भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१५८ ] [ श्री शारदा तिलक हविष्याशी जपेत्सम्यग्वसुलक्षमनत्यधीः । दशांशं जुहुतादन्ते तिलैराज्यपरिप्लुतैः ।८४ मातृकोक्ते यजेत्पीठे देवीं प्रागीरिते क्रमात् । पिवेत्तन्मन्त्रितं तोयं प्रातःकाले दिनेदिने ।८५ विद्वान्वत्सरतो मन्त्री भवेन्नास्ति विचारणा ।८६ अभिषिञ्चेज्जलैर्जप्तैरात्मानं स्नानकर्मणि । तर्पयेत्तां जलैःशुद्धै रतिमेधामवाप्नुयात् ।८७ पुष्पगन्धादिकं सर्वं तज्जप्तं धारयेत्सुधीः । सभायां पूज्यते सद्भिर्वादे च विजयी भवेत् ।८८ हविष्य के अशन करने वाला, अनन्य बुद्धि वाला भली-भाँति आठ लाख मन्त्र का जाप करे तथा जप का दशांश आज्य से परिप्लुत तिलों से होम अन्त में करना चाहिए । मातृकाओं में कथित पीठ पर जो पूर्व में कहा गया है। उस पर क्रम से यजन करना चाहिए । उस मन्त्र में अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में प्रतिदिन पान करना चाहिए । ।८४।८५। मन्त्रधारी एक ही वर्ष में विद्वान् हो जाया करता है—इसमें कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है ।८६। स्नान के कर्म में जप किए हुए जल से अपने आपका अभिषेक करे और जल से उस देवी का तर्पण करे तो अत्यधिक मेधा की प्राप्ति किया करता हैं ।८७। पुष्प और गन्ध आदि सभी को उस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करके धारण करना चाहिए । वह सुधी पुरुष सभामें सत्पुरुषों के द्वारा पूजित हुआ करता है और वह वाद में विजयी होता है ।८८। तारो मायाऽधरो बिन्दुः शक्तिस्तारः सरस्वती । ङेन्तोन्त्यन्तिकोमन्त्रः प्रोक्त एकादशाक्षरः ।८६ ब्रह्मारन्ध्रभ्रुवोर्मध्ये नवरन्ध्रेषु च क्रमात् । मंत्रवर्णान्न्यसेन्मन्त्री वाग्भवेनाङ्गकल्पना ।६० वाणीं पूर्णनिशाकरोज्ज्वलमुखीं कर्पूरकुन्दप्रभां चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकां निजकरैः संविभ्रतीमादरात् ।