सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
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धूम्रपान की तरह मदिराप्रेमियों को भी अन्ननली का कैंसर तथा यकृत व मुँह के रोग हो सकते हैं। मद्यपान से शरीर में विटामिन 'बी' की भी कमी हो सकती है। इसके अलावा शराब छोटी आँतों के थायमिन व फोलिक अम्ल का अवशोषण करने वाले स्थान को भी क्षतिग्रस्त कर देती है। इसका फल यह होता है कि शरीर की अंदरूनी कार्यप्रणाली अव्यवस्थित और जर्जर होने लगती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब का नशा शरीर में तो गड़बड़ी पैदा ही करता है, यह मन में भी गड़बड़ी फैलाता है। अगर, मन में गड़बड़ी आ जाए तो विचारों में गड़बड़ी आना लाजिमी ही है और आखिरकार शराबी की वाणी का भी लड़खड़ाना अनिवार्य हो ही जाता है।
अभी तक जिस तरह के व्यसनों की चर्चा की गई है उनसे प्रायः पूरा समाज परिचित है, परंतु अब नशे के इतने सारे नए-नए रूप पैदा हो गए हैं कि उनकी खोज-खबर रख पाना भी एक टेढ़ा काम है। इस संदर्भ में नशीली दवाइयों की चर्चा कर देना विशेष ज़रूरी है क्योंकि नशे के इस तरीके ने घर-परिवार और समाज के सीमित दायरों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर भी गम्भीर समस्याएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था 'इंटरनेशनल नारकोटिक ड्रग कंट्रोल बोर्ड' ने चेतावनी दी है कि नशीली दवाइयों की खपत जिस गति से पूरी दुनिया में बढ़ रही है, उसके चलते कई देशों की सुरक्षा के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। मौजूदा हालात ये हैं कि अमरीका, इंग्लैण्ड, जापान, चीन, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि अमीर-गरीब सभी देश ही नशे के व्यापारियों के जाल में फँसते जा रहे हैं।
एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ़ अमरीका जैसे देश में ही ग्यारह करोड़ से अधिक लोग नशीली दवाइयों के शिकार बन चुके हैं। अमरीका की संस्था 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ड्रग एव्यूस' की रिपोर्ट के मुताबिक 30 से 40 प्रतिशत अमरीकी बच्चे नशीली दवाइयों का इस्तेमाल करने लगे हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ नशीली दवाइयों के सेवन में भी बढ़ोतरी हो रही है, यह चिंताजनक और भयावह तस्वीर है। इसके अलावा अमरीका में करीब 50 लाख लोग कोकीन, 2 करोड़ लोग मार्जुआना तथा 50 लाख लोग हिरोइन का भी नशा करते हैं। अनुमान है कि हिन्दुस्तान में दस से पन्द्रह करोड़ लोग भाँग, गाँजा, चरस, हिरोइन, एल.एस.डी. तथा विभिन्न नशीली दवाइयों की आदत के शिकार हैं। आलम यह है कि अब होटल, ढाबे, स्कूल, कॉलेज से लेकर झुग्गी झोपड़ियों तक में नशीली दवाइयों के अड़डे बनते जा रहे हैं। महानगरों की स्थिति इस मामले में ज्यादा भयावह है। देश की युवा-पीढ़ी बुरी तरह दिग्भ्रमित हो रही है।
नशीली दवाइयों में अफीम, मार्फिन, पैथेडिन, हिरोइन, मैक्सिकन कैकटस, भाँग, गाँजा, चरस, एल.एस.डी., मेथम फेहाइन, शाबएफिटेमिन, कोकीन, हिरोइन ग्रुप की दवा बारविचुरेट्स, मनोदैहिक एवं नींद लाने वाली दवा कम्पोज, लारपोज, तिबरियम, वैलियम आदि का इस्तेमाल नशेबाज़ धड़ल्ले से करते हैं। ये सभी नशीली दवाइयों मूर्छा, बेहोशी, जड़ता तथा संवेदनहीनता पैदा करती हैं। इन दवाइयों की गिरफ़्त में फँसने की एक वजह यह भी है कि ये दर्द, पीड़ा एवं शूल से मुक्ति तथा जटिल समस्याओं एवं परिस्थितियों से जूझने का भ्रम पैदा करती हैं। जबकि अंतिम परिणाम यह होता है कि समस्याएँ और जटिल हो जाती हैं।
वास्तव में नशीली दवाइयों और तरह-तरह के व्यसनों का प्रचलन युवा पीढ़ी में जिस तेज़ी से बढ़ रहा है, उसके चलते स्वास्थ्य के साथ-साथ चरित्र, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पर
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