भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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नवम पटल ] [ १६३ विलासिनी—दोग्ध्री—अघोरा—मङ्गला हैं ।१८। वीजाद्य आसन देकर मूर्त्तिका मूल से ही पूजन करना चाहिए। उनमें आवरणों के सहित आवाहन करके देवी का भली-भाँति पूजन करना चाहिए ।१६। मध्यप्राग्याम्यसौम्येषु पश्चिमेषु यथाक्रमात् । हृल्लेखाद्याः समभ्यर्च्य्याः पञ्चभूतसमप्रभाः ।२० वरपाशाङ्कुशा भीतिधारिण्योऽमितभूषणाः । स्थानेषु पूर्वमुक्तेषु पूजयेदङ्गदेवताः ।२१ षट्कोणेषु यजेन्मन्त्री पश्चान्मिथुनदेवताः । इन्द्रकोण लसद्दण्डकुण्डिकाक्षगुणाभयाम् ।२२ गायत्रीं पूजयेन्मन्त्री ब्रह्माणमपि तादृशम् । रक्षःकोण शङ्खंक्रगदापङ्कजधारिणीम् ।२३ सावित्रीं पीता वस्त्रां यजेद्विष्णुं च तादृशम् । वायुकोणे परश्वक्षमालाभयवरान्विताम् ।२४ यजेत्सरस्वतीमित्थं रुद्रं तादृशलक्षणम् । वह्निनकोणे यजेद्रत्नकुम्भं मणिकरण्डकम् ।२५ कराभ्यां विभ्रतं पीठ तुन्दिलं धननायकम् । आलिङ्ग्य सव्यहस्तेन वामेनाम्बुजधारिणीम् ।२६ धनदाङ्कसमारूढां महालक्ष्मी प्रपूजयेत् । वारुणे मदनं बाणं पाशाङ्कुशशरासनम् ।२७ धारयन्तं ज्वरक्तं पूजयेद्रत्नभूषणम् । सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनांतपलधारिणीम् ।२८ मध्य में—पूर्व—याभ्य—सौम्य—पश्चिम में कर्म के अनुसार पाँच भूतों के तुल्य प्रभा से समन्वित हल्लेखा आदि का भली-भाँति अभ्यर्चन करना चाहिए ।२०। वरदान—पाश—अंकुश और अभीष्ट के धारण करने वाले अपरिमित भूषण से समन्वित देवताओं को पूर्व में वर्णित स्थानों में पूजित करना चाहिए ।२१। मन्त्र के धारण करने वाले को पीछे षट्कोणों में मिथुन देवता का यजन करना चाहिए ।