुदा की रसूल उस के की और आज्ञा पालन करो रसूल की ताकि दया किये जाओ॥ —मं० ४। सि० १८। सू० २४। आ० ४५। ५२। ५६॥
(समीक्षक) यह कौन सी फ़िलासफ़ी है कि जिन जानवरों के शरीर में सब तत्त्व दीखते हैं और कहना कि केवल पानी से उत्पन्न किये। यह केवल अविद्या की बात है। जब अल्लाह के साथ पैग़म्बर की आज्ञा पालन करना होता है तो खुदा का शरीक हो गया वा नहीं? यदि ऐसा है तो क्यों खुदा को लाशरीक कुरान में लिखा और कहते हो?॥ ११७॥
११८-और जिस दिन कि फट जावेगा आसमान साथ बदली के और उतारे जावेंगे फ़रिश्ते॥ बस मत कहा मान काफ़िरों का और झगड़ा कर उन से साथ झगड़ा बढ़ा॥ और बदल डालता है अल्लाह बुराइयों उन की को भलाइयों से॥ और जो कोई तोबाः करे और कर्म करे अच्छे बस निश्चय आता है तरफ अल्लाह की॥ —मं० ४। सि० १९। सू० २५। आ० २५-५२। ७०। ७१॥
(समीक्षक) यह बात कभी सच नहीं हो सकती है कि आकाश बादलों के साथ फट जावे। यदि आकाश कोई मूर्त्तिमान् पदार्थ हो तो फट सकता है। यह मुसलमानों का कुरान शान्ति भङ्ग कर गदर झगड़ा मचाने वाला है। इसीलिये धार्मिक विद्वान् लोग इस को नहीं मानते। यह भी अच्छा न्याय है कि जो पाप और पुण्य का अदला बदला हो जाय। क्या यह तिल और उड़द की सी बात है जो पलटा हो जावे? जो तोबा करने से पाप छूटे और ईश्वर मिले तो कोई भी पाप करने से न डरे। इसलिये ये सब बातें विद्या से विरुद्ध हैं॥ ११८॥
४५६ सत्यार्थप्रकाशः
११९—वही की हम ने तरफ मूसा की यह कि ले चल रात को बन्दों मेरे को, निश्चय तुम पीछा किये जाओगे॥ बस भेजे लोग फ़िरोन ने बीच नगरों के जमा करने वाले॥ और वह पुरुष कि जिसने पैदा किया मुझ को है, बस वही मार्ग दिखलाता है॥ और वह जो खिलाता है मुझ को पिलाता है मुझ को॥ और उस पुरुष की आशा रखता हूँ मैं यह कि क्षमा करे वास्ते मेरे अपराध मेरा दिन कयामत के॥ —मं० ५। सि० १९। सू० २६। आ० ५२। ५३। ७८। ७९। ८२॥
( समीक्षक ) जब खुदा ने मूसा की ओर बही भेजी पुनः दाऊद, ईसा और मुहम्मद साहेब की ओर किताब क्यों भेजी? क्योंकि परमेश्वर की बात सदा एक सी और बेभूल होती है और उस के पीछे कुरान तक पुस्तकों का भेजना पहली पुस्तक को अपूर्ण भूलयुक्त माना जायगा। यदि ये तीन पुस्तक सच्चे हैं तो यह कुरान झूठा होगा। चारों का जो कि परस्पर प्रायः विरोध रखते हैं उन का सर्वथा सत्य होना नहीं हो सकता। यदि खुदा ने रूह अर्थात् जीव पैदा किये हैं तो वे मर भी जायेंगे अर्थात् उन का कभी नाश कभी अभाव भी होगा? जो परमेश्वर ही मनुष्यादि प्राणियों को खिलाता पिलाता है तो किसी को रोग होना न चाहिये और सब को तुल्य भोजन देना चाहिये। पक्षपात से एक को उत्तम और दूसरे को निकृष्ट जैसा कि राजा और कंगले को श्रेष्ठ निकृष्ट भोजन मिलता है; न होना चाहिये। जब परमेश्वर ही खिलाने पिलाने और पथ्य कराने वाला है तो रोग ही न होने चाहिये परन्तु मुसलमान आदि को भी रोग होते हैं। यदि खुदा ही रोग छुड़ा कर आराम करने वाला है तो मुसलमानों के शरीरों में रोग न रहना चाहिये। यदि रहता है तो खुदा पूरा वैद्य नहीं है यदि पूरा वैद्य है तो मुसलमानों के शरीरों में रोग क्यों रहते हैं? यदि वही मारता और जिलाता है तो उसी खुदा को पाप पुण्य लगता होगा। यदि जन्म जन्मान्तर के कर्मानुसार व्यवस्था करता है तो उस को कुछ भी अपराध नहीं। यदि वह पाप क्षमा और न्याय कयामत की रात में करता है तो खुदा पाप बढ़ाने वाला होकर पापयुक्त होगा। यदि क्षमा नहीं करता तो यह कुरान की बात झूठी होने से बच नहीं सकती है॥ ११९॥
१२०—नहीं तू परन्तु आदमी मानिन्द हमारी बस ले आ कुछ निशानी जो है तू सच्चों से॥ कहा यह ऊंटनी है वास्ते उस के पानी पीना है एक बार॥ —मं० ५। सि० १९। सू० २६। आ० १५४। १५५॥
( समीक्षक ) भला! इस बात को कोई मान सकता है कि पत्थर से ऊंटनी निकले! वे लोग जङ्गली थे कि जिन्होंने इस बात को मान लिया। और ऊंटनी की निशानी देनी केवल जङ्गली व्यवहार है; ईश्वरकृत नहीं। यदि यह किताब ईश्वरकृत होती तो ऐसी व्यर्थ बातें इस में न होतीं॥ १२०॥
१२१—ऐ मूसा बात यह है कि निश्चय मैं अल्लाह हूँ ग़ालिब॥ और डाल दे असा अपना, बस जब कि देखा उस को हिलता था मानो कि वह सांप है...ऐ मूसा मत डर, निश्चय नहीं डरते समीप मेरे पैग़म्बर॥ अल्लाह नहीं कोई माबूद परन्तु वह मालिक अर्श बड़े का॥ यह कि मत सरकशी करो ऊपर मेरे और चले आओ मेरे पास मुसलमान होकर॥ —मं० ५। सि० १९। सू० २७। आ० ९। १०। २६। ३१॥
( समीक्षक ) और भी देखिये अपने मुख आप अल्लाह बड़ा ज़बरदस्त बनता है। अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना श्रेष्ठ पुरुष का भी काम नहीं; खुदा
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का क्योंकर हो सकता है? तभी तो इन्द्रजाल का लटका दिखला जङ्गली मनुष्यों को वश कर आप जंगलस्थ खुदा बन बैठा। ऐसी बात ईश्वर के पुस्तक में कभी नहीं हो सकती। यदि वह बड़े अर्श अर्थात् सातवें आसमान का मालिक है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता है। यदि सरकशी करना बुरा है तो खुदा और मुहम्मद साहेब ने अपनी स्तुति से पुस्तक क्यों भर दिये? मुहम्मद साहेब ने अनेकों को मारे इस से सरकशी हुई वा नहीं? यह कुरान पुनरुक्त और पूर्वापर विरुद्ध बातों से भरा हुआ है॥ १२१॥
१२२—और देखेगा तू पहाड़ों को अनुमान करता है तू उन को जमे हुए और वे चले जाते हैं मानिन्द चलने बादलों की, कारीगरी अल्लाह की जिसने दृढ़ किया हर वस्तु को, निश्चय वह खबरदार है उस वस्तु के कि करते हो॥ —मं० ५। सि० २०। सू० २७। आ० ८७। ८८॥
( समीक्षक ) बदलों के समान पहाड़ का चलना कुरान बनाने वालों के देश में होता होगा; अन्यत्र नहीं। और खुदा की ख़बरदारी तो शैतान बाग़ी को न पकड़ने और न दण्ड देने से ही विदित होती है कि जिस ने एक बाग़ी को भी अब तक न पकड़ पाया; न दण्ड दिया। इस से अधिक असावधानी क्या होगी॥ १२२॥
१२३—बस मुष्ट मारा उस को मूसा ने, बस पूरी की आयु उस की॥ कहा ऐ रब मेरे, निश्चय मैंने अन्याय किया जान अपनी को, बस क्षमा कर मुझ को, बस क्षमा कर दिया उस को, निश्चय वह क्षमा करने वाला दयालु है॥ और मालिक तेरा उत्पन्न करता है, जो कुछ चाहता है और पसन्द करता है॥ —मं० ५। सि० २०। सू० २८। आ० १५। १६। ६८॥
( समीक्षक ) अब अन्य भी देखिये मुसलमान और ईसाइयों के पैग़म्बर और खुदा कि मूसा पैग़म्बर मनुष्य की हत्या किया करे और खुदा क्षमा किया करे। ये दोनों अन्यायकारी हैं वा नहीं? क्या अपनी इच्छा ही से जैसा चाहता है वैसी उत्पत्ति करता है? क्या उस ने अपनी इच्छा ही से एक को राजा दूसरे को कङ्गाल और एक को विद्वान् दूसरे को मूर्खादि किया है? यदि ऐसा है तो न कुरान सत्य और न अन्यायकारी होने से यह खुदा ही हो सकता है॥ १२३॥
१२४—और आज्ञा दी हम ने मनुष्य को साथ मा बाप के भलाई करना और जो झगड़ा करें तुझ से दोनों यह कि शरीक लावे तू साथ मेरे उस वस्तु को, कि नहीं वास्ते तेरे साथ उस के ज्ञान, बस मत कहा मान उन दोनों का, तर्फ मेरी है॥ और अवश्य भेजा हम ने नूह को तर्फ कौम उस के कि बस रहा बीच उन के हज़ार वर्ष परन्तु पचास वर्ष कम॥ —मं० ५। सि० २०। सू० २९। आ० ८। १४॥
( समीक्षक ) माता-पिता की सेवा करना अच्छा ही है जो खुदा के साथ शरीक करने के लिये कहे तो उन का कहना न मानना यह भी ठीक है परन्तु यदि माता पिता मिथ्याभाषणादि करने की आज्ञा देवें तो क्या मान लेना चाहिये? इसलिये यह बात आधी अच्छी और आधी बुरी है। क्या नूह आदि पैग़म्बरों ही को खुदा संसार में भेजता है तो अन्य जीवों को कौन भेजता है? यदि सब को वही भेजता है तो सभी पैग़म्बर क्यों नहीं? और जो प्रथम मनुष्यों की हज़ार वर्ष की आयु होती थी तो अब क्यों नहीं होती? इसलिये यह बात ठीक नहीं॥ १२४॥
१२५—अल्लाह पहिली बार करता है उत्पत्ति, फिर दूसरी बार करेगा उस
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को, फिर उसी की ओर फेरे जाओगे॥ और जिस दिन वर्षा अर्थात् खड़ी होगी कयामत निराश होंगे पापी॥ बस जो लोग कि ईमान लाये और काम किये अच्छे बस वे बीच बाग़ के सिंगार किये जावेंगे॥ और जो भेज दें हम एक बाव, बस देखें उसी खेती को पीली हुई॥ इसी प्रकार मोहर रखता है अल्लाह ऊपर दिलों उन लोगों के कि नहीं जानते॥ —मं० ५। सि० २१। सू० ३०। आ० ११। १२। १५। ५१। ५९॥
( समीक्षक ) यदि अल्लाह दो बार उत्पत्ति करता है तीसरी बार नहीं तो उत्पत्ति की आदि और दूसरी बार के अन्त में निकम्मा बैठा रहता होगा? और एक तथा दो बार उत्पत्ति के पश्चात् उस का सामर्थ्य निकम्मा और व्यर्थ हो जायगा। यदि न्याय करने के दिन पापी लोग निराश हों तो अच्छी बात है परन्तु इस का प्रयोजन यह तो कहीं नहीं है कि मुसलमानों के सिवाय सब पापी समझ कर निराश किये जायें? क्योंकि कुरान में कई स्थानों में पापियों से औरों का ही प्रयोजन है। यदि बगीचे में रखना और शृंगार पहिराना ही मुसलमानों का स्वर्ग है तो इस संसार के तुल्य हुआ और वहाँ माली और सुनार भी होंगे अथवा खुदा ही माली और सुनार आदि का काम करता होगा। यदि किसी को कम गहना मिलता होगा तो चोरी भी होती होगी और बहिश्त से चोरी करने वालों को दोज़ख में भी डालता होगा। यदि ऐसा होता होगा तो सदा बहिश्त में रहेंगे यह बात झूठ हो जायगी। जो किसानों की खेती पर भी खुदा की दृष्टि है सो यह विद्या खेती करने के अनुभव ही से होती है। और यदि माना जाय कि खुदा ने अपनी विद्या से सब बात जान ली है तो ऐसा भय देना अपना घमण्ड प्रसिद्ध करना है। यदि अल्लाह ने जीवों के दिलों पर मोहर लगा पाप कराया तो उस पाप का भागी वही होवे जीव नहीं हो सकते। जैसे जय पराजय सेनाधीश का होता है वैसे यह सब पाप खुदा ही को प्राप्त होवे॥ १२५॥
१२६—ये आयतें हैं किताब हिक्मत वाले की॥ उत्पन्न किया आसमानों को बिना सुतून अर्थात् खम्भे के देखते हो तुम उस को और डाले बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे॥ क्या नहीं देखा तूने यह कि अल्लाह प्रवेश कराता है दिन को बीच रात के॥ क्या नहीं देखा कि किश्तियां चलती हैं बीच दर्य्या के साथ निआमतों अल्लाह के, ताकि दिखलावे तुम को निशानियां अपनी॥ —मं० ५। सि० २१। सू० ३१। आ० २। १०। २९। ३१॥
( समीक्षक ) वाह जी वाह! हिक्मतवाली किताब ! कि जिस में सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उस में खम्भे लगाने की शंका और पृथिवी को स्थिर रखने के लिये पहाड़ रखना। थोड़ी सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता और हिक्मत देखो कि जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं और जहाँ रात है वहाँ दिन नहीं। उस को एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है यह बड़े अविद्वानों की बात है। इसलिये यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्याविरुद्ध बात नहीं है कि नौका मनुष्य और क्रिया कौशलादि से चलती हैं वा खुदा की कृपा से? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बना कर समुद्र में चलावें तो खुदा की निशानी डूब जाय वा नहीं? इसलिये यह पुस्तक न विद्वान् और न ईश्वर का बनाया हुआ हो सकता है॥ १२६॥
१२७—तदबीर करता है काम की आसमान से तर्फ़ पृथिवी की फिर चढ़ जाता है तर्फ़ उस की बीच एक दिन के कि है अवधि उसकी सहस्र वर्ष उन
चतुर्दशसमुल्लासः । ४५९
वर्षों से कि गिनते हो तुम॥ यह है जानने वाला गैब का और प्रत्यक्ष का ग़ालिब दयालु॥ फिर पुष्ट किया उस को और फूंका बीच रूह अपनी से॥ कह कब्ज करेगा तुम को फरिश्ता मौत का वह जो नियत किया गया है साथ तुम्हारे॥ और जो चाहते हम अवश्य देते हम हर एक जीव को शिक्षा उस की, परन्तु सिद्ध हुई बात मेरी ओर से कि अवश्य भरूँगा मैं दोज़ख को जिनों से और आदमियों से इकट्ठे॥ —मं० ५। सि० २१। सू० ३२। आ० ५।६।९।११।१३॥
( समीक्षक ) अब ठीक सिद्ध हो गया कि मुसलमानों का खुदा मनुष्यवत् एकदेशी है। क्योंकि जो व्यापक होता तो एकदेश से प्रबन्ध करना और उतरना चढ़ना नहीं हो सकता। यदि खुदा फ़रिश्ते को भेजता है तो भी आप एकदेशी हो गया। आप आसमान पर टंगा बैठा है और फ़रिश्तों को दौड़ाता है। यदि फ़रिश्ते रिश्वत लेकर कोई मामला बिगाड़ दें वा किसी मुर्दे को छोड़ जायें तो खुदा को क्या मालूम हो सकता है? मालूम तो उस को हो कि जो सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापक हो, सो तो है ही नहीं; होता तो फरिश्तों के भेजने तथा कई लोगों की कई प्रकार से परीक्षा लेने का क्या काम था? और एक हजार वर्षों में तथा आने जाने प्रबन्ध करने से सर्वशक्तिमान् भी नहीं। यदि मौत का फ़रिश्ता है तो उस फ़रिश्ते का मारने वाला कौन सा मृत्यु है? यदि वह नित्य है तो अमरपन में खुदा के बराबर शरीक हुआ। एक फ़रिश्ता एक समय में दोज़ख भरने के लिये जीवों को शिक्षा नहीं कर सकता और उन को विना पाप किये अपनी मर्जी से दोज़ख भर के उन को दुःख देकर तमाशा देखता है तो वह खुदा पापी अन्यायकारी और दयाहीन है! ऐसी बातें जिस पुस्तक में हों न वह विद्वान् और ईश्वरकृत और जो दया न्यायहीन है वह ईश्वर भी कभी नहीं हो सकता॥ १२७॥
१२८—कह कि कभी न लाभ देगा भागना तुम को जो भागो तुम मृत्यु वा कत्ल से॥ ऐ बीबियो नबी की! जो कोई आवे तुम में से निर्लज्जता प्रत्यक्ष के, दुगुणा किया जायेगा वास्ते उसके अज़ाब और है यह ऊपर अल्लाह के सहल॥ —मं० ५। सि० २१। सू० ३३। आ० १५। ३०॥
( समीक्षक ) यह मुहम्मद साहेब ने इसलिये लिखा लिखवाया होगा कि लड़ाई में कोई न भागे, हमारा विजय होवे, मरने से भी न डरे, ऐश्वर्य बढ़े, मज़हब बढ़ा लेवें? और यदि बीबी निर्लज्जता से न आवे तो क्या पैग़म्बर साहेब निर्लज्ज हो कर आवें? बीबियों पर अज़ाब हो और पैग़म्बर साहेब पर अज़ाब न होवे। यह किस घर का न्याय है?॥ १२८॥
१२९—और अटकी रहो बीच घरों अपने के, आज्ञा पालन करो अल्लाह और रसूल की; सिवाय इसके नहीं॥ बस जब अदा कर ली ज़ैद ने हाज़ित उस से, ब्याह दिया हम ने तुझ से उस को ताकि न होवे ऊपर ईमान वालों के तंगी बीच बीबियों से ले पालकों उन के के, जब अदा कर लें उन से हाजित और है आज्ञा खुदा की की गई॥ नहीं है ऊपर नबी के कुछ तंगी बीच उस वस्तु के॥ नहीं है मुहम्मद बाप किसी मर्द का॥ और हलाल की स्त्री ईमानवाली जो देवे बिना महर के जान अपनी वास्ते नबी के॥ ढील देवे तू जिस को चाहे उन में से और जगह देवे तर्फ अपनी जिस को चाहे, नहीं पाप ऊपर तेरे॥ ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो मत प्रवेश करो घरों में पैग़म्बर के॥ —मं० ५। सि० २१। सू० ३३। आ० ३३।३६।३७।४०।५०।५१।५२॥
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क्या अल्लाह और रसूल को दुःख देने का निषेध करने से यह नहीं सिद्ध होता कि अल्लाह और रसूल जिस को चाहें दुःख देवें ? अन्य सब को दुःख देना चाहिये ? जैसे मुसलमानों और मुसलमानों की स्त्रियों को दुःख देना बुरा है तो इन से अन्य मनुष्यों को दुःख देना भी अवश्य बुरा है ॥ जो ऐसा न माने तो उस की यह बात भी पक्षपात की है। वाह ग़दर मचाने वाले खुदा और नबी ! जैसे ये निर्दयी संसार में हैं वैसे और बहुत थोड़े होंगे। जैसा यह कि अन्य लोग जहाँ पाये जावें, मारे जावें पकड़े जावें, लिखा है वैसी ही मुसलमानों पर कोई आज्ञा देवे तो मुसलमानों को यह बात बुरी लगेगी वा नहीं ? वाह क्या हिंसक पैगम्बर आदि हैं कि जो परमेश्वर से प्रार्थना करके अपने से दूसरों को दुगुण दुःख देने के लिये प्रार्थना करना लिखा है। यह भी पक्षपात मतलबसिन्धुपन और महा अधर्म की बात है। इसी से अब तक भी मुसलमान लोगों में से बहुत से शठ लोग ऐसा ही कर्म करने में नहीं डरते। यह ठीक है कि सुशिक्षा के विना मनुष्य पशु के समान रहता है ॥ १३० ॥
१३१—और अल्लाह वह पुरुष है कि भेजता है हवाओं को बस उठाती हैं बादलों को, बस हांक लेते हैं तर्फ शहर मुर्दे की, बस जीवित किया हम ने साथ उस के पृथिवी को पीछे मृत्यु उस की के, इसी प्रकार कब्रों में से निकालना है॥ जिस ने उतारा बीच घर सदा रहने के दया अपनी से, नहीं लगती हम को बीच उस के मेहनत और नहीं लगती बीच उस के माँदगी॥ —मं० ५। सि० २२। सू० ३५। आ० ९। ३५॥
( समीक्षक ) वाह क्या फ़िलासफ़ी खुदा की है। भेजता है वायु को, वह उठाता फिरता है बदलों को ! और खुदा उस से मुर्दों को जिलाता फिरता है ! यह बात ईश्वर सम्बन्धी कभी नहीं हो सकती, क्योंकि ईश्वर का काम निरन्तर एक सा होता रहता है। जो घर होंगे वे विना बनावट के नहीं हो सकते और जो बनावट का है वह सदा नहीं रह सकता। जिस के शरीर है वह परिश्रम के विना दुःखी होता और शरीर वाला रोगी हुए विना कभी नहीं बचता। जो एक स्त्री से समागम करता है वह विना रोग के नहीं बचता तो जो बहुत स्त्रियों से विषयभोग करता है उस की क्या ही दुर्दशा होती होगी ? इसलिये मुसलमानों का रहना बहिश्त में भी सुखदायक सदा नहीं हो सकता ॥ १३१ ॥
१३२—कसम है कुरान दृढ़ की॥ निश्चय तू भेजे हुओं से है॥ ऊपर मार्ग सीधे के॥ उतारा है ग़ालिब दयावान् ने॥ —मं० ५। सि० २३। सू० ३६। आ० २। ३। ४। ५॥
( समीक्षक ) अब देखिये ! यह कुरान खुदा का बनाया होता तो वह इस की सौगन्द क्यों खाता ? यदि नबी खुदा का भेजा होता तो (लेपालक) बेटे की स्त्री पर मोहित क्यों होता ? यह कथनमात्र है कि कुरान के मानने वाले सीधे मार्ग पर हैं। क्योंकि सीधा मार्ग वही होता है जिस में सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना, पक्षपात रहित न्याय धर्म्म का आचरण करना आदि हैं और इन से विपरीत का त्याग करना। सो न कुरान में न मुसलमानों में और न इन के खुदा में ऐसा स्वभाव है। यदि सब पर प्रबल पैग़म्बर मुहम्मद साहेब होते तो सब से अधिक विद्यावान् और शुभगुणयुक्त क्यों न होते ? इसलिये जैसे कूंजड़ी अपने बेरों को खट्टा नहीं बतलाती वैसी यह बात भी है ॥ १३२ ॥
४६२ | सत्यार्थप्रकाशः
१३३—और फूंका जावेगा बीच सूर के बस नागहां व कबरों में से तर्फ़ मालिक अपने की दौड़ेंगे॥ और गवाही देंगे पांव उन के साथ उस वस्तु के थे कमाते॥ सिवाय इसके नहीं कि आज्ञा उस की जब चाहे उत्पन्न करना किसी वस्तु को यह कि कहता वास्ते उस के कि ‘हो जा’, बस हो जाता है॥ —मं० ५। सि० २३। सू० ३६। आ० ५१। ६६। ८२॥
(समीक्षक) अब सुनिये ऊटपटांग बातें! पग कभी गवाही दे सकते हैं? खुदा के सिवाय उस समय कौन था जिस को आज्ञा दी? किस ने सुनी? और कौन बन गया? यदि न थी तो यह बात झूठी और जो थी तो वह बात—जो सिवाय खुदा के कुछ चीज नहीं थी और खुदा ने सब कुछ बना दिया—वह झूठी ॥१३३॥
१३४—फिराया जावेगा उनके ऊपर पियाला शराब शुद्ध का॥ सफेद मज़ा देने वाली वास्ते पीने वालों के॥ समीप उन के बैठी होंगी नीचे आंख रखने वालियाँ, सुन्दर आंखों वालियां॥ मानो कि वे अण्डे हैं छिपाये हुए॥ क्या बस हम नहीं मरेंगे॥ और अवश्य लूत निश्चय पैगम्बरों से था॥ जब कि मुक्ति दी हम ने उस को और लोगों उस के को सब को॥ परन्तु एक बुढ़िया पीछे रहने वालों में है॥ फिर मारा हम ने औरों को॥ —मं० ६। सि० २३। सू० ३७। आ० ४५। ४६। ४८। ४९। ५६। १२७। १२८। १२९॥
(समीक्षक) क्यों जी! यहां तो मुसलमान लोग शराब को बुरा बतलाते हैं परन्तु इन के स्वर्ग में तो नदियां की नदियां बहती हैं। इतना अच्छा है कि यहां तो किसी प्रकार मद्य पीना छुड़ाया परन्तु यहां के बदले वहाँ उन के स्वर्ग में बड़ी खराबी है! मारे स्त्रियों के वहाँ किसी का चित्त स्थिर नहीं रहता होगा! और बड़े-बड़े रोग भी होते होंगे! यदि शरीर वाले होंगे तो अवश्य मरेंगे और जो शरीर वाले न होंगे तो भोग विलास ही न कर सकेंगे। फिर उन के स्वर्ग में जाना व्यर्थ है। यदि लूत को पैग़म्बर मानते हो तो जो बाइबल में लिखा है कि उस से उस की लड़कियों ने समागम करके दो लड़के पैदा किये इस बात को भी मानते हो वा नहीं? जो मानते हो तो ऐसे को पैग़म्बर मानना व्यर्थ है। और जो ऐसे और ऐसे के सङ्गियों को खुदा मुक्ति देता है तो वह खुदा भी वैसा ही है। क्योंकि बुढ़िया की कहानी कहने वाला और पक्षपात से दूसरों को मारने वाला खुदा कभी नहीं हो सकता। ऐसा खुदा मुसलमानों ही के घर में रह सकता है; अन्यत्र नहीं॥१३४॥
१३५—बहिश्तें हैं सदा रहने की खुले हुए हैं दर उन के वास्ते उन के॥ तकिये किये हुए बीच उन के मंगावेंगे बीच इस के मेवे और पीने की वस्तु॥ और समीप होंगी उनके, नीचे रखने वालियां दृष्टि और दूसरों से समायु॥ बस सिज़दा किया फ़रिश्तों ने सब ने॥ परन्तु शैतान ने न माना अभिमान किया और था काफ़िरों से॥ ऐ शैतान किस वस्तु ने रोका तुझ को यह कि सिज़दा करे वास्ते उस वस्तु के कि बनाया मैंने साथ दोनों हाथ अपने के, क्या अभिमान किया तूने वा था तू बड़े अधिकार वालों से ॥ कहा कि मैं अच्छा हूँ उस वस्तु से, उत्पन्न किया तूने मुझ को आग से, उस को मिट्टी से॥ कहा बस निकल इन आसमानों में से, बस निश्चय तू चलाया गया है॥ निश्चय ऊपर तेरे लानत है मेरी दिन जज़ा तक॥ कहा ऐ मालिक मेरे, ढील दे उस दिन तक कि उठाये जावेंगे मुर्दे॥ कहा कि बस निश्चय तू ढील दिये गयों से है ॥ उस दिन समय ज्ञात तक॥ कहा कि बस कसम है