भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

१८८ ] [ श्री शारदा तिलक होकर वस्त्रों का परिधान करे और विधि के साथ आचमन करके गुरु को साष्टाङ्ग प्रणाम करे। और उन गुरुदेव को देव बुद्धि के साथ वस्त्र भूषण धन, धान्य, गौ, महिषी, दासी, दास आदि से विधि के सहित सन्तुष्ट करे। फिर ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा जो दीन, अन्धे और दया के पात्र होवे उनको भी भोजन करावे ।१२७।१३३। महान्तमुत्सवं कुर्यात्शुभभवने बन्धुभिः सह । तदा कृतार्थमात्मानं मन्यते मनुजोत्तमः ।१३४ अभिषिक्तो नरपतिः परान् विजयतेऽचिरात् । पदेच्छुः पदमाप्नोति राजपुत्रो न संशयः ।१३५ अभिषिक्ता सती बन्ध्या सूते पुत्रं महामतिम् । महारोगेषु जातेषु कृत्याद्रोहेषु देशिकः ।१३६ भूतेष दुर्निमित्तादौ विदध्यादभिषेचनम् । सर्वसम्पत्करं पुंसां सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् ।१३७ सर्वरोगप्रशमनं सर्वापद्विनिवारणम् । गर्भरक्षाकरं स्त्रीणां दीर्घायुर्जनकं परम् ।१३८ प्रसूतानामपि स्त्रीणां सूतिकागाररक्षकम् । प्रनष्टपुष्पगर्भाणां पुष्पगर्भाभिरक्षम् ।१३६ आसन्नशत्रुभीतीनां नाशनं च महीभृताम् । अभिषेकमिनं प्राहूरागमार्थविशारदाः ।१४० अपने भाई बन्धुओं के साथ गृह में महान् उत्सव करावे । उसी अवसर पर मनुष्य अपने आपको कृतार्थ मानता है । इस प्रकार से अभिषेक किया हुआ नरपति अपने शत्रुओं पर शीघ्र ही विजय प्राप्त किया करता है। राजपुत्र आदि पद पाने की इच्छा वाला हो तो निश्चय ही पद को प्राप्त कर लेता है—इसमें लेश मात्र की संशय नहीं है। यदि सती वन्ध्या हो तो अभिषिक्त होकर मतिमान् पुत्र का प्रसव किया करती है । आचार्य का कर्त्तव्य है कि महान् रोगों के हो जाने पर-कृत्या द्रोह में-भूतों में और दुर्निमित्तों में अवश्य ही अभिषेक