भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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सप्तम पटल ] [ १५६ वीणामक्षगुणं सुधाढ्यकलशं विद्यां च तुङ्गस्तनी । दिव्यैराभरणैर्विभूषिततनुं हंसाधिरूढा भजे ।६१ जपेद्द्वादशलक्षाणि तत्सहस्रं सिताम्बुजैः । नागचम्पकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ।६२ मातृ कोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण तान्। वर्णाब्जेनासनं कुर्यान्मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६३ अब हंस वाणीश्वरी मन्त्र का उद्धार बताया जाता है-प्रणव, माया भुवनेश्वरी, अक्षर-ऐ, बिन्दु शक्ति-प्रणव-सरस्वती जो चतुर्थी विभक्ति से युक्त हो अन्त में नमः-यह पद है, यह ग्यारह अक्षरों वाला मन्त्र होता है ।८८। मन्त्रधारी को चाहिए कि वह ब्रह्मरन्ध्र-भ्रू ओं के मध्य में और क्रम से नौ रन्ध्रों में मन्त्र के वर्णों का न्यास करे और वाग्भव से अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।६०। ध्यान बताया जाता है-पूर्ण चन्द्र से उज्ज्वल मुख से युत, कपूर और कुन्द के समान प्रभा वाली- चन्द्र से अंकित मस्तक से संयुत, आदर के साथ अपने कर कमलों में वीणा, अक्षमाला, सुधा से पूरित कलश और विद्या को धारण करती हुई, उन्नत वक्षोजी वाली, दिव्य आभूषणों से भूषित शरीर से समन्वित हंस पर समारूढा देवी का सेवन करता है ।६१। इस मन्त्र का बारह लाख जप और उसकी सहस्र श्वेत कमलों से अथवा नाग चम्पक के पुष्पों से साधकोत्तम होम करे ।६२। मातृका में उक्त पीठ पर आगे बताये जाने वाले क्रम से यजन करना चाहिए । वर्णाब्ज के द्वारा आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये । ।६३। देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ् मयी तनुः । प्राकृता वामतः पूज्या वाङ् मयी सर्वसिद्धिदा ।६४ इष्ट्वा पूर्ववदङ्गानि प्रज्ञाद्याः पूजयेत्ततः । प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ।६५