भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 511 में से

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१६० ] [ श्री शारदा तिलक स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्राह्मयाद्यास्तदनन्तरम्। लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि त तद्बहिः ।६६ इति सम्पूजयेद्देवी साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत्। दशाक्षरीसमुक्तानि कर्माण्यत्रापि साधकः ।६७ वाचस्पतेऽमृतेभूयः प्लुतः प्लुरितिकीर्तयेत् । वागाद्यो मुनिभिः प्रोक्तो रुद्रसंख्याक्षरो मनुः ।६८ कुर्यादंगानि विधिवद्वागाद्यैः पञ्चभिः पदैः ।६६ आसीना कमले करैर्जपवटीं पद्मद्वयं पुस्तकं विभ्राणा तरुणेन्दुबद्ध मुकुटा मुक्तेन्दुकुन्दप्रभा। भालोन्मीलितलोचना कुचभराक्रान्ता भवद्भूतये भूयाद्वागधिदेवता मुतिगणैरासेव्यमानाऽनिशम् ।१०० देवी के दक्षिण की ओर संस्कार की हुई वाङ्मयी तनु का पूजन करना चाहिए। प्राकृता का वाम भाग में पूजन करे। यह वाङ्मयी सब सिद्धियों के देने वाली है।६४। पूर्वकी तरह अङ्गों का यजन करके फिर ब्रह्मादि का पूजन करे। प्रज्ञा-मेधा-श्रुति-शक्ति स्मृति वागीश्वरी- मति ओर स्वस्ति का पूजन करके उसको अनन्तर ब्राह्मी आदि का यजन करना चाहिए। फिर लो केशों का अर्चन कर उनके वाहिर उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिए ।६४।६५। इस रीति से देवी का भली-भांति अर्चन करने से पूजक साक्षात् वाक्का वल्लभ हो जाता है। यहां पर भी दशाक्षरी में कथित कर्मों को साधक करें ।६७। वागात्र वाग्भव का आद्य-वाचस्पते फिर अमृते प्लुत और प्लुति-इसका कीर्तन करे। यह मन्त्रं मुनियों के द्वारा एकादश अक्षरों वाला कहा गया है। ।६८। वागाद्य पाँच पदों से अङ्गों का समाचरण सविधि करना चाहि। ।६६। अब ध्यान है—कमल के आसन पर विराजमान, करों से जप की माला, दो पद्म और पुस्तक को धारण करती हुई, तरुणचन्द्र से मुकुट को बांधे हुए, मोती, चन्द्र और कुन्द के समान प्रभा वाली

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