शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
१५८ ] [ श्री शारदा तिलक हविष्याशी जपेत्सम्यग्वसुलक्षमनत्यधीः । दशांशं जुहुतादन्ते तिलैराज्यपरिप्लुतैः ।८४ मातृकोक्ते यजेत्पीठे देवीं प्रागीरिते क्रमात् । पिवेत्तन्मन्त्रितं तोयं प्रातःकाले दिनेदिने ।८५ विद्वान्वत्सरतो मन्त्री भवेन्नास्ति विचारणा ।८६ अभिषिञ्चेज्जलैर्जप्तैरात्मानं स्नानकर्मणि । तर्पयेत्तां जलैःशुद्धै रतिमेधामवाप्नुयात् ।८७ पुष्पगन्धादिकं सर्वं तज्जप्तं धारयेत्सुधीः । सभायां पूज्यते सद्भिर्वादे च विजयी भवेत् ।८८ हविष्य के अशन करने वाला, अनन्य बुद्धि वाला भली-भाँति आठ लाख मन्त्र का जाप करे तथा जप का दशांश आज्य से परिप्लुत तिलों से होम अन्त में करना चाहिए । मातृकाओं में कथित पीठ पर जो पूर्व में कहा गया है। उस पर क्रम से यजन करना चाहिए । उस मन्त्र में अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में प्रतिदिन पान करना चाहिए । ।८४।८५। मन्त्रधारी एक ही वर्ष में विद्वान् हो जाया करता है—इसमें कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है ।८६। स्नान के कर्म में जप किए हुए जल से अपने आपका अभिषेक करे और जल से उस देवी का तर्पण करे तो अत्यधिक मेधा की प्राप्ति किया करता हैं ।८७। पुष्प और गन्ध आदि सभी को उस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करके धारण करना चाहिए । वह सुधी पुरुष सभामें सत्पुरुषों के द्वारा पूजित हुआ करता है और वह वाद में विजयी होता है ।८८। तारो मायाऽधरो बिन्दुः शक्तिस्तारः सरस्वती । ङेन्तोन्त्यन्तिकोमन्त्रः प्रोक्त एकादशाक्षरः ।८६ ब्रह्मारन्ध्रभ्रुवोर्मध्ये नवरन्ध्रेषु च क्रमात् । मंत्रवर्णान्न्यसेन्मन्त्री वाग्भवेनाङ्गकल्पना ।६० वाणीं पूर्णनिशाकरोज्ज्वलमुखीं कर्पूरकुन्दप्रभां चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकां निजकरैः संविभ्रतीमादरात् ।
सप्तम पटल ] [ १५६ वीणामक्षगुणं सुधाढ्यकलशं विद्यां च तुङ्गस्तनी । दिव्यैराभरणैर्विभूषिततनुं हंसाधिरूढा भजे ।६१ जपेद्द्वादशलक्षाणि तत्सहस्रं सिताम्बुजैः । नागचम्पकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ।६२ मातृ कोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण तान्। वर्णाब्जेनासनं कुर्यान्मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६३ अब हंस वाणीश्वरी मन्त्र का उद्धार बताया जाता है-प्रणव, माया भुवनेश्वरी, अक्षर-ऐ, बिन्दु शक्ति-प्रणव-सरस्वती जो चतुर्थी विभक्ति से युक्त हो अन्त में नमः-यह पद है, यह ग्यारह अक्षरों वाला मन्त्र होता है ।८८। मन्त्रधारी को चाहिए कि वह ब्रह्मरन्ध्र-भ्रू ओं के मध्य में और क्रम से नौ रन्ध्रों में मन्त्र के वर्णों का न्यास करे और वाग्भव से अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।६०। ध्यान बताया जाता है-पूर्ण चन्द्र से उज्ज्वल मुख से युत, कपूर और कुन्द के समान प्रभा वाली- चन्द्र से अंकित मस्तक से संयुत, आदर के साथ अपने कर कमलों में वीणा, अक्षमाला, सुधा से पूरित कलश और विद्या को धारण करती हुई, उन्नत वक्षोजी वाली, दिव्य आभूषणों से भूषित शरीर से समन्वित हंस पर समारूढा देवी का सेवन करता है ।६१। इस मन्त्र का बारह लाख जप और उसकी सहस्र श्वेत कमलों से अथवा नाग चम्पक के पुष्पों से साधकोत्तम होम करे ।६२। मातृका में उक्त पीठ पर आगे बताये जाने वाले क्रम से यजन करना चाहिए । वर्णाब्ज के द्वारा आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये । ।६३। देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ् मयी तनुः । प्राकृता वामतः पूज्या वाङ् मयी सर्वसिद्धिदा ।६४ इष्ट्वा पूर्ववदङ्गानि प्रज्ञाद्याः पूजयेत्ततः । प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ।६५
१६० ] [ श्री शारदा तिलक स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्राह्मयाद्यास्तदनन्तरम्। लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि त तद्बहिः ।६६ इति सम्पूजयेद्देवी साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत्। दशाक्षरीसमुक्तानि कर्माण्यत्रापि साधकः ।६७ वाचस्पतेऽमृतेभूयः प्लुतः प्लुरितिकीर्तयेत् । वागाद्यो मुनिभिः प्रोक्तो रुद्रसंख्याक्षरो मनुः ।६८ कुर्यादंगानि विधिवद्वागाद्यैः पञ्चभिः पदैः ।६६ आसीना कमले करैर्जपवटीं पद्मद्वयं पुस्तकं विभ्राणा तरुणेन्दुबद्ध मुकुटा मुक्तेन्दुकुन्दप्रभा। भालोन्मीलितलोचना कुचभराक्रान्ता भवद्भूतये भूयाद्वागधिदेवता मुतिगणैरासेव्यमानाऽनिशम् ।१०० देवी के दक्षिण की ओर संस्कार की हुई वाङ्मयी तनु का पूजन करना चाहिए। प्राकृता का वाम भाग में पूजन करे। यह वाङ्मयी सब सिद्धियों के देने वाली है।६४। पूर्वकी तरह अङ्गों का यजन करके फिर ब्रह्मादि का पूजन करे। प्रज्ञा-मेधा-श्रुति-शक्ति स्मृति वागीश्वरी- मति ओर स्वस्ति का पूजन करके उसको अनन्तर ब्राह्मी आदि का यजन करना चाहिए। फिर लो केशों का अर्चन कर उनके वाहिर उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिए ।६४।६५। इस रीति से देवी का भली-भांति अर्चन करने से पूजक साक्षात् वाक्का वल्लभ हो जाता है। यहां पर भी दशाक्षरी में कथित कर्मों को साधक करें ।६७। वागात्र वाग्भव का आद्य-वाचस्पते फिर अमृते प्लुत और प्लुति-इसका कीर्तन करे। यह मन्त्रं मुनियों के द्वारा एकादश अक्षरों वाला कहा गया है। ।६८। वागाद्य पाँच पदों से अङ्गों का समाचरण सविधि करना चाहि। ।६६। अब ध्यान है—कमल के आसन पर विराजमान, करों से जप की माला, दो पद्म और पुस्तक को धारण करती हुई, तरुणचन्द्र से मुकुट को बांधे हुए, मोती, चन्द्र और कुन्द के समान प्रभा वाली
अष्टम पटल } [ १६१ भाल में उन्मीलित लोचन में समन्वित—अपने स्थूल कुचों के भार से समाक्रान्त—निरन्तर मुनिगणों के द्वारा सेव्यमाना वाक् की अधि- देवता आपकी भूति के लिए होवे ।१००। रुद्रलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयाद्घृतैः । मातृकाकल्पिते पीठे पूजयेत्तां यथा पुरा ।१०१ पलाशकुसुमैर्हुत्वा परां सिद्धिमवाप्नुयात् । कदम्बकुसुमैस्तद्वत्फलैः श्रीवृक्षसम्भवैः ।१०२ अचराच्छ्रियमाप्नोति वाचां कुन्दसमुद्भवैः । नन्द्यावर्तप्रसूनैर्वा हुत्वा वाग्वल्लभो भवेत् ।१०३ ब्राह्मीरसे स्वकल्काढ्ये कपिलाज्यं पचेज्जपन् । पिबेद्दिनादौ तं नित्यं सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत् ।१०४ अनया विद्यया जप्तं ब्राह्मीपत्रञ्चभक्षयेत् । न विस्मरति मेधावी श्रुत्वा वेदागमान्पुनः ।१०५ इस मन्त्र का ग्यारह लाख जप करना चाहिए और जप का दशांश घृत से होम करे। मातृका कल्पित पीठ पर पूर्व की ही भांति उस देवी का अभ्यर्चन करे ।१०१। ढाक के पुष्पों से हवन करके परा सिद्धिकी प्राप्ति किया करता है। उसी के समान कदम्ब के पुष्पों से और श्री वृक्ष के फलों से होम करने पर भी फल हुआ करता है ।१०२। कुन्द से समुत्पन्न अथवा नन्द्यावर्त के पुष्पों से होम करके शीघ्र ही श्री की प्राप्ति किया करता है और वाग्वल्लभ हो जाता है ।१०३। अपने ही कल्क से युक्त ब्राह्मी बूँटी के रस को कपिला गौ के घृत में जप करता हुआ पाचन करे। उसको दिन के आदि में नित्य पीवे तो सब शास्त्रों के अर्थों का ज्ञाता हो जाया करता है ।१०४। इस विद्या से अभिमन्त्रित किए हुए ब्राह्मी बूँटी के पत्रों का भक्षण करे तो मेधावी और वेद आगमों का श्रवण करके कभी भी भूलता नहीं है ।१०५।
१६२ ] [ श्री शारदा तिलक बहुना किमियं विद्या जपतां कामदामणिः । तोयस्थं शयनं विष्णोः सकेवलचतुर्मुखः ।१९०६ बिन्द्वर्धीशयुतो वह्निर्बिन्दुसद्योऽम्बुमाम भृगुः । उक्तानि त्रीणि बीजानि सद्भिः सारस्वताथिनाम् ।१०७ अङ्गानि कल्पयेद्बीजैर्द्विरुक्तैर्जातिसंयुतैः ।१०८ मुक्ताहारावदातां शिरसि शशिकलालङ्कृतां बाहुभिःस्वै व्याख्यां वर्णाक्षमालां मणिमयकलशं पुस्तकं चोद्वहन्ती । आपीनोत्तुङ्गवक्षोरुहभरविनमन्मध्यदेशामधीशां वाचा, मीडे चिराय त्रिभुवननमितां पुण्डरीके निषण्णाम् ।१९०६ त्रिलक्षं प्रजपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । पायसेनाज्यसिक्तेन संस्कृते हव्यवाहने ।११० इस विद्या के विषय में अधिक क्या कहा जावे, इसके जप करने वालों को यह कामनाओं के देने वाली चिन्तामणि ही है। अब अन्य मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--विष्णोः शयन-आकार, तोयस्थ- वकारस्थ, चतुर्मुख केवल स्वर रहित क्कार, अर्धीश-ऊ, वह्नि-रेफ से युक्त सम्-ओकार, अम्बु-वकार, भृगु-सः, ये सत्पुरुषों के द्वारा सारस्वत के अथियों के लिए तीन बीज कहे गये हैं ।१०६।१०७। दो वार कहे हुए जाति संयुक्त बीजों से अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।१०८। ध्यान बताया जाता है-मोतियों के हार के समान अवदात अर्थात् श्वेत-शिर में चन्द्रमा की कला से विभूषित अपनी बाहुओं के द्वारा व्याख्या-वर्णों की अक्षमाला, मणिमय कलश और पुस्तक को वहन करती हुई-आपीन (स्थूल) और ऊँचे स्तनों के भार से विनम्र मध्य देश वाली तीनों भुवनों के द्वारा वन्दित, पुण्डरीक पर विराजमान वाणी की अधीशा का मैं स्तवन करता हूँ ।१०६। इस मन्त्र का तीन लाख जप करना चाहिए और जप का दशांश होम करे । होम संस्कार किए हुए अग्नि में आज्य से सिक्त पायस के द्वारा करना चाहिए ।११०।
सप्तम पटल । [ १६३ वागीशी पूजयेत्पीठे विधिना मातृकोदिते । प्राक् प्रस्तुतेन मार्गेण प्रत्यहं साधकोत्तमः ।१११ व्याघातकुसुमैर्हुत्वा वाक्सिद्धिमतुलां लभेत् । जाती पुष्पैः सिताम्भोजैः सिक्तैश्चन्दनवारिणा ।११२ नन्द्यावर्तैः शुभैः कुन्दैर्हुत्वा वाक्सिद्धिमाप्नुयात् । जपन् बीजत्रयं मन्त्री सभायां जयमाप्नुयात् ।११३ सितां वचां वा ब्राह्मी वा जप्त्वा खादेद्दिनागमे । मेधां काममवाप्नोति साधकोनात्र संशयः ।११४ एवमुक्तेषु मन्त्रेषु दीक्षितोयतमानसः । एवं यो भजते भक्तया स भवेद् मुक्तिभुक्तिभाक् ।११५ सुसितैर्गन्धकुसुमैः पूजा सारस्वते विधौ । दूर्वाबीजाङ्कुरं पुष्पं राजवृक्षसमुद्भवम् ।११६ उत्पलानि प्रशस्तानि सिन्दुवारांकुराणि च । भजेत्सरस्वतीं नित्यमेतानि परिवर्जयेत् ।११७ मातृका में कथित पीठ पर विधि से वागीशी का अर्चन करना चाहिए । साधकोत्तम को पूर्व से प्रस्तुत मार्गके ही द्वारा प्रतिदिन पूजन करे ।१११। व्याघात पुष्पों से होम करके अतुल वाक् सिद्धि की प्राप्ति करता है । जाती के पुष्पों-श्वेत कमलों को चन्दन के जल में सिक्त करके अथवा नन्द्यावर्त के शुभ पुष्पों से कुन्द पुष्पों से हवन करके वाक् सिद्धि को प्राप्त किया करता है । मन्त्रधारी तीनों बीजों का जप करता हुआ सभा में विजय प्राप्त करता है ।११२।११३। सित वचा अथवा ब्राह्मी बूटी, को अभिमन्त्रित करके दिन के आगम में खावे तो साधक पूर्ण मेधा को प्राप्ति किया करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।११४ इस तरह से उक्त मन्त्रों में दीक्षित यत्तमानस जो ऐसा भक्ति से सेवन करता है वह भुक्ति और मुक्ति को प्राप्त करने वाला होता है ।११५। सारस्वत विधि में सुन्दर श्वेत गन्ध और पुष्पों से पूजा होती है । दूर्वा कुर, पुष्प, राजवृक्ष से समुद्भूत पुष्प और उत्पल तथा सिन्दु
१६४ ] [ श्री शारदा तिलक वारांकुर प्रशस्त होते हैं । सरस्वती देवी का नित्य सेवन करना चाहिए और इनको वर्जित कर देवे ।११६।११७। आम्रातं गृञ्जनं विल्वं कलञ्जं लशुनं तथा । तैलं पलाण्डुं पिण्याकं शाङ्ग्राष्टिमपि भोजने ।११८ सर्वं पर्युषितं त्याज्यं सदा सारस्वताथिना । नाचरेन्निशि ताम्बूलं स्त्रियं गच्छेद्विवा न च ।११६ न सन्ध्ययोः स्वपेज्जातु नाशुचिः किञ्चिदुच्चरेत् । प्रदोषेषु भवेन्मौनी दिग्वस्त्रा न विलोकयत् ।१२० न पुष्पितां स्त्रियं गच्छेन्न निन्देद्रामलोचनाम् । न मृषा वचनं ब्रूयान्नाक्रमेत्पुस्तकं सुधीः ।१२१ अक्षराढ्यानि पत्राणि नोपेक्षेत न लंघयेत् । चतुर्द्दश्यष्टमीपर्वप्रतिपद्ग्रहणेषु च ।१२२ संक्रमेषु च सर्वेषु विद्यां नैव पठेद्द्विजः । व्याख्याने सन्त्यजेन्निद्रामालस्य जृम्भणं बुधः ।१२३ क्रोधं निष्ठीवनं तद्वन्नीचाङ्गस्पर्शनं तथा । मनुष्यसर्पमार्जारिमण्डूकनकुलादयः ।१२४ अन्तरा यदि गच्छेयुस्तदा व्याख्यां परित्यजेत् । निशासु दीपध्वंसेषु पाठं सद्यः परित्यजेत् ।१२५ ज्ञात्वा दोषानिमान्सम्यग् भक्त्यायो भारती यजेन् । वाचां सिद्धिमवाप्नोति वाचस्पतिरिवापरः ।१२६ आम्रत, गाजर, विल्व, कलञ्ज, लशुन, तेल, प्याज, पिण्याक, और शाङ्ग्राष्टिक इनका भोजन में वर्चन कर देना चाहिए । सभी वस्तु जो पर्युषित हो त्याग देनी चाहिये । जो सारस्वत का इच्छुक हो उसे ऐसा त्याग कर देना चाहिए । रात्रि में ताम्बूल का सेवन न करे और दिन में कभी स्त्री का गमन न करे ।११८।११६। दोनों सन्ध्याओं में कभी शयन न करे और अशुचि रहकर कुछ भी उच्चारण न करे । प्रदोषों में मौनी व्रतधारी रहे और नग्न स्त्री को कभी नहीं देखना
अष्टम पटल ] [ १६५ चाहिए ।१२०। जो स्त्री रजो धर्म में हो उसका गमन नहीं करे और सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री की निन्दा नहीं करनी चाहिए । असत्य वचन कभी न बोले और सुधी पुरुष पुस्तक का अतिक्रमण नहीं करे ।१२१। जो भो पत्र अक्षरों युक्त हों उनकी उपेक्षा न करे तथा उनको लांघन भी नही चाहिए । चतुर्दशी, अष्टमी, पर्व दिन, प्रतिपदा, उग्र ग्रहण, सब संक्रमणों में द्विज विद्या न पढ़े । बुध पुरुष व्याख्यान में निन्दा का तथा जँभाई और आलस्य का त्याग कर देवे ।१२२।१२३। क्रोध, थूकना, नीच के अङ्ग का स्पर्श न करे । मनुष्य, सर्प, मार्जार, मेंढक और नकुल आदि यदि बीच में होकर जावें तो व्याख्या का परित्याग कर देना चाहिए ।१२४। निशा में दीप के बुझने पर पाठ का तुरन्त त्याग कर देवे । इन दोषों का ज्ञान प्राप्त कर भली भाँति भक्ति से जो भारती का यजन करता है वह दूसरे वाचस्पति के ही समान सिद्धि को प्राप्त किया करता है ।१२५।१२८। अष्टम पटल लक्ष्मी मन्त्र प्रकरण अथ वक्ष्ये श्रियो मन्त्रान् श्रीसौभाग्यफलप्रदान् । यस्याः कटाक्षमात्रेण त्रैलोक्यमपि वर्द्धते ।१ वान्तं वह्निसमारूढं वामनेत्रेन्दुसंयुतम् । बीजमेतत् श्रियः प्रोक्तं चिन्तामणिरिवापरः ।२ ऋषिर्भृगुर्निवृच्छन्दो देवता श्रीः समीरिता । षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादङ्गानि षट्क्रमात् ।३ कान्त्या काञ्चनसन्निभाँ हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजै- हस्तोत्क्षिप्तहिरण्मयामृतघटैरासिच्यमानां श्रियम् ।
१६६ ] [ श्री शारदा तिलक बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तैः किरीटोज्ज्वलां क्षौमाबद्धनितम्बबिसितां वन्देऽरविन्दस्थिताम् ।४ भानुलक्षं जपेन्मन्त्रं दीक्षितो विजितेन्द्रियः । श्रियमभ्यर्चयन्नित्यं सुगन्धिकुसुमादिभि १५ तत्सहस्रं प्रजुहुयात्कलशैर्मधुरोक्षितैः । जपान्ते जुहुयान्मन्त्री तिलैर्वा मधुराप्लुतैः ।६ बिल्वै फलैर्वाजुहुयात् त्रिभिर्वा साधकोत्तमः । अत्र सम्यग्यजेत्पीठं नवशक्तिसमन्वितम् ।७ इसके अनन्तर श्रीदेवी के मन्त्रों के विषय में वर्णन करूंगा जो श्री और सौभाग्य के फलों का प्रदान करने वाले हैं। जिस श्रीदेवी के कटाक्ष मात्र से ही तीनों लोक वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।१। अब मन्त्र का उद्धार कहा जाता है-वह्नि से समारूढ वान्त हो और वाम नेत्र इन्दु से संयुत होवे-यही श्रीदेवी का बीज कहा गया है जो दूसरी चिन्ता- मणि के ही समान होता है । वान्ता का अर्थश है-वह्नि का अर्थ रेफ होता है-वाम नेत्र ईकार को कहते हैं--इन्दु का तात्पर्य बिन्दु होता है। चिन्तामणि का यह प्रभाव है कि उसके समक्ष में जो भी मन में विचारा जावे वही पूर्ण हो जाता है ।२। इस मन्त्र का ऋषि भृगु है- निचृच्छन्द है और श्री देवता कहा गया है। षट्क्रम से षड् दीर्घ युक्त बीज के द्वारा अङ्गों का कर्म करना चाहिए ।३। अब ध्यान बतलाया जाता है-जो देवी अपनी कान्ति के द्वारा सुवर्ण के सदृश है जो हिमवान् पर्वत के समान परम विशाल कार्य चार गजों के द्वारा सूडों से उत्क्षिप्त सुवर्ण निर्मित और अमृत से भरे हुए कुम्भों से असिच्यमान श्रीदेवी को जो अपने करों से वरदान-दो कमल और अभयदान को धारण करने वाली और किरीट् से पर मोज्ज्वल तथा क्षोम वस्त्र से नितम्ब विम्बों को वाँधकर अतीव शोभित मन से विराजमान है, उस श्री देवी की मैं वन्दना करता हूँ ।४। दीक्षा ग्रहण करके दीक्षित होकर अपनी इन्द्रियों को जीतने वाले को इस मन्त्र का बारह लाख जप करना चाहिए और
अष्टम पटल ] [ १६७ नित्य प्रति सुगन्धित पुष्प आदि अर्चनोपचारों के द्वारा श्री देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए ।५। उसका एक सहस्र मधुरोक्षित कलशों से प्रकर्ष रूपसे हवन करना चाहिए । अथवा जप के अन्त में मन्त्रधारी व्यक्ति को मधुर से समाप्लुत तिलों से हवन करना चाहिए ।६। अथवा साधना करने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष को विल्व के फलों के द्वारा हवन करना चाहिए । यहाँ पर 'विभिन्न' इस पद का भावार्थ है कि श्री सूक्त के द्वारा एक-एक वार हवन करके पीछे मूल के द्वारा हवन करना चाहिए ।७। विभूतिरुन्नतिः कान्तिः सृष्टिः कीर्तिश्च सन्नतिः । पुष्टिरुत्कृष्टिश्चर्द्धिश्च सम्प्रोक्ता नव शक्तयः ।८ अन्तःबाह्य यजेद्देवीं परिवारसमन्विताम् । बीजाढ्यमासनन्दत्त्वा मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६ यजेत्पूर्ववदङ्गानि दिग्दलेष्वर्चयेत्ततः । वासुदेवं सङ्कर्षणंच प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ।१० हिमपीततमालेन्द्रनीलाभान्पीतवाससः । शंखचक्रगदापद्मधारिणस्तान् चतुर्भुजान् ।११ विदिग्गतेष पत्रै षु दमकादीन्गजेन्द्रजान् । दमकं सलिलं चैव गुग्गुलं च कुरुण्टकम् ।१२ जपेच्छंखनिधिं देव्या दक्षिणे दयितान्वितम् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ किञ्चित्स्मितमुखाम्बुजौ ।१३ अन्योन्यालिङ्गनपरौ शंखपङ्कजधारिणौ । विलसद्रत्नवर्षाभ्यां शंखाभ्यां परिलाञ्छितौ ।१४ नौ शक्तियाँ, विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, पुष्टि, उत्कृष्टि और ऋद्धि-ये नौ शक्तियाँ कहीं गयी हैं ।८। यहाँ पर देवी का आवाहन करके परिवार से संयुत देवी का यजन करना चाहिये । बीज से आढ्य आसन अर्पित करके मूल के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिए ।६। पूर्व की ही भाँति अङ्गों का यजन करे फिर दिग्दलों में अभ्यर्चन करना चाहिए । भगवान् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनि-
१६८ ] [ श्री शारदा तिलक रुद्र का दिशाओ में यजन करे, जो क्रम से हिम, पीत, तमाल और इन्द्र नील के समान आभा वाले हैं और पीत वर्ण के वस्त्र धारण किए हुए हैं। उन सबकी चार-चार भुजायें हैं और उनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाले हैं ।१०।११। विदिशाओं में रहने वाले दलों में दमक आदि मजों का यजन करे । उनके नाम ये है—दमक, सलिल, गुग्गुल और कुरुण्टक ।१२। देवी के दक्षिण भाग में दयिता से समन्वित शंख निधि का जप करना चाहिए । ये मुक्तामणि के सदृश हैं और उनके मुख कमल पर कुछ-कुछ मन्द मुस्कान विराज रही है ।१३। ये दोनों परस्पर में एक दूसरे के आलिङ्गन में तत्पर हैं तथा शंख और पंकज को धारण करने वाले हैं और रत्नों की वर्षा करने वाले शंखों से परिलांछित होते हुए शोभित हैं ।१४। तुन्दिलं कम्बुकनिधिं वसुधारां घनस्तनीम् । वामतः पङ्कजनिधिं प्रियया सहितं यजेत् ।१५ सिन्दूराभौ भुजश्लिष्टौ रक्तपद्मोत्पलान्वितौ । निःसरद्रत्नधाराभ्यां पद्माभ्यां मूर्द्धिनलाञ्छितौ ।१६ तुन्दिलं पङ्कजनिधिं तन्वीं वसुमतीमपि । दलाग्रेषु यजेदेता बलाकाद्याः समन्ततः ।१७ बलाकीं विमलांचैव कमलां नवमालिकाम् । विभीषिकां मालिकां च शाङ्करी वसुमालिकाम् ।१८ पङ्कजद्वयधारिण्यो मुक्ताहारसमप्रभाः । लोकेशान् पूजयेदन्ते वज्रायस्त्राणि तद्बहिः ।१६ इत्थं यो भजते देवीं विधिना साधकोत्तमः । धनधान्यसमृद्धिः स्याच्छ्रियमाप्नोत्यनिन्दिताम् ।२० वक्षः प्रमाणे सलिले स्थित्वा मन्त्रामिमं जपेत् । त्रिलक्षं संयतो मन्त्री देवीं ध्यात्त्वार्कंमण्डले ।२१ स भवेदल्पकालेन रमाया वसतिः स्थिरः । विष्णुगेहस्थविल्वस्य भूलतास्थाय मन्त्रवित् ।२२
अष्टम पटल ] [ १६६ तुन्दिल अर्थात् स्थूल उदर वाले—कम्बुक निधि-घने स्तनों वाली वसुधारा तथा वाम भाग में पङ्कज निधि का प्रिया के सहित यजन करे । १५। ये दोनों सिंदूर की आभा वाले हैं—भुजाओं के द्वारा आश्लिष्ट हैं—और रक्त पद्मोत्पलों से समन्वित हैं—जिनसे रत्नों की धारा निःसरण कर रही हैं ऐसे पद्मों से मूर्द्धा में लांछित है अर्थात् मस्तक में ऐसे रत्नों की धारा के निःसरण करने वाले पद्म संस्थित है ।१६। तुन्दिल पंकज निधि का और तन्वी वसुमती का भी दोनों के अग्र भागों में सभी ओर से इन बलाका आदि का यजन करना चाहिए ।१७। बलाकी, विमला, कमला, नव मालिका, विभीषिका, मालिका, शांकरी वसुमालिका, ये दो कमलों की धारण करने वाली और मुक्ताहार के समान प्रभा वाली हैं। अन्त में लोकेशों की पूजा करे और उनके बाहिर वज्र आदि अस्त्रों का यजन करना चाहिए ।१८।१६। इस प्रकार से विधि के साथ जो साधकोत्तम देवी का यजन किया करता है, उसको धन- धान्य की समृद्धि होती है और वह अनिन्दित श्री की प्राप्ति किया करता है ।२०। वक्षःस्थल के प्रमाण वाले जल में स्थिर होकर इस मन्त्र का जप करे । मन्त्र के धारण करने वाला परम संयम से युक्त होकर सूर्य मण्डल में देवी का ध्यान करके तीन लाख जप करे । वह जप करने वाला बहुत थोड़े ही समय में रमादेवी की वासस्थली में स्थिर हो जाया करता है । वह मन्त्र का ज्ञाता भगवान् विष्णु के गृह में स्थित विल्व वृक्ष के मूल में समास्थित होकर जप करे ।२१।२२। त्रिलक्षं प्रजपेन्मन्त्रं वाञ्छितं लभते धनम् । अशोकवह्नौ जुहुयात्तण्डुलैराज्यलोलितैः ।२३ वशयत्यचिरादेव त्रैलोक्यमपिमन्त्रवित् । जुहुयात्तण्डुलैः शुद्धै रक्ताग्नौ नियुतं वशी ।२४ राज्यश्रिय मवाप्नोति राजपुत्रो महीयसीम् । जुहुयात् खादिरे वह्नौ तण्डुलैर्मधुरोक्षितैः ।२५
१७० ] [ श्री शारदा तिलक राजाबश्योभवेच्छीघ्रं महालक्ष्मीश्च वर्द्धते । विल्वच्छायामधिवसन् विल्वमिश्रहविष्यभुक् ।२६ संवत्सरद्वयं हुत्वा तत्फलैरथवाम्बुजैः । साधकेन्द्रो महालक्ष्मीं चक्षुषा पश्यतिध्रुवम् ।२७ हविषा घृतसिक्तेन पायसेन सर्पिषा । हुत्वा श्रियमवाप्नोति नियुतं मन्त्रवित्तमः ।२८ मधुराक्तारुणाम्भ जैर्जुहुयाल्लक्षमादरात् । नमुञ्चति रमा तस्य वंशमाभूतसंप्लवम् ।२६ मन्त्रधारी पुरुष मन्त्र का तीन लाख जप करे तो वह अपना वांछित धन प्राप्त कर लिया करता है । घृत से आप्लुत तण्डुलों के द्वारा अशोक की वह्नि में हवन करना चाहिए ।२३। मन्त्र का ज्ञाता पुरुष तीनों लोकों को भी तुरन्त ही अपने वश में कर लिया करता है । वशी पुरुष को एक नियुत संख्या में आक की अग्नि में शुद्ध तण्डुलों के द्वारा हवन करना चाहिए ।२४। राजपुत्र बहुत बड़ी राज्य की श्री का लाभ कर लिया करता है । मधुर से उक्षिप्त तण्डुलों के द्वारा खदिर वह्नि में होम करे ।२५। बहुत ही शीघ्र राजा वश्य हो जाया करता है और उसको महालक्ष्मी की वृद्धि हो जाती है । विल्व के वृक्ष की छाया में अर्थात् बेल के वृक्षके नीचे अधिवास करके विल्व फल से मिश्रिन हविष्य को भोजन करने वाला दो वर्ष पर्यन्त विल्व के ही फलों के अथवा कमलों के द्वारा हवन करके साधना करने वालों में शिरोमणि पुरुष अपने नेत्रों से ही महालक्ष्मी का दर्शन निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है ।२६।२७। मन्त्र वेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष घृत से सिक्त हवि से और घृत से संयुत क्षीर से हवन करके जो एक नियुत आहुतियाँ देवे, तो श्री की प्राप्ति कर लेता है ।२८। बड़े आदर के भाव से मधुर से अक्त अरुण कमलों के द्वारा हवन करे । उस पुरुष को संसार के संप्लव पर्यन्त तथा उसके वंश वालों को रमादेवी कभी भी परित्याग नहीं करती है अर्थात् सदा ही रहा करती है ।२६।
अष्टम पटल ] [ १७१ वाग्भव वनिता विष्णोर्माया मकरकेतनः । चतुर्बीजात्मको मन्त्रश्चतुर्वर्गफलप्रदः ॥ अङ्गानि कुर्याद्दीर्घाढ्यचरमाबीजेन मन्त्रवित् ।३० माणिक्यप्रतिमप्रभां हिमनिभैस्तुङ्गै श्चतुर्भिर्गजै- र्हस्ताग्राहितरत्नकुम्भसलिलैरासिच्यमानां मुदा । हस्ताब्जैर्वरदानमम्बुजयुगाभीतीर्दधानां हरेः । कान्तां, कांक्षितपारिजातकलतिकां वन्दे सरोजासनाम् ।३१ भानुलक्षं हविष्याशी जपेदन्ते सरोरुहैः । जुहुयादरुणैः फुल्लै त्तत्सहस्रं जितेन्द्रियः । २ रमायाः कल्पिते पीठे तद्विधानेन पूजयेत् । कुर्यात्प्रयोगांस्तत्रस्थान्मनुना तेन साधकः ।३३ निधिभिः सेव्यते नित्यं मूर्तिमद्भिरुपासितैः । दीर्घा यादिविसर्गान्तो ब्रह्मा भानुर्वसुन्धरां ।३४ वान्ते सिन्यै प्रिया वह्नेर्मनः प्रोक्तौ दशाक्षरः । ऋषिर्दक्षो विराट्छन्दो देवता श्रीः समीरिंता ।३५ देव्यै हृदयामाख्यातं पद्मिन्यै शिर ईरितम् । विष्णुपत्न्यै शिखाप्रोक्ता वरदायै तनुच्छदम् ।३६ वाग्भव-विष्णु भगवान की वनिता-माया-मकरकेतन-यह चार बीजों के स्वरूप वाला मन्त्र चारों वर्गों के अर्थात् धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष के फलों का प्रदान करने वाला होता है। मन्त्र का ज्ञाता दीर्घ से संयुत रमा के बीज के द्वारा अङ्गों को करे ।३०। ध्यान एवं वन्दना बतलाते हैं-माणिक्य के समान प्रभावाली-जिनकी सूडों में रत्नों से निर्मित जल से परिपूर्ण कलश है ऐसे हिम (बर्फ) के सदृश चार गजों के द्वारा आनन्द पूर्वक आसिच्यमान है अर्थात् गजों की सूड़ों में स्थित कलशों से अभिषेक की जा रही है-जिसकी भुजाओं में जो कमल समान कर वाली हैं उनमें वरदान पद्मों का जोड़ा और अभयदान धारण किये हुईं हैं। ऐसी भगवान हरि की कान्ता की जो
१७२ ] [ श्री शारदा तिलक अभीष्ट मनोरथों के लिए कल्प लतिकाके सदृश हैं और कमल के आसन पर विराजमान हैं मैं वन्दना करता हूँ ।३१। हविष्य का भोजन करने वाला पुरुष बारह लाख जप के अन्त में अरुण तथा विकसित कमलों के द्वारा इन्द्रियों को अपने वश में रखते हुए बारह सहस्र आहुतियों का हवन करे ।३२। रमादेवी के कल्पना किये हुए पीठ पर उसके विधान से अभ्यर्चन करे । साधक वहाँ पर स्थित प्रयोगों को उस मन्त्र के द्वारा करे ।३३। वह उपासक उपासना की हुई मूर्तिमान निधियों के द्वारा नित्य ही सेवित हुआ करता है । नकार शक्ति-जिसके अन्त में विसर्ग हों ऐसा ककार और मकार-वकार के अन्त में स्वरूप और स्वाहा-यह दश अक्षरों वाला मन्त्र है । इसका ऋषि दक्ष है तथा विराट् छन्द है और देवता इसका श्रीदेवी कही गयी है ।३४।५। देवी के लिए हृदय कहा गया है और पद्मिनी के लिए शिर बताया गया है । विष्णुपत्नी के लिए शिखा कही गयी है तथा वरदान के लिए तनुच्छद बताया गया है ।३६। अस्त्रं कमलरूपायै नमोऽन्ताः प्रणवादिकाः । अंगमन्त्राः समुद्दिष्टा ध्यायेद्देवीमनुन्यधीः ।३७ जासीना सरसीरुहे स्मितमुखी हस्ताम्बुजैर्विभ्रती । दानं पद्मयुगाभये च वपुषां सौदामिनीसन्निभा । मुक्तादामविराजमानपृथुलोत्तं ङ्गस्तनोद्भासिनी । पायाद्वः कमला कटाक्षविभवैरानन्दयन्ती हरिम् ।३८ दशलक्षं जपेन्मंत्रं मंत्रविद्विजितेन्द्रियः । दशांशं जुहुयान्मंत्रान् मधुराक्तैः सरोरुहैः ।३६ श्रीपीठे पूजयेद्देवीमङ्गानि प्रथमं यजेत् । बलाकाद्यास्ततः पूज्या लोकेशांस्तिस्र।वृतीरपि ।४० इति सम्पूजयेद्देवी संपदामालयोभवेत् । समुद्रगायां सरिति कण्ठमात्र जले स्थितः ।४१
अष्टम पटल ] [ १७३ त्रिलक्षं प्रजपेन्मन्त्री साक्षाद्वैश्रवणोभवेत् । आराध्योत्तरनक्षत्रे देवीं स्रक्चन्दनादिभिः ४२ अस्त्र कमल रूपा के लिये है । ये नमः अन्त वाले तथा प्रणव आदि वाले हैं । ये अङ्ग मन्त्र कहे गये हैं । अनन्य बुद्धिवाला होकर देवी का ध्यान करना चाहिए । ३७। ध्यान और वन्दना बतलायी जाती है-देवी कमल पर विराजमान है-मुख पर मन्द मुस्कान की छटा दिखाई दे रही है-अपने कर कमलोसे वरदान-दो पद्म और अभयदान को धारण किये हुईं हैं-देवी का शरीर विद्युल्लता के सदृश है । जिनके ऊपर मोतियों की माला विराजमान है ऐसे स्थूल एवं समुन्नत स्तनों से सुशोभित हैं-अपने कटाक्षों के वैभव के द्वारा श्री हरि को आनन्दित करती हुए कमला देवी आपका परित्राण करें । ३८। अपनी इन्द्रियों को जीत लेने वाला मन्त्र का ज्ञाता इस मन्त्र का दस लाख जप करे । जप के दशम भाग को मधुर से अक्त कमलों के द्वारा आहुति देवे । ३६। श्रीपीठ पर देवी का यजन करे और अङ्गों का यजन पहिले करना चाहिए । वलाका आदि का इसके अनन्तर पूजन करे और फिर लोकेशों के यजन की तीन आवृत्ति भी करे । ४०। इस रीति से देवी का भला भाँति अभ्यर्चन करना चाहिए । वह यजन करने वाला सम्पदाओं का निवास स्थान बन जाया करता है । महासागर में गमन करने वाली सरिता में कण्ठ मात्र तक जल में स्थित होकर मन्त्रधारी को तीनलाख जप करना चाहिए । इसके प्रभाव से वह साक्षात् वैश्रवण हो जाया करता है । तीनों उत्तरा नक्षत्रों में माला पुष्प चन्दन आदि के द्वारा देवी की आराधना करे । ४१।४२। नन्द्यावर्तभवैः पुष्पैः सहस्रं जुहुयात्ततः । पौर्णमास्यां फलैर्बिल्वैर्जुहुयान्मधुराप्लुतैः ।४३ पञ्चम्यांविशदाम्भोजैः शुक्रवारे सुगन्धिभिः । अन्यैर्वाविशदैः पुष्पैः प्रतिमासं विशालधीः । स भवेदब्दमात्रेण सर्वदा संपदां निधिः ।४४
१७४ ] [ श्री शारदा तिलक वाग्भवं शम्भुवनिता रमा मकरकेतनः । तार्तीयं हि जगत्पात्रोर्वन्हिबीजसमुज्ज्वलः ।४५ अर्धीशढ्योभृगुस्त्यैहृत् मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । महालक्ष्म्याः समुद्दिष्ट स्ताराद्यः सर्वसिद्धिदः ।४६ ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दो गायत्रमीरितम् । देवता जगतामादिर्महालक्ष्मीः समीरिना ।४७ हस्तौ संशोध्य मन्त्रेण तारादिहृदयांतिकम् । बीजानां पञ्चकं न्यस्येदंगुलीषु यथाक्रमम् ।४८ मंत्रशेषं न्यसेन्मन्त्री तलयोरुभयोरपि । मूर्धादि चरणं यावत् मन्त्रेण व्यापक न्यसेत् ।४६ नदी या आवर्त्त में समुत्पन्न पुष्पों के द्वारा फिर एक सहस्र आहु- तियां देवें । पूर्णिमा तिथि में विल्व के फलों से जो तीनों मधुरों से समाप्लुत होवें हवन करे । पंचमी तिथि में शुक्रवार के दिन विकसित कमलों से होम करे जो सुगन्धित होवें । विशाल बुद्धि वाले को प्रति मास हवन करना चाहिए चाहें कमलों के अभाव में अन्य विकसित पुष्प होवें । ऐसा करने वाला व्यक्ति केवल एक वर्ष पर्यन्त करने पर सम्प- दाओं की निधि हो जाया करता है ।४३।४४। वाग्भव—माया—वीज रमा—मकर केतन—तार्तीय वाला का या भैरवी का स्वरूप यकार—रेफ युक्त लेनप्र—ॐ से आढ्य सकार उससे सू—स्वरूप—हन्तम्—ताराद्य यह मन्त्र द्वादश अक्षरों वाला है जो महा लक्ष्मी का उद्दिष्ट किया गया है । ताराद्य सब सिद्धियों का देने वाला है ।४५।४६। इसके ऋषि ब्रह्मा कहे गये हैं और छन्द गायत्री होता है इसका देवता जगतों का आदि महालक्ष्मी बताई गई है ।४७। दोनों हाथों को भली भाँति-शुद्ध करके मन्त्र के द्वारा तार से आदि लेकर हृदय के समीप तक पाँचो वीजों का क्रमानुसार अंगुलियों में न्यास करना चाहिए ।४८। मन्त्रधारी को चाहिये कि मन्त्र के शेष दोनों तलों में न्यास करे । मूर्धा से आदि लेकर चरण पर्यन्त मन्त्र के द्वारा व्यापक न्यास करना चाहिए ।४६।
अष्टम पटल ] [ १७५ मूर्धादिवक्षोगुह्या ङ्घ्रो पञ्चबीजानि विन्यसेत् । शेषान्यसेत्सप्तवर्णान् हृदये सप्तधातुषु ।५० अङ्गानि पञ्चभिर्बीजैरस्त्रं शिष्टाक्षरैर्भवेत् । ज्ञानैश्वर्यादिभिर्युक्तैश्चतुर्थ्यन्तैः सजातिभिः ।५१ ज्ञानमैश्वर्यशक्ती च बलवीर्ये सतेजसा । ज्ञानैश्वर्यादयः प्रोक्ताः षट्क्रमादंगदेवताः ।५२ एवं न्यस्तशरीरोऽसौ स्मरेदुद्यानमुत्तमम् । चम्पकाशोकपुन्नागपाटलैरुपशोभितम् ।५३ लवंगमालतीबिल्वदेवदारुनमेरुभिः । मंदारपारिजाताद्यैः कल्पवृक्षैः सुपुष्पितैः ।। ५४ चन्दनैः कर्णिकारैश्च मातुलिंगैश्च वञ्जुलैः । दाडिमीलकुचांकोलैः पूगैः कुरवकैरपि ।५५ कदलीकुंदमंदारनालिकेरैरलङ्कृतैः । अन्यैः सुगंधिपुष्पाद्यैर्वृक्षसंघश्च मण्डितम् ।५६ मूर्धा के आदि में—वक्ष—गुह्य और दोनों चरणों में पाँच बीजों का न्यास करे । शेष सात वर्णों को हृदय में न्यास करे । पाँच बीजों से अङ्गों को सप्तधातुओं में न्यास करे और निरन्तर शिष्टाक्षरों द्वारा होवें। ज्ञान ऐश्वर्य आदि से युक्त—सजाति और जिसके अन्त में चतुर्थी विभक्ति हो । ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य तेजके सहित होवे ये क्रम से ज्ञानैश्वर्यादिक अङ्ग देवता कहे गये हैं ।५०।५१।५२। इस रीति से जिसने शरीर में न्यास कर लिया है वह एक उत्तम उद्यान का स्मरण करे जो उद्यान चम्पक—अशोक पुन्नाग और पाटल से उप शोभित होवे ।५३। जो लवंग, मालती, विल्व, देवदारु, नमेरु, मन्दार पारिजात आदि कल्प वृक्षों से शोभा सम्पन्न होवे, जिन वृक्षों में सुन्दर पुष्प भी होवें । चन्दन, कर्णिकार, मातुलिंग, वञ्जुल, दाड़िम, लकुच, कङ्कोल, पूग, कुरवक, कदली, कुन्द, मन्दार, नारियल से अलंकृत होवे—ऐसे ही अन्य सुगन्धित पुष्पादि से तथा वृक्षों के समुदायों से मण्डित होवे ।५४।५५।५६ ।
१७६ ] [ श्री शारदा तिलक मालती मल्लिका जाती केतकी शतपत्रकैः । पारन्ती तुलसी नन्द्यावर्तेर्द मनकैरपि ।५७ सर्वर्तुं कुं सुमोपेतैर्नमद्द्भिरुपशोभितम् । मन्दमारुतसंभिन्नकुसुमामोदिदिङ्मुखम् ।५८ तस्य मध्ये सदोत्फुल्लैः कुमुदोत्पङ्कजैः । सौगन्धिकैश्च कह्लारर्नवं: कुवलयैरपि ।५६ हंसासारसाकारण्ड भ्रमरैश्चक्रनामभिः । अन्यैः कलकलारावैर्विहंगैरुपशोभितम् ।६० तहासरसि तन्मध्ये पुलिनेऽतिमनोहरे । परितः पारिजाताढ्यंमण्डपं मणिकुट्टिमम् ।६१ उद्यदादित्यसंकाश भास्वर शशि शीतलम् । चतुर्द्वारसमायुक्तं हेमप्राकारशोभितम् ।६२ रत्नोपक्लृप्तिसंशोभि कपाटाष्टकसंयुतम् । नवरत्नसमावलृप्त तुङ्गोतुरतोरणम् ।६३ मालती—मल्लिका—जाती—केतकी—शतपत्रक—पारन्ती— तुलसी-नन्द्यावर्त्त—दमनकों से तथा सब ऋतुओं में होने वाले कुसुमों से युक्त नीचेकी ओर झुके हुये होवें । इनसे उपशोभित होवें । ऐसा ध्यान हो—यही स्मरण करना चाहिए । मन्द वायु से विकसित हुए पुष्पों की गन्ध से युक्त जिसमें दिशाओं का मुख होवें ।५७।५८। उसके मध्य में सदा उत्फुल्ल कुमुद उत्पल और पंकज होवें तथा सौगन्तिक—कल्हार नव कुवलय होवें—इनसे उपशोभायमान होवें ।५६। अन्य कल-कल रव (ध्वनि) वाले पक्षियों वह शोभायमान है ! उनमें एक महान् सरोवर है जिसका पुलिन अतीव मनोहर है । दोनों ओर पारिजाति के वृक्ष हैं, उनसे संयुत एक मण्डप है जिसमें मणियों का फर्श लग रहा है ।६०।६१। वह उदोयमान सूर्य के समान है जो परम भास्कर है और चन्द्रमा के सदृश शीतल है । उसमें चार द्वार हैं तथा सुवर्ण की चार दिवारी से परम शोभित है ! वह रत्नों की उपकृति से शोभा
अष्टम पटल ] [ १७७ वाला है अर्थात् उसमें रत्न लगे हुए हैं। उस मण्डप के आठ कपाट (किवाड़) हैं। वह नव रत्नों से अन्वित हैं और उसमें ऊँचे गोपुर और तोरण हैं ।६२।६३। हेमदण्डसमालंबि ध्वजावलिपरिष्कृतम् । नवरत्नसमाबद्धस्तम्भराजिविराजितम् ।६४ सहस्रदीपसंयुक्तदीपदण्डविराजितम् । तप्तहाटकसङ्क्लृप्तवातायनमनोहरम् ।६५ जानावर्णांशुकोबद्धसुवर्णशतकोटिभिः । किंकिणीमालिकायुक्तं पताकाभिरलङ्कृतम् । ६६ जातरूपमयैरत्नविचित्रैरतिविस्तृतैः । माणिक्यरत्नैर्वैदूर्यस्वर्णमालावलीयुतैः । ६७ अन्तरान्तरसम्बद्धरत्नैहृष्टिमनोहरैः । विचित्रैश्चित्रवर्णैश्च वितानैरुपशोभितम् । ६८ सर्वरत्नसमायुक्तं हेमकुट्टिसमुज्ज्वलम् । केतकीमालतीजातीचम्पकोत्पलकेसरैः । ६६ मल्लिकातुलसीजातीनन्द्यावर्तकदम्बकैः । एतैरन्यैश्च कुसुमैरलङ्कृतमहीत लम् । ७० उस मण्डप पर ध्वजाएं लगी हुई हैं, जिससे सुपरिष्कृत हो रहा है और वे ध्वजाएं सुवर्ण रचित दण्डों में बँधी हुयीं हैं। नौ प्रकार के रत्नों द्वारा समाबद्ध खम्भों से शोभायमान है ।६४। सहस्रों द्वीप दण्डों में सहस्रों ही दीपों से समायुक्त है । उस मण्डप में वातायनों की परम सुन्दरता है जो तपाये हुए सुवर्ण से सकॢप्त हैं ।६५। अनेक वर्ण के वस्त्रों से उपबद्ध हैं जिसमें सैकड़ों करोड़ सुन्दर वर्ण हैं । वह किंकिणियों की मालाओं से समन्वित है । और बहुत—सी पताकाओं से युक्त है ।६६। वह वितानों से उपशोभित हैं जो सुवर्ण से परिपूर्ण रत्नों से विचित्र हैं और अत्यधिक विस्तार वाले हैं । जो माणिक्य ( लाल वर्ण का रत्न ) रत्नों से और वैदूर्य एवं स्वर्ण की मालाओं से संयुत है ।६७। बीच-