भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

१६८ ] [ श्री शारदा तिलक रुद्र का दिशाओ में यजन करे, जो क्रम से हिम, पीत, तमाल और इन्द्र नील के समान आभा वाले हैं और पीत वर्ण के वस्त्र धारण किए हुए हैं। उन सबकी चार-चार भुजायें हैं और उनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाले हैं ।१०।११। विदिशाओं में रहने वाले दलों में दमक आदि मजों का यजन करे । उनके नाम ये है—दमक, सलिल, गुग्गुल और कुरुण्टक ।१२। देवी के दक्षिण भाग में दयिता से समन्वित शंख निधि का जप करना चाहिए । ये मुक्तामणि के सदृश हैं और उनके मुख कमल पर कुछ-कुछ मन्द मुस्कान विराज रही है ।१३। ये दोनों परस्पर में एक दूसरे के आलिङ्गन में तत्पर हैं तथा शंख और पंकज को धारण करने वाले हैं और रत्नों की वर्षा करने वाले शंखों से परिलांछित होते हुए शोभित हैं ।१४। तुन्दिलं कम्बुकनिधिं वसुधारां घनस्तनीम् । वामतः पङ्कजनिधिं प्रियया सहितं यजेत् ।१५ सिन्दूराभौ भुजश्लिष्टौ रक्तपद्मोत्पलान्वितौ । निःसरद्रत्नधाराभ्यां पद्माभ्यां मूर्द्धिनलाञ्छितौ ।१६ तुन्दिलं पङ्कजनिधिं तन्वीं वसुमतीमपि । दलाग्रेषु यजेदेता बलाकाद्याः समन्ततः ।१७ बलाकीं विमलांचैव कमलां नवमालिकाम् । विभीषिकां मालिकां च शाङ्करी वसुमालिकाम् ।१८ पङ्कजद्वयधारिण्यो मुक्ताहारसमप्रभाः । लोकेशान् पूजयेदन्ते वज्रायस्त्राणि तद्बहिः ।१६ इत्थं यो भजते देवीं विधिना साधकोत्तमः । धनधान्यसमृद्धिः स्याच्छ्रियमाप्नोत्यनिन्दिताम् ।२० वक्षः प्रमाणे सलिले स्थित्वा मन्त्रामिमं जपेत् । त्रिलक्षं संयतो मन्त्री देवीं ध्यात्त्वार्कंमण्डले ।२१ स भवेदल्पकालेन रमाया वसतिः स्थिरः । विष्णुगेहस्थविल्वस्य भूलतास्थाय मन्त्रवित् ।२२