भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

नवम पटल ] [ १६३ विलासिनी—दोग्ध्री—अघोरा—मङ्गला हैं ।१८। वीजाद्य आसन देकर मूर्त्तिका मूल से ही पूजन करना चाहिए। उनमें आवरणों के सहित आवाहन करके देवी का भली-भाँति पूजन करना चाहिए ।१६। मध्यप्राग्याम्यसौम्येषु पश्चिमेषु यथाक्रमात् । हृल्लेखाद्याः समभ्यर्च्य्याः पञ्चभूतसमप्रभाः ।२० वरपाशाङ्कुशा भीतिधारिण्योऽमितभूषणाः । स्थानेषु पूर्वमुक्तेषु पूजयेदङ्गदेवताः ।२१ षट्कोणेषु यजेन्मन्त्री पश्चान्मिथुनदेवताः । इन्द्रकोण लसद्दण्डकुण्डिकाक्षगुणाभयाम् ।२२ गायत्रीं पूजयेन्मन्त्री ब्रह्माणमपि तादृशम् । रक्षःकोण शङ्खंक्रगदापङ्कजधारिणीम् ।२३ सावित्रीं पीता वस्त्रां यजेद्विष्णुं च तादृशम् । वायुकोणे परश्वक्षमालाभयवरान्विताम् ।२४ यजेत्सरस्वतीमित्थं रुद्रं तादृशलक्षणम् । वह्निनकोणे यजेद्रत्नकुम्भं मणिकरण्डकम् ।२५ कराभ्यां विभ्रतं पीठ तुन्दिलं धननायकम् । आलिङ्ग्य सव्यहस्तेन वामेनाम्बुजधारिणीम् ।२६ धनदाङ्कसमारूढां महालक्ष्मी प्रपूजयेत् । वारुणे मदनं बाणं पाशाङ्कुशशरासनम् ।२७ धारयन्तं ज्वरक्तं पूजयेद्रत्नभूषणम् । सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनांतपलधारिणीम् ।२८ मध्य में—पूर्व—याभ्य—सौम्य—पश्चिम में कर्म के अनुसार पाँच भूतों के तुल्य प्रभा से समन्वित हल्लेखा आदि का भली-भाँति अभ्यर्चन करना चाहिए ।२०। वरदान—पाश—अंकुश और अभीष्ट के धारण करने वाले अपरिमित भूषण से समन्वित देवताओं को पूर्व में वर्णित स्थानों में पूजित करना चाहिए ।२१। मन्त्र के धारण करने वाले को पीछे षट्कोणों में मिथुन देवता का यजन करना चाहिए ।

१६८ ] [ श्री शारदा तिलक इन्द्र कोण में शोभित दण्ड-कुण्डिका अक्ष अभय वाली गायत्री का मंत्र- धारी पूजन करे और उसी प्रकार वाले ब्रह्माजी का भी यजन करना चाहिए । राक्षस कोण में शंख—चक्र गदा और पद्म के धारण करने वाली पीतवस्त्र से संयुत सावित्री का अर्चन करे और उसी प्रकार से विष्णु का यजन करे । वायुकोण में परशु—अक्षमाला—अभय और वरदान से युक्त सरस्वती का अर्चन करे और इसी प्रकार से उसी तरह के लक्षणों वाले रुद्र का भी यजन करना चाहिये । अग्निकोण में मणि- करण्डक रत्न—कुम्भ का अर्चन करे । वरों से धारण किये हुए पीत- तुन्दिल धन नाथक को सव्यहस्त से आलिंगन करके वाम हस्त से धनद के अङ्क में समारूढ़ अम्बुजधारिणी महालक्ष्मी का अभ्यर्चन करना चाहिये । वारुण में मदन, बाण, पाश, अंकुश, शरासन को धारण करते हुए जया के समान रक्त रत्न भूषण धारिणी का पूजन करे । २२-२८। पाणिना, रमणाङ्कस्थां रतिं सम्यक् समर्चयेत् । ऐशाने पूजयेत्सम्यक् विघ्नराजं प्रियान्वितम् ।२९ सृणिपाशधरं कान्तावराङ्गस्पृक्करांगुलिम् । माध्वीपूर्णकपालाढ्यं विघ्नराजं दिगम्बरं ।३० पुष्करे विलसद्रत्नस्फुरच्चषकधारिणम् । सिन्दूरसदृशाकारांमुद्दाममदविभ्रमाम् ।३१ धृतरक्तोत्पलामन्यपाणिना तु ध्वजस्पृशम् । आश्लिष्टकान्तामरुणां पुष्टिसंज्ञैर्दिगम्बराम् ।३२ कर्णिकायां, निधी पूज्यौ षट्कोणोभयपार्श्वयोः । अङ्गानि केसरेष्वेताः पश्चात्पत्रेषु पूजयेत् ।३३ अनङ्गाकुसुमा पश्चादनंगकुसुमातुरा । अनंगमदना पश्चादनंगमदनातुरा ।३४ भुवनपाला गगन—वेगा चैग ततः परम् । शशिरेखाथ गगन-रेखा चैवाष्टशक्तयः ।३५ पाणि से रमण की गोद में संस्थिता रति का भली भाँति पूजन

नवम पटल ] [ १८६ करे। ऐशान दिशा में प्रिया से समन्वित विघ्नराज का अर्चन करना चाहिए। २६। सृणि और पाश को धारण करने वाले कान्ता के श्रेष्ठ अङ्ग का स्पर्श करती हुई कर की अंगुलियों से संयुत—माध्वी से परि- पूर्ण कपाल से समन्वित दिगम्बर अर्थात् वस्त्र रहित नग्न विघ्नराज हैं । ३०। विघ्नराज पुष्कर में कान्तिमान् रत्नों से स्फुरण करते हुए चषक को धारण करने वाले हैं। ऐसे ही स्वरूप वाले विघ्नराज का अर्चन करना चाहिए। सिन्दूर के सदृश आकार वाली—उद्दाम मद के विभ्रमों से संयुत रक्तोत्पल को धारण की हुई और अन्य कर से ध्वज का स्पर्श करने वाली कान्त का अश्लेष की हुई अरुण और दिगम्बरा पुष्टिका यजन करे । ३१-३२। कर्णिका में षट्कोण के दोनों पाश्र्वों में निधियों का पूजन करना चाहिए। केसरो में अङ्गों का यजन करे। इसके पीछे पत्रों में इनका अर्चन करना चाहिए। ३३। ये आठ शक्तियाँ हैं—अनङ्ग कुसुमा—पीछे अनङ्ग कुसुमातुरा, अनङ्ग मदना, अनङ्ग मदनातुरा, भुवनपाला, गगनवेगा, शशिरंखा, गगनरेखा—इन आठों का अभ्यर्चन करे । ३४-३५। पाशाङ्कुशवराभीतिधारिण्योऽरुणविग्रहाः । ततः षोडशपत्रेषु कराली विकराल्युसा । ३६ सरस्वती श्रीदुर्गाषा लक्ष्मीश्रुतयौ स्मृतिधृतिः । श्रद्धा मेधा मतिःकान्तिरार्याः षोडश शक्तयः । ३७ खड्गखेटकधारिण्यः श्यामा पूज्यश्च मातरः । पद्माद्वहिसमभ्यर्च्यः शक्तयः परिचारिकाः । ३८ प्रथमाऽनंगरूंपा स्यादादनंगमदना ततः । मदनातुरा भुवन-वेगा भुवनपालिका । ३६ स्यात्सर्वशिशिरानंगवेदनाऽनंगमेखला । चषकं तालवृन्तंच ताम्बूलं छत्रमुज्ज्वलम् । ४० चामरेचांऽशुकं पुष्प बिभ्राणा कर पङ्कजैः । सर्वाभरणसंदीप्ताल्लोकपालांन्बहिय॑जेत् । ४१

२०० ] । श्री शारदा तिलक वज्रादीन्यपि तद्वाह्ये देवीमित्थं प्रपूजयेत् । पूज्यते सकलैर्देवैः किपुनर्मनुजोत्तमैः ।४२ ये सब पाश, अंकुश, वरदान, अभयदान के धारण करने वाली हैं और इनका शरीर अरुण वर्णमाला है। इसके उपरान्त सोलह पत्रों में षोडश शक्तियों का यजन करे—कराली, विकराली, उमा, सरस्वती, दुर्गा, श्रीउषा लक्ष्मी, श्रुति, स्मृति, धृति, श्रद्धा, मेधा, मति, कान्ति, आर्या, ये सोलह शक्तियाँ हैं। ये खङ्ग और खेटक के धारण करने वाली ये श्यामा मातायें पूजा के योग्य हैं। कमल के वाहिर परिचा- रिका शक्तियों का अभ्यर्चन करना चाहिए । ३६।३८। प्रथमा अनङ्ग रूपा है फिर अनङ्ग मदना, मदनपुरा, भुवनवेगा, भुवन पालिका, सर्व शिशिरा, अनङ्ग वेदना, अनङ्ग मेखला, ये चम्पक, तालवृन्त, ताम्बूल, उज्ज्वल छत्र, चमर, अंशुक और पुष्प को कर कमलों से धारण किये हुए हैं। समस्त आभूषणों से संदीप्त लोकपालों का यजन बाहिर करना चाहिये ।३६।४१। उनके बाहिर वज्र आदि आयुधों का अर्चन करे इस प्रकार देवी का पूजन करना चाहिए। इसी भाँति ये समस्त देवगणों के द्वारा पूजी जाया करती है फिर मनुष्यों के द्वारा पूजा किया जाना तो कहा ही क्या जा सकता है ।४२। मंत्री त्रिमधुरोपेतैर्हुत्वाश्वत्थसमिद्वरैः । ब्राह्मणान्वशयेच्छीघ्रं पार्थिवान्पद्महोमतः ।४३ पालाशपुष्पैस्तत्पत्नीमन्त्रिणः कुमुदैरपि । पञ्चविंशतिसञ्जप्तैर्जलैः स्नानं दिनेदिने ।४४ आत्मानमभिषिञ्चेद्यः सर्वसौभाग्यवान् भवेत् । पंचविंशतिसंजप्तं जल प्रात पिबेन्नरः ।४५ अवाप्य महतीं प्रज्ञां कवीनामग्रणीर्भवेत् । कर्पूरागुरुसंयुक्तं कुंकुमं साधु साधितम् ।४६ गृहीत्वा तिलकं कुर्याद्राजवश्यमनुत्तमम् ।

नवम पटल ] [ २०१ शालिपिष्टमयीं कृत्वा पुत्तलीं मधुरान्विताम् ।४७ जप्तां प्रतिष्ठितप्राणां पूजयेद्रविवासरे । वशं नयति राजानं नारी व नरनेव वा ।४८ कण्ठमात्रोदके स्थित्वा वीक्ष्य तोयगतं रविम् । त्रिसस्रं जपेन्मन्वमिष्टां कन्यां लभेन्नरः ।४६ मन्त्रधारी पीपल की श्रेष्ठ समिधाओं को त्रिमधूर से समाप्लुत करके फिर उनसे हवन करे तो शीघ्र ही ब्राह्मणों को अपने वश में कर लेता है। पद्द्मों से होम करके पार्थिवों को वशीभूत कर लिया करता है—पलाश (ढाक) के पुष्पों के द्वारा होम करके उनकी पत्नियों को अपने वश में करता है और कुमुदों का हवन करके मन्त्रियों को वश में कर लेता है। पच्चीस बार जप किये हुए जल से प्रतिदिन स्नान करे और जो अपने आपका अभिषेक करे तो वह सभी प्रकार से सौभाग्य वाला हो जाता है। पच्चीस बार जप करके अभिमन्त्रित जल जो प्रातःकाल में पीता है तो मनुष्य बहुत बड़ी प्रज्ञा का लाभ कर कवियों का भी अग्रणी (अगुआ) हो जाया करता है। कपूर, गुग्गल से संयुत कुंकुम से भली भाँति साधित को लेकर तिलक करे तो बहुत ही उत्तम राजा को वश्य करने वाला होता है। शाली के पिष्ट से परिपूर्ण और मधुर से युक्त पुतली बनाकर उसका जप करके प्राण प्रतिष्ठा करे और रविवार के दिन उसका अर्चन करना चाहिए तो वह पुरुष राजा को अपने वश में कर लेता है और नारी अथवा नर को वश्य कर लिया करता है ।४३।४८। कण्ठ मात्र जल में स्थित होकर जल में सूर्य का दर्शन करे। तीन सहस्र मन्त्र का जप करे तो मनुष्य अपनी अभीष्ट कन्या को प्राप्त कर लिया करता है ।४६। अन्नं तन्मन्त्रितं मन्त्री भुञ्जीत श्रीप्रसिद्धये । लिखितां भस्मनां मायां ससाध्यां फलकादिषु ।५० तत्काले दर्शयेद्यन्त्रं सुखं सूयेत् गर्भिणी ।५१ शक्तयन्तः स्थितसाध्यकमैभवने वह्नेर्वृतं शक्तिभिः-

२०२ ] [ श्री शारदा तिलक बर्ह्ये कोणगर्तैयुतं हरिहरैर्वर्णैः कपोचार्पितैः । पश्चात्तैः पुनरीयुतैर्लिपिभिरप्यावीतमिष्टार्थदं । यन्त्रं भुपुरमध्यगं त्रिगुणितं सौभाग्यसम्पत्प्रदम् ।५२ बीजान्तः स्थितसाध्यनामशरशोभायारमामन्मथैः । वीतं वह्निपुरद्वये रसपटे स्वाख्याढ्यबीजत्रषम् । स्वात्मानात्मकमीं शिख हरिहरैरात्रद्धगण्डंबहिः- षड्वोजैरनुवद्धसंधिलिपिभिर्वीतं गुहाध्यां भुवः ।५३ चिन्तामणिर्नृसिंहाभ्यां लसत्कोणमिदं लिखेत् । यन्त्रं षड्गुणितं दिव्य वहतां सर्वसिद्धिदम् ।५४ बीजं व्याहृतिभिर्वृतं गृहयुगद्वन्द्व वसोः कोणगः । दौर्ग बीजमनन्तरं लिपियुगैराबद्धगण्ड लिखेत् । गायत्र्या रविशक्तिवद्धविवरं त्रिष्टुब्वृतं तत्ततो- वीतं मातृकयो धरापुरयुगे सत्सिंहचिन्तामणिम् ।५५ मन्त्रं दिनेशगुणितं प्रोक्तं रक्षाप्रसिद्धिदम् । सर्वसौभाग्यजननं सर्वशत्रुनिवारणम् ।५६ मंत्रधारी उस मन्त्रसे अन्तको अभिमन्त्रित करके उसका अशन करे तो श्री की प्रकृष्ट सिद्धि हो जाया करती है । साध्यके सहित माया को भस्मसे फलक (पट्टे आदि) पर लिखे उस मन्त्रको गर्भिणीको दिखावे तो वह तत्काल में सुखपूर्वक प्रसव किया करती है ।५०।५१। अब त्रिगुणित मंत्र बतलाया जाता है जो कि सौभाग्य और सम्पदा के प्रदान करने वाला होता है ऊर्ध्व के अग्रभाग में त्रिकोण में मध्य में शक्ति बीज स्थित है उसमें साध्य—साधक का कर्म हो और शक्तियों से वृत होंगे । वाह्य में अर्थात् त्रिकोण के अग्रभागों में कमोसार्पित अर्थात् गण्ड स्थल लिखित हरिहर वर्णों से कोण के गर्त्त में संयुत पीछे फिर उन ईकार युत लिपियों से भी आवीत हो—यह भूपुर के मध्य में स्थित यन्त्र अभीष्ट अर्थ का दाता होता है ।५२। अब षड्गुणित यन्त्र बतलाते हैं- वह्नि का तात्पर्य यह है कि परस्पर में व्यति भिन्न त्रिकोण द्वय में

नवम पटल ] [ २०३ कथित परिमाण वाला वृत्त बनाकर पूर्व—पश्चिम में सूत्र को स्फालित करके उनके अग्रभागों में सूत्र को अधिष्ठित करे। वृत्तके अर्ध परिमाण वाले सूत्र से दो मत्स्य बनावे। ऐसा करने पर चार मत्स्य निष्पन्न होते हैं। पूर्व और पश्चिम के दो—मत्स्यों में दक्षिणोत्तर में रहने वाले दोनों सूत्रों का आस्फालित करे। इत्यादि रीति से सम्पुटित करने पर वह्निपुर द्वय होते हैं। शक्ति बीज के अन्दर स्थित साध्य और साधक के कर्म का नाम पूर्व की ही भाँति लिखे। पाँच प्रकार से रमा, माया और मन्मथ से वीत होवे। रस पुट में अपने नाम से संयुक्त तीन बीज लिखे। ऊर्ध्वभाग में विन्दु के सहित तीन बीजों का लेखन करना चाहिये। ईकारगत ऊर्ध्वभाग तीन कोणों में साधक नाम वाले विन्दु सहित तीन बीजों को लिखे कोणान्तर के अग्र प्रदेश में ईम्—यह लिखे। हरिहरै वद्ध गण्डम्—यहाँ पर गण्डशब्द से षट् कोश कोण के दोनों पार्श्व भाग कहे जाते हैं। ूर्व की ही भाँति हरिहिर वर्णों को लिखना चाहिए। षड्माया बीजोंसे अनुबद्ध सन्धि—इससे एकान्तरित सन्धि वन्ध विवक्षित होता है ।५३। चिन्तामणि और नृसिंह से शोभित इस कोण को लिखे। यह दिव्य षड्गुणित मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों के प्रदान करने वाला है ।५४। अग्नि के बारह कोणों में स्थित व्याहृतियों से वृत्त लिखे और लिपि के युगों से आबद्ध गण्ड अनन्तर में दोर्ग बीज का लेखन करे। गाय के घीसे कोणाग्र के बाहिर स्थापित द्वादश शक्ति बीजों से बद्ध विवर त्रिष्टुत् से वृत्त करे और भूपुर युग में मातृका से वीतससिंह चिन्तामणि का लेखन करना चाहिए ।५५। यह द्वादश गुणित मन्त्र बताया गया है जो रक्षा और प्रसिद्धि का देने वाला है। यह सब तरह के सौभाग्य को उत्पन्न करने वाला और समस्त शत्रुओं के निवारण करने वाला होता है ।५६। लिखेत्सरोजं रसपत्रयुक्तं मध्ये दलेष्वप्यभिलिख्य मायाम् । स्वरावृतं यन्त्रमिदं वधूनां पुत्रप्रदं भूमिगृहान्तरस्थम् ।५०

२०४ ] [ श्री शारदा तिलक षट् कोणमध्ये प्रविलिख्य शक्तिं कोणेषु तामेव विलिख्यः भूयः। ससाध्यगर्भं वसुधापुरस्थं यन्त्रं भवेद्वश्यकरं नराणाम् ।५८ वाग्भवं शम्भुवनिता रमा बीजत्रयात्मकम् । मन्त्र समुद्धरेन्मंत्री त्रिवर्गफलसाधनम् ।५६ षडदीर्घर्घभाजा मध्येन वाग्भवाद्येन कल्पयेत् । षडङ्गानि मनोरस्य जातियुक्तानि मन्त्रवित् ।६० कुर्यात्पूर्वोदितान्न्यासान् तथैवात्रापि साधकः ।६१ सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्र्फुरा त्तारानायकशेखराँ स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् । पाणिभ्यां मणिपूर्णरत्नचषक रत्नोत्पलं बिभ्रतीं । सौम्यां रत्नघटस्थसव्यचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ।६२ रविलक्षं जपेन्मंत्रं पायसैर्मधुरप्लुतः । दशांशं जुहुयान्मन्त्री पीठे प्रागीरिते यजेत् ।६३ छैः पत्रों से संयुत पद्म को लिखे और मध्य में दलों में माया का अभिलेखन करे । यह स्वरों से समावृत यन्त्र भूमिगृह के अन्दर स्थित करे तो बँधुओं को पुत्र प्रदान करने वाला होता है ।५०। षट्कोण के मध्य में शक्ति को लिखकर फिर उसी का लेखन कोणों में करना चाहिए । गर्भ में साध्य के सहित भूपुर में स्थित यह यन्त्र मनुष्य का वश्य करने वाला होता है ।५८। वाग्भव—शम्भु वनितां और रमा अर्थात् सरस्वती, शिवा और लक्ष्मी, इन तीन बीजों के स्वरूप वाला मन्त्र है । मन्त्रधारी इसका उद्धार करे । यह तीन वर्गों के फल को साधने वाला है ।५६। छै दीर्घों के भजने वाले वाग्भवाद्य मध्य से कल्प- ना करे । मन्त्र का ज्ञाता पुरुष इस मन्त्र के जातियुक्त छै अङ्गों की कल्पना करे । ६०। साधक पूर्व में उति न्यासनों को उसी भाँति यहाँ पर भी करना चाहिए ।६१। अब मन्त्र का ध्यान बतलाया जाता है— सिन्दूर के समान शरीर वाली तीन नेत्रों से समन्वित, मणिक्य मौलि में स्फुरित चन्द्रशेखर से युक्त-मुस्कानयुक्त मुखवाली—स्थूल

अष्टम पटल ] [ २०५ स्तनों से संयुत —दोनों हाथों में मणियों से पूर्ण रत्ननिर्मित चषक और रक्त कमल को धारण करती हुई-परम सौम्य स्वरूप रूप वाली— रत्नों के घट में दाहिने चरण को रखने वाली परा अम्बिका का ध्यान करना चाहिए ।६२। इस मन्त्र का बारह लाख जप करना चाहिए और मधुरप्लुत पायस के द्वारा आहुतियाँ देवे जो जप की दशांश ही होवें। मंत्रधारी को पूर्व में वर्णित पीठ में ही यजन करना चाहिए ।६३। देवीं प्रागुक्तमार्गेण गन्धाद्यै रतिशोभनैः । हुत्वा पलाशकुसुमैर्वाक्श्रियं महतीं व्रजेत् ।६४ ब्राह्मीघृत पिभेज्जप्तं कवित्वं वत्सराद्भवेत् । सिद्धार्थान् लवणोपेतान् हुत्वा मन्त्री वशं नयेत् ।६५ नरनारीनरपतीन् नात्रकार्या विचारणा । चतुरङ्गुलजैः पुष्पैः चन्दनाम्भः समुक्षितैः ।६६ हुत्वा वशीकरोत्याशु त्रैलोक्यमपि साधकः । जुहुयादरुणाम्भोजैर्युतं मधुरप्लुतैः ।६७ राज्यश्रियमवाप्नोति सतिलैस्तण्डुलैस्तथा । प्रागुक्तान्यपि कर्माणि मन्त्रेणानेन साधयेत् ।६८ वाग्बीजपुटिता माया विद्येयं त्र्यक्षरी मता । मध्येन दीर्घयुक्तेन वाक्पुटेन प्रकल्पयेत् ।६६ अङ्गानि जातियुक्तानि क्रमेण मन्त्रवित्तमः । यथा पुरा समुद्दिष्टान् न्यासान्कुर्वीत मन्त्रवित् ।७० पूर्व में कथित मार्ग के द्वारा अतीव शोभन गन्धादि से देवी का ढाक के पुष्पों से हवन करके साधक बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है ।६४। मन्त्र के द्वारा जप किए हुए ब्राह्मी घृत का पान करे तो एक ही वर्ष के अन्दर कवित्व को प्राप्त कर लिया करता है । लवण से संयुक्त सिद्धार्थों का हवन करके मन्त्रधारी वश में कर लेता है ।६५। मनुष्य नरों को नारियों को और नरपतियों को सभी को अपने वश में कर लिया करता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं करना चाहिए । साधक

२०६ ] [ श्री शारदा तिलक राजवृक्ष के पुष्पों से, जो चंदन के जल में समुक्षित करके हवन करे तो बहुत ही शीघ्र तीनों लोकों को अपने वश में कर लेता है। मधुर से प्लुत अरुण कमलों के द्वारा दश हजार आहुतियाँ देवें तथा तिलों के सहित तण्डुलों से हवन करे तो साधना करने वाला पुरुष राज्यश्री को प्राप्त कर लेता है। पूर्व में वर्णित कर्मों का भी इसी मन्त्र के द्वारा साधन करना चाहिए ।६६-६८। वाग्बीज से सम्पुटित माया—यह तीन अक्षरों वाली विद्या हैं। मध्य में दीर्घ संयुक्त वाक्पुट से कल्पित करे। मन्त्र का ज्ञान रखने वाला पुरुष क्रम से जातियुक्त अङ्गों का जिस तरह से पूर्व में समुद्दिष्ट किये हैं न्यासों को करे। तात्पर्य यह है पूर्वोक्त रीति से ही अङ्गन्यास करना चाहिए ।६९-७०। श्यामांगी शशिशेखरां निजकरैर्दानं च रक्तोत्पलं रत्नाढ्यं चषकं वरम्भयहरं संविभ्रतीं शाश्वतीम्। मुक्ताहारलसत्पयोधरनतां नेत्रत्रयोल्लासिनीं। वन्देऽहं सुरपूजितां हरवधू रक्तारविन्दस्थिताम् ।७१ तत्तत्त्वक्षं जपेन्मन्त्र जुहुयात्तद्दशांशतः। पलाशपुष्पैः स्वादक्तैः पुष्पैर्वा राजवृक्षजैः ।७२ हृल्लेखाविहिते पीठे पूजयेत्परमेश्वरीम्। मध्यादि पूजयेन्मन्त्री हृल्लेखाद्याः पुरोदिताः ७३ मिथुनानि यजेन्मन्त्री षट्कोणेषु यथा पुरा। अंगपूजा केशरेषु पूज्याः पत्रेषु मातरः ।७४ भैरवाङ्कसमारूढाः स्मरेवक्रा मदालसाः। असितांगोरुरुश्चण्डः क्रोध उन्मत्तभैरवः ।७५ कपाली भीषणश्चैव संहारश्चाष्ट भैरवाः। शूलं कपालं प्रेतं च विभ्राणाः क्षुद्रन्दुभिम् ।७६ गजत्वगम्बरा भीमाः कुटिलालकशोभिताः। दीर्घाद्यां मातरः प्रोक्ता ह्रस्वाद्या भैरवाः स्मृताः ।७७

उल्लास वाली- रक्त कमल पर विराजमान-सुरगणों के द्वारा

नवम पटल ] [ २०७ ध्यान बतलाया जाता है—श्याम वर्ण के अंगों वाली-चन्द्र को मस्तक में धारण करती हुई-अपने कर कमलों में रक्त कमल रत्नों से संयुत चषक-वरदान-अभयदान को निरन्तर धारण करने वाली- मोतियों के हार से सुशोभित स्तनों के भार से नत-तीव्र नेत्रों के द्वारा उल्लास वाली- रक्त कमल पर विराजमान-सुरगणों के द्वारा समर्पित भगवान् शंकर की प्रिया को मैं वन्दना करता हूँ ।७१। चौबीस लाख मन्त्र का जप करना चाहिए और जप का दशांश भाग का पलाश के पुष्पों से जो मधुर से अक्त होवें अथवा राजवृक्ष के पुष्पों से हवन करना चाहिए । हृल्लेखा से विहित पीठ पर परमेश्वरी का अभ्यर्चन करना चाहिए । मन्त्रधारी को मध्य और आदि में पहिले बताई हुई हृल्लेखा आदि का पूजन करना चाहिए ।७२-७३। पूर्व के ही समान षट्कोणों में मिथुनों का यजन करे । केसरों में अंगों की तथा पत्रों में मातृगणों की पूजा करनी चाहिये ।७४। जो मातृगण भैरव के अंग से समारूढ़ है जिनके मुख पर मन्द हास्य है और जो मद से अलस हैं । असितांग-रुरु-चण्ड-क्रोध-उन्मत्त भैरव-कपाली-भीषण-और संहार-ये आठ भैरव होते हैं । शूल-कपाल और प्रेत को धारण करने वाले क्षुद्रन्दुभि गज के त्वचा के अम्बर वाले भीम-कुटिल केशों से शोभित दीर्घाद्य मातृगण बताई गई हैं और ह्रस्वाद्य भैरव कहे गये हैं ।७५-७६ ७७। पूज्याः षोडशपत्रेषु कराल्याद्याः पुरोहिताः । तद्बाह्यै ऽनंगरुपोध्याः लौकेशास्त्राणि तद्वहिः ।७८ एवमाराधयेद्देवीं शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना । वशं नयति राजानं वनिताश्च मदालसाः ।७९ अन्नमाज्येन जुहुयाल्लभते वसु वाञ्छितम् । सुगन्धैः कुसुमैर्हुत्वा श्रियमाप्नोति वाञ्छिताम् ।८० मन्त्रेणानेन संजप्तमश्नीयादन्नमन्वहम् । भवेदरोगी नियतं दीर्घमाप्नुयात् ।८१

२०८ ] [ श्री शारदा तिलक अनन्तो बिन्दुसंयुक्तो माया ब्रह्माग्नितारवान् । पाशादित्र्यक्षरो मन्त्रः सर्ववश्यफलप्रदः । ८२ ऋष्याद्याः पूर्वमुक्ताः स्युर्बीजेनाङ्गक्रिया मता । ८३ वराङ्कुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम् । बालार्ककोटिप्रतिमां त्रिनेत्रां भजेयमाद्यां भुवनेश्वरीताम् । ८४ सोलह पत्रों में पूर्व में वर्णित कराली आदि का पूजन करना चाहिए। उनके बाहिर अनङ्ग रूपा आदि का यजन करे। उनके बाहिर लोकपालों तथा उनके अस्त्रों का अर्चन करना चाहिए । ७८। इसी रीति से शास्त्रों में कहे गए मार्ग के द्वारा ही देवी की अराधना करे। इसका यह प्रभाव होता है कि साधक व्यक्ति इससे राजा को तथा मदालसा वनिताओं को अपने वश में कर लिया करता है । ७६। आज्य (घृत) से युक्त अन्न का होम करे तो अपना अभीष्ट धन प्राप्त कर लिया करता है । सुगन्धित पुष्पों के द्वारा हवन करके मनोवाञ्छित श्री की प्राप्ति कर लेता है ।८०। इस मन्त्र से अभिमन्त्रित अन्न का नित्य ही अशन करे तो नियत रूप से रोग से रहित होता है और दीर्घायु को प्राप्त किया करता है ।८१। अनन्त अर्थात् आकार जो बिन्दु से संयुत होवे- माया बीज से युक्त ककार-अग्नि-रेफ और प्रणव के संयुत-पाश आदि वाला तीन अक्षरों का मन्त्र होता है जो सबको वश्य करने के फल का प्रदान करने वाला है ।८२। इसके ऋषि आदि पूर्व में ही कहे गए हैं और बीज से अङ्ग क्रिया मानी गयी है ।८३। ध्यान बतलाया जाता है करकमलों के द्वारा वरदान, अंकुश पाश और अभयदान को धारण करने वाली, कमल के आसन पर विराजमान करोड़ों बाल सूर्यों के तुल्य तेज से समन्वित तीन नेत्री वाली उस आद्य भुवनेश्वरी देवी का मैं भजन करता हूँ ।८४। हविष्यभुग् जपेन्मन्त्रं तत्त्वयक्षं जितेन्द्रियः । तत्सहस्रं प्रजुहुयाज्जपान्ते मन्त्रचित्तमः ।८५

नवम पटल ] [ २०६ दधिक्षौद्रघृताक्ताभिः समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् । तत्संख्यया तिलैः शुद्धैः पयोक्तैजुहुयात्ततः।८६ हृल्लेखाविहिते पीठे नवशक्तिसमन्विते । अर्चयेत्परमेशानी वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् ।८७ हृल्लेखाद्या यजेदादौ कर्णिकायां यथाविधि । अङ्गानि केसरेषु स्युः पत्रस्था मातरः क्रमात् ।८८ इन्द्रादयः पुनः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः । एवं संपूजयेद्देवीं साक्षाद्वैश्रवणो भवेत् ।८६ दृश्यते मकलैर्लोकैस्तेजसा भास्करोपमः । अनेनाधिष्ठतं गेह निशि दीपशिखाकुलम् ।६० दृश्यते प्राणिभिः सर्वैर्मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । सर्षपैर्लोगसंमिश्रैराज्यक्तैर्जुहुयान्निशि ।६१ अपनी सब इन्द्रियों को जीत लेने वाला हविष्य का भोजन करने वाला पुरुष यन्त्र का चौबीस लाख जप करे । मन्त्रोंका ज्ञान रखने वाला जप के अन्त में उतना ही सहस्र होम करे । फिर दही, शहद और घृत से अक्त करके दूध वाले वृक्षों की समिधाओं से उसकी संख्या से शुद्ध तिलों के द्वारा जो पय से अक्त होवें हवन करना चाहिए और उसकी संख्याके ही अनुसार होम करे ।८५।८६। उस परमेशानी का आगे बताये जाने वाले क्रम से नव शक्तियों से समन्वित हृल्लेखाविहित पीठ पर अभ्यर्चन करना चाहिए ।८७। आदि में विधि के अनुसार कर्णिका में हृल्लेखा आदि का यजन करे । केसरों में अङ्ग होवें और मातृगण क्रमसे पत्रों में स्थित होनी चाहिए ।८८। फिर इन्द्र आदि का पूजन करे और उनके बाहिर उनके अस्त्रों का यजन करे । इस प्रकार से देवी का अर्चन करे तो साक्षात् वैश्रवण ही हो जाया करता है ।८६। वह मनुष्य तेजसे समस्त लोकों के द्वारा सूर्यके ही तुल्य दिखलाई दिया करता है । इसके द्वारा अधिष्ठित गेह रात्रि में दीप शिखा से समाकुल होता है ।६०। इस मन्त्र के प्रभाव से सभी प्राणियों के द्वारा वह ऐसा दिखलाई दिया

प्रथमोऽष्टाक्षरो मन्त्रः ततः कामिनि रञ्जिनि ।

२१० ] [ श्री शारदा तिलक करता है। नमक से संमिश्रित सर्षपों से जो आज्य से अक्त होवें रात्रि के समय में हवन करना चाहिए ।६१। राजानं वशयेत्सद्यस्तत्पत्नीमपि साधकः । अन्नवानन्नहोमेन श्रीमान्पद्महुताद्भवेत् ।६२ राजवृक्षसमुद्भूतै पुष्पैर्हुत्वा कविर्भवेत् । अरोगी तिलहोमेन घृतेनायु॒रवाप्नुयात् ।६३ प्राक्प्रोक्तान्यपि कर्माणि साधयेत्साधकोत्तमः ।६४ आलिख्याष्टदिमर्गलान्यउदरगं पाशादिकं त्र्यक्षरं कोष्ठेष्वङ्गमनून् परेषु विलिखेदष्टाणर्मन्त्रद्वयम् । अच्पूर्वापरषट् कयुग्लयवरान् व्योमासनानर्गले- ष्वालिख्येन्द्रजलाधिपादिगुणशः पङ् क्तिद्वयं तत्परम् ।६५ कोष्ठेष्वष्टयुगार्णमात्मसहितां युग्मस्वरान्तर्गतां मायां केसरदिग्दलेषु विलिखे मूलं त्रिपङ्क्तिक्रमात् । त्रिःपाशाङ् कुशवेष्टितं लिपिभिरावीयं क्रमाद्वृत्तक्रमात । पद्मस्थेन घटेन पङ्कजमुखेनावेष्टितं तद्बहिः ।६६ घटार्गलमिदं यन्त्रं मत्रिणां प्राभृतं मतम् । पाशश्रीशक्तिकन्दर्पकामशक्तीन्दिरांकुशाः ।६७ प्रथमोऽष्टाक्षरो मन्त्रः ततः कामिनि रञ्जिनि । स्वाहान्तोऽष्टाक्षरः सद्भिर्परपरः परिकीर्त्तितः ।६८ साधक व्यक्ति तुरन्त ही ऐसा करने से राजा को अपने वश में कर लिया करता है और उनकी पत्नी को भी वश्य कर लेता है। अन्न के होम से अन्न वाला हो जाता है। पद्मोंके होम से श्रीमान् होता है ।६२। राज वृक्ष में समुत्पन्न पुष्पों से हवन करके कवि हो जाया करता है। तिलों के होम से रोग रहित और घृत के हवन करने से आयु को प्राप्त किया करता है ।६३। साधना करने वालों में उत्तम साधक व्यक्ति पूर्व में वर्णित भी कर्मों को करे ।६४। अब घटार्गल यन्त्र बतलाते हैं—आठ

नवम पटल ] [ २११ दिशाओं में अर्गलाओं को लिखकर उदरगं पाश आदि तीन अक्षरों को कोष्ठों में और दूसरों में अङ्ग मन्त्रोंको लिखें। आठ अक्षरोंके ये दो मंत्र हैं। अच पूर्वा पर षट्क से युक्त लयवरो को व्योमासनों को अर्गलों में लिखकर इन्द्र जलाधिप (वरुण) आदि के गुण से उससे परे दो पंक्तियों को लिखे ।८२। कोष्ठों में अष्ट युगार्ण को युग्म स्वरों के अन्तर्गत आत्म सहित मायाको केसर दिग्दलों में लिखना चाहिए। तीन पंक्तियों के द्वारा आवीत उसके बाहिर पद्म में स्थित पङ्कज मुख घट से आवेष्टित करे। ।८६। यह घटार्गल यन्त्र होता। जो मन्त्रधारियों का प्राभृत माना गया है। पद्म श्री शक्ति—कन्दर्प—काम शक्ति—इन्दिरा—अंकुश हैं। प्रथम आठ अक्षरों वाला मन्त्र होता है। इसके उपरान्त कामिनी— रञ्जिनि और अन्त में स्वाहा होता है—यह सत्पुरुषों के द्वारा दूसरा आठ अक्षरों वाला मन्त्र कीर्त्तित किया गया है ।८७।८८ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि सवर्म फट्। द्विठान्तः षोडशार्णोऽयं मन्त्रः सद्भिरुदीरितः ।९९ लिखित्वा भूर्जपत्रादौ यन्त्रमेतद्यथाविधि। धारयेद्वामबाहौ वा कण्ठे वा निजमूर्द्धनि । १०० वशयेत्सकलान्मर्त्यान् विशेषेण महीपतिम्। नीलपट्टे विलिख्यैतद्गुटिकीकृत्य तत्पुनः । १०१ साध्यप्रतिकृतौ सिकथनिर्मितायां हृदि न्यसेत्। पात्रे त्रिमधुरापूर्णे-निःक्षिप्यैनां विधानतः ।१०२ सम्पूज्य गन्धपुष्पाद्यैर्बलि निःक्षिप्य रात्रिषु। मूलमन्त्रं जपेन्मन्त्री नित्यमष्टसहस्रकम् ।१०३ सप्ताद्वाहाच्छितां नारीमाहरेत्स्मरविह्वलाम्। भूर्जपत्रे विलिख्यैतत् गुटकीकृत्य तत्पुनः । १०४ लाक्षया ताम्ररजतकाञ्चनैर्वेष्टयेत्क्रमात्। तत्कुम्भे न्यस्य सम्पूज्य यथावद्भुवनेश्वरीम् । १०५

२१२ ] [ श्री शारदा तिलक 'ह्रीं गौरि रुद्र दयिते योगेश्वरि' वर्म के सहित फट् जिसके अन्त में दो ठकार होवें—यह सोलह वर्णों वाला मन्त्र सत्पुरुषों के द्वारा कहा गया है ।६६। इस मन्त्र को भोजपत्र आदि पर विधि के साथ लिखकर इसको साधक अपनी बांयी बाहु में अथवा कण्ठ में या अपने मस्तक में बाँधे तो वह सब मनुष्यों को वशमें कर लिया करता है और विशेष रूप से नृपति को अपने वशमें कर लेता है । नील पट्ट पर इसको लिखकर फिर गुटिका बनाकर सिक्य के द्वारा निर्माण की हुई साध्यकी प्रतिमा के हृदय में न्यस्त कर देवे । तीन मधुरों से परिपूर्ण पात्र में इसको निधान से निक्षिप्त कर देवे । गन्ध पुष्प आदि के द्वारा भली- भाँति पूजन करके रात्रि के समय में बलि का विक्षेपण करे । मन्त्रधारी को नित्य ही मूल मन्त्रका आठ सहस्र जप करना चाहिये । १००-१०३ एक ही सप्ताह में अपनी मनोवांछित काम वासना से विह्वल नारी का आहरण कर लेता है । भोजपत्र पर इसको लिखकर फिर उसकी गुटिका बनावे ।१०४। लाख से ताम्र, चाँदी, सुवर्ण से क्रम से इसको वेष्टित करे । उसको कुम्भ में न्यस्त करके भुवनेश्वरी देवी का यथा रीति से भली-भाँति अर्चन करना चाहिये ।१०५ संस्पृश्य तज्जपन्मन्त्रं दिवाकरसहस्रकम् । अभिषिच्य प्रियं साध्यं बध्नीयाद्यन्त्रमा शिखम् । १०६ कान्तिं पुष्टिं धरारोग्यशांति लभते नरः । भित्तौ विलिख्य तद्यन्त्रं पूजतेन्नित्यमादरात् ।१०७ भूतप्रेतपिशाचास्तं न वीक्षितुमपि क्षमाः । तद्विलिख्य शिरस्त्राणे साधितं धारयेद्भटः ।१०८ युद्धे रिपून् बहून्हत्वा जयताप्नोति पार्थिवः ।१०६ वज्राङ्किते वहिनपुरद्वये तां पाशांकुशाद्यभ्यामुदरस्थसाध्यम् । मध्येऽथकोणेष्ठवथ वाह्यवृत्ते पुनः पुनस्तां विलिलेत्स मन्तात् ।११० भूर्जे लिखितमेतत्स्यात्सर्ववश्यकरं नृणाम् ।

नवम पटल ] [ २१३ आरोग्यैश्वर्यजननं युद्धेषु विजयप्रदम् ।१११ लिखेत्सरोजे स्वरकेसराढ्ये वर्गाष्टपत्रे वसुधापुरस्थे । पाशाङ्कुशाभ्यां गुणशः प्रबद्धां मायांलिखेन्मध्यगतांसाध्याम्११२ सर्वोत्तममिदं यन्त्रं धारितं कुरुते नृणाम् । आरोग्यैश्वर्यसौभाग्यविजयादीननारतम् ।११३ अभ्यर्चन करने के पश्चात् बारह हजार की संख्या में मन्त्र का जप करना चाहिये । प्रिय साध्य का अभिषेक करके यन्त्र को शिखा में बाँध लेवे ।१०६। इसके प्रभाव से मनुष्य कान्ति, पुष्टि, धरा, आरोग्य और शान्ति लाभ करता है । नित्य ही ही बहुत अधिक आदर से पूजन करना चाहिए ।१०७। भूत-प्रेत और पिशाच उसका अवलोकन करने में भी समर्थ नहीं हुआ करते हैं । फिर इसको साधित करके अपने शिरस्त्राण में लिखकर धारण करे ।१०८। राजा युद्ध में शत्रुओं का हनन करके विजय का लाभ किया करता है ।१०६। वज्र से अङ्कित वह्निपुर द्वय में पाश और अंकुश से संयुत उसको मध्य में और वाह्य वृत्त में कोण में उदरस्थ साध्य को वारम्बार चारों ओर लिखना चाहिये ।११०। भोजपत्र पर लिखा हुआ यह यन्त्र मनुष्योंको अपने वश्य करने वाला हुआ करता है । यह आरोग्य और ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाला है और युद्धों में विजय प्रदान करने वाला हुआ करता है ।१११। स्वर केसर से आढ्य वसुधापुर में स्थित वर्गाष्ट पत्र में सरोज में पाश और अंकुश से युक्त गुणों से प्रबुद्ध साध्य के सहित मध्यगता माया को लिखें ।११२। यह सबसे उत्तम यन्त्र है । यह धारण किया हुआ मनुष्यों के आरोग्य, ऐश्वर्य, सौभाग्य और विजय आदि को निरन्तर क्रिया करता है ।११३

२१४ ] [ श्री शारदा तिलक दशम पटल दुर्गा प्रकरण ततो दुर्गामनुं वक्ष्ये दृष्टादृष्टफलप्रदम् । मायाऽद्रिः कर्णविन्दाढ्यो भूयोऽसौ सर्गवान्भवेत् । १ पञ्चान्तकः प्रतिष्ठावान्मारुतो भौतिकहासनः । तारादिर्हृदयान्तोऽयं मन्त्री वस्वक्षरात्मकः । २ ऋषिश्च नारदश्छन्दो गायत्रं देवनामनोः । दुर्गा समीरिते। सदभिर्दु रितापन्निवारिणी । ३ नमस्कारयुक्तेन मूलमन्त्रेण साधकः । ह्रामाद्यैः सह कुर्वीत षडङ्गानि यथाविधि । ४ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः । शंखं चक्रधनुः शरांश्च दधतीं नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता । आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु वो रत्नोल्लसत्कुण्डला । ५ वसुलक्षं जपेन्मन्त्रं तिलैर्मधुरलोलितैः । पयोऽन्धसा वा जुहुयात्तत्सहस्रं जितेन्द्रियः । ६ पीठमित्थं यजेत्सम्यक् नवशक्तिसमन्वितम् । प्रभा मया जया सूक्ष्मा विशुद्धा नन्दिनी पुनः । ७ सुप्रभा विजया सर्वसिद्धिदा नव शक्तयः । अर्चिर्ह्रस्वत्रयक्लीवरहितैः पूजयेदिमाः । ८ इसके अनन्तर दुर्गा के मन्त्र के विषय में बतलाऊँगा जो दृष्ट और अदृष्ट के फल को प्रदान करने वाला होता है। अब मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—माया—शक्ति का बीज—हकार, ठकार, विन्दु से आढ्य हूँ, फिर विसर्गों से युक्त हुकार, पञ्चान्तक मकार आकार से युक्त गा, यकार, भौतिकहासन अर्थात् थे, मारुत से यकार जिसके आदि में प्रणव है और अन्त में हृदय है यह मन्त्र आठ अक्षरों वाला होता है

दशम पटल ] [ २१५ ।१-२। इस मन्त्र का ऋषि नारद है—गायत्री छन्द है और इस मन्त्र का देवता दुर्गा कही गई है, जिनको सत्पुरुषों ने बतलाया है। यह दुरितों और आपदाओं के निवारण करने वाला है। ३। साधक को चाहिये कि नमस्कार से रहित मूल मन्त्र से ह्रामाद्यों के सहित विधि- पूर्वक षट् अङ्गों को करे।४। ध्यान—सिंह के वहन पर विराजमान चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाली—मरकतप्रस्थ अपनी चार भुजाओं के द्वारा शङ्ख-चक्र-धनुध और शरों को धारण करने वालों है— तीन नेत्रों से शोभित—मोतियों के हार, अङ्गद, कङ्कण में से युक्त तथा झनकार करने वाली काञ्ची और नूपुरों वाली है—रण में उल्ल- सित कुण्डलों से विभूषित दुर्गादेवी आपके दुर्गों अर्थात् कष्टों का हरण करने वाली होवे ।५। इस मन्त्र का आठ लाख जप करे। इन्द्रियों को जीत लेने वाला साधक मधुर से लोलित तिलों के द्वारा अथवा पयोन्ध से लोलित किये हुओं से एक सहस्र आहुतियाँ देवे ।६। इस रीति से नौ शक्तियों से समन्वित पीठ को भली-भाँति पूजन करें—नौ शक्तियों के नामों को बतलाया जाता है—प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नन्दिनी, सुप्रभा, विजया और सर्व सिद्धिदा—ये नौ शक्तियाँ हैं। इनका ह्रस्वत्रयकनीवों से रहित अचों से यजन करना चाहिये ।७-८। प्रणवान्तरे वज्रनखदंष्ट्रायुधाय च । महासिंहाय वर्मास्त्रं नतिः सिंहमनुर्मतः ।६ दद्यादासनमेतेन मूत्ति मूलेन कल्पयेत् । तस्यां संपूजयेन्मूर्ती देवीमावाह्य मन्त्रवित् ।१० अङ्गावृत्तिं पुराभ्यर्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् । जया च विजया कीर्ति प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः ।११ श्रद्धा मेधा श्रुतिः प्रोक्ता स्वनामाद्यक्षरादिकाः । पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टायुधानि यथाक्रमात् ।१२ चक्रशङ्खगदाखड्गपशांकुशशरान्धनुः । लोकेश्वरांस्ततो वाह्ये तेषामस्त्राण्यनन्तरम् ।१३

२१६ ] [ श्री शारदा तिलक इत्थं जपादिभिर्मन्त्री मन्त्रे सिद्धे विधानवित्। कुर्यात्प्रयोगानेतेन मनुना स्वमनीषितान् । ९४ अब सिंह मन्त्र बतलाया जाता है, प्रणव के अनन्तर वज्रनख दंष्ट्रायुधाय—वह स्वरूप है, सिंहाय—यह स्वरूप है इसके अनन्तर हूँ फट् ओर अन्तमें नमः यह पद होता है । यही सिंह मन्त्र माना गया है । ।६। इस मन्त्र द्वारा आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र के द्वारा मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । मन्त्र के ज्ञाता को चाहिए कि उसमें मूत्ति में देवी का आवाहन करके भली-भाँति उनका अर्चन करे । ९०। पहिले अङ्गावृत्ति का यजन करके फिर पत्रों में शक्तियोंका यजन करें । जया, विजया, कीर्त्ति, प्रीति, प्रभा, श्रद्धा, मेधा, श्रुति ये बताई गयी हैं । इनसे अपने नाम के आदि अक्षर का उच्चारण करे । पत्रों के अग्र भागों में क्रम के अनुसार आठ आयुधों का अर्चन करना चाहिए । ९१- ९२। ने आठ आयुध ये हैं—शंख, चक्र, गदा, खङ्ग, पाश, अंकुश, शर और धनुष । इसके उपरान्त बाहिर लोकेश्वरों का तथा उनके अनन्तर उनके अस्त्रों का पूजन करे । इस रीति से मन्त्रधारी जो विधान का ज्ञाता होवे जप आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर इस मन्त्र के द्वारा अपने मनीषित प्रयोगों को करे । ९३-९४। प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नव शोभनान् । रत्नहेमादिसंयुक्तान्पदेषु नवसु स्थितान् । ९५ मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः । पूज्य गन्धपुष्पाद्यै रभिषिञ्चेन्नराधिपम् । १६ राजा विजयते शत्रून्साधकोविजयश्रियम् । रोगी दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः । १७ वन्ध्याभिषिक्ता विधिना लभते तनयं वरम् । मन्त्रेणानेन सजाप्तमाज्यं क्षुद्रज्वरापहम् । गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा । ९८