भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 511 में से

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अष्टम पटल ] [ १६६ तुन्दिल अर्थात् स्थूल उदर वाले—कम्बुक निधि-घने स्तनों वाली वसुधारा तथा वाम भाग में पङ्कज निधि का प्रिया के सहित यजन करे । १५। ये दोनों सिंदूर की आभा वाले हैं—भुजाओं के द्वारा आश्लिष्ट हैं—और रक्त पद्मोत्पलों से समन्वित हैं—जिनसे रत्नों की धारा निःसरण कर रही हैं ऐसे पद्मों से मूर्द्धा में लांछित है अर्थात् मस्तक में ऐसे रत्नों की धारा के निःसरण करने वाले पद्म संस्थित है ।१६। तुन्दिल पंकज निधि का और तन्वी वसुमती का भी दोनों के अग्र भागों में सभी ओर से इन बलाका आदि का यजन करना चाहिए ।१७। बलाकी, विमला, कमला, नव मालिका, विभीषिका, मालिका, शांकरी वसुमालिका, ये दो कमलों की धारण करने वाली और मुक्ताहार के समान प्रभा वाली हैं। अन्त में लोकेशों की पूजा करे और उनके बाहिर वज्र आदि अस्त्रों का यजन करना चाहिए ।१८।१६। इस प्रकार से विधि के साथ जो साधकोत्तम देवी का यजन किया करता है, उसको धन- धान्य की समृद्धि होती है और वह अनिन्दित श्री की प्राप्ति किया करता है ।२०। वक्षःस्थल के प्रमाण वाले जल में स्थिर होकर इस मन्त्र का जप करे । मन्त्र के धारण करने वाला परम संयम से युक्त होकर सूर्य मण्डल में देवी का ध्यान करके तीन लाख जप करे । वह जप करने वाला बहुत थोड़े ही समय में रमादेवी की वासस्थली में स्थिर हो जाया करता है । वह मन्त्र का ज्ञाता भगवान् विष्णु के गृह में स्थित विल्व वृक्ष के मूल में समास्थित होकर जप करे ।२१।२२। त्रिलक्षं प्रजपेन्मन्त्रं वाञ्छितं लभते धनम् । अशोकवह्नौ जुहुयात्तण्डुलैराज्यलोलितैः ।२३ वशयत्यचिरादेव त्रैलोक्यमपिमन्त्रवित् । जुहुयात्तण्डुलैः शुद्धै रक्ताग्नौ नियुतं वशी ।२४ राज्यश्रिय मवाप्नोति राजपुत्रो महीयसीम् । जुहुयात् खादिरे वह्नौ तण्डुलैर्मधुरोक्षितैः ।२५

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