शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१७० ] [ श्री शारदा तिलक राजाबश्योभवेच्छीघ्रं महालक्ष्मीश्च वर्द्धते । विल्वच्छायामधिवसन् विल्वमिश्रहविष्यभुक् ।२६ संवत्सरद्वयं हुत्वा तत्फलैरथवाम्बुजैः । साधकेन्द्रो महालक्ष्मीं चक्षुषा पश्यतिध्रुवम् ।२७ हविषा घृतसिक्तेन पायसेन सर्पिषा । हुत्वा श्रियमवाप्नोति नियुतं मन्त्रवित्तमः ।२८ मधुराक्तारुणाम्भ जैर्जुहुयाल्लक्षमादरात् । नमुञ्चति रमा तस्य वंशमाभूतसंप्लवम् ।२६ मन्त्रधारी पुरुष मन्त्र का तीन लाख जप करे तो वह अपना वांछित धन प्राप्त कर लिया करता है । घृत से आप्लुत तण्डुलों के द्वारा अशोक की वह्नि में हवन करना चाहिए ।२३। मन्त्र का ज्ञाता पुरुष तीनों लोकों को भी तुरन्त ही अपने वश में कर लिया करता है । वशी पुरुष को एक नियुत संख्या में आक की अग्नि में शुद्ध तण्डुलों के द्वारा हवन करना चाहिए ।२४। राजपुत्र बहुत बड़ी राज्य की श्री का लाभ कर लिया करता है । मधुर से उक्षिप्त तण्डुलों के द्वारा खदिर वह्नि में होम करे ।२५। बहुत ही शीघ्र राजा वश्य हो जाया करता है और उसको महालक्ष्मी की वृद्धि हो जाती है । विल्व के वृक्ष की छाया में अर्थात् बेल के वृक्षके नीचे अधिवास करके विल्व फल से मिश्रिन हविष्य को भोजन करने वाला दो वर्ष पर्यन्त विल्व के ही फलों के अथवा कमलों के द्वारा हवन करके साधना करने वालों में शिरोमणि पुरुष अपने नेत्रों से ही महालक्ष्मी का दर्शन निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है ।२६।२७। मन्त्र वेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष घृत से सिक्त हवि से और घृत से संयुत क्षीर से हवन करके जो एक नियुत आहुतियाँ देवे, तो श्री की प्राप्ति कर लेता है ।२८। बड़े आदर के भाव से मधुर से अक्त अरुण कमलों के द्वारा हवन करे । उस पुरुष को संसार के संप्लव पर्यन्त तथा उसके वंश वालों को रमादेवी कभी भी परित्याग नहीं करती है अर्थात् सदा ही रहा करती है ।२६।