शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम पटल ] [ १६७ नित्य प्रति सुगन्धित पुष्प आदि अर्चनोपचारों के द्वारा श्री देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए ।५। उसका एक सहस्र मधुरोक्षित कलशों से प्रकर्ष रूपसे हवन करना चाहिए । अथवा जप के अन्त में मन्त्रधारी व्यक्ति को मधुर से समाप्लुत तिलों से हवन करना चाहिए ।६। अथवा साधना करने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष को विल्व के फलों के द्वारा हवन करना चाहिए । यहाँ पर 'विभिन्न' इस पद का भावार्थ है कि श्री सूक्त के द्वारा एक-एक वार हवन करके पीछे मूल के द्वारा हवन करना चाहिए ।७। विभूतिरुन्नतिः कान्तिः सृष्टिः कीर्तिश्च सन्नतिः । पुष्टिरुत्कृष्टिश्चर्द्धिश्च सम्प्रोक्ता नव शक्तयः ।८ अन्तःबाह्य यजेद्देवीं परिवारसमन्विताम् । बीजाढ्यमासनन्दत्त्वा मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६ यजेत्पूर्ववदङ्गानि दिग्दलेष्वर्चयेत्ततः । वासुदेवं सङ्कर्षणंच प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ।१० हिमपीततमालेन्द्रनीलाभान्पीतवाससः । शंखचक्रगदापद्मधारिणस्तान् चतुर्भुजान् ।११ विदिग्गतेष पत्रै षु दमकादीन्गजेन्द्रजान् । दमकं सलिलं चैव गुग्गुलं च कुरुण्टकम् ।१२ जपेच्छंखनिधिं देव्या दक्षिणे दयितान्वितम् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ किञ्चित्स्मितमुखाम्बुजौ ।१३ अन्योन्यालिङ्गनपरौ शंखपङ्कजधारिणौ । विलसद्रत्नवर्षाभ्यां शंखाभ्यां परिलाञ्छितौ ।१४ नौ शक्तियाँ, विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, पुष्टि, उत्कृष्टि और ऋद्धि-ये नौ शक्तियाँ कहीं गयी हैं ।८। यहाँ पर देवी का आवाहन करके परिवार से संयुत देवी का यजन करना चाहिये । बीज से आढ्य आसन अर्पित करके मूल के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिए ।६। पूर्व की ही भाँति अङ्गों का यजन करे फिर दिग्दलों में अभ्यर्चन करना चाहिए । भगवान् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनि-