शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम पटल ] [ १८५ और नील कमलों से शूद्रों को मन्त्र का ज्ञाता हवन करके वश में कर लिया करता है ।१०६।११२। पुष्पैर्मधूकजैर्हुत्वा वशमानयति स्त्रियः । कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं यन्त्रभूषितम ।११३ अभिषेकं प्रकुर्वीत विधिना सर्वसिद्धये । कलशान्स्थापयेत्तष पदेषु शुभलक्षणान् ।११४ चन्दनालिप्तसर्वाङ्गानन् दूर्वाक्षतसमन्वितान् । दुकूलवेष्टिताने तान्पूरयेत्तीर्थवारिणा ।११५ नवरत्नममाबद्धं कर्षकाञ्चनकल्पितम् । मध्यकुम्भे क्षिपेत्पद्म यन्त्राढ्यं देशिकोत्तमः ।११६ चन्दनोशीरकर्पूर जातीकङ्कोलकुङ्कुमम् । कुष्ठागरूत्तमालैलायुतं संपिष्य भागतः ।११७ त्रिलोड्य सर्वकुम्भेषु रत्नान्यपि विनिःक्षिपेत् । लक्ष्मी दूर्वा सदाभद्रा सहदेवी मधुव्रता ।११८ मुशली शक्रवल्लीच क्रान्ताऽपामार्गपत्रकान् । प्रियैंगु मुग्दगोधूमव्रीहींश्च सचिलान्यवान् ।११९ उक्त विधि से ही मधूक के पुष्पों से हवन करके स्त्रियों को वश कर लेता है । नवपद स्वरूप वाला यन्त्र विशेष को लिखकर मण्डल यन्त्र में भूषित करे फिर विधि से अभिषेक समस्त सिद्धि के लिए करना चाहिए । उन स्थानों में शुभ लक्षण वाले कलशों की स्थापना करे जो चन्दन से सर्वाङ्ग में आलिप्त होवे और दूर्वा तथा अक्षतों से समन्वित होवे । इनको वस्त्र से वेष्टित करके तीर्थ के जल से भर देवे । उत्तम आचार्य को चाहिए कि कुम्भ के मध्य में एक सौ साठ रत्तियों के प्रमाण वाले सुवर्ण से प्रकल्पित और नौ रत्नों से समाबद्ध यन्त्र से संयुत पद्म को क्षिप्त करे । चन्दन, उशीर (खस) कपूर, जाती, कंकोल, कुंकुम, कुष्ठ, अगरु, तमाल, एला (इलायची) से संयुत भाग बराबर पीस कर सब कलशों में विलोडन करके रत्नों का भी प्रक्षेपण कर देवे । लक्ष्मी,