भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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नवम पटल ] [ २११ दिशाओं में अर्गलाओं को लिखकर उदरगं पाश आदि तीन अक्षरों को कोष्ठों में और दूसरों में अङ्ग मन्त्रोंको लिखें। आठ अक्षरोंके ये दो मंत्र हैं। अच पूर्वा पर षट्क से युक्त लयवरो को व्योमासनों को अर्गलों में लिखकर इन्द्र जलाधिप (वरुण) आदि के गुण से उससे परे दो पंक्तियों को लिखे ।८२। कोष्ठों में अष्ट युगार्ण को युग्म स्वरों के अन्तर्गत आत्म सहित मायाको केसर दिग्दलों में लिखना चाहिए। तीन पंक्तियों के द्वारा आवीत उसके बाहिर पद्म में स्थित पङ्कज मुख घट से आवेष्टित करे। ।८६। यह घटार्गल यन्त्र होता। जो मन्त्रधारियों का प्राभृत माना गया है। पद्म श्री शक्ति—कन्दर्प—काम शक्ति—इन्दिरा—अंकुश हैं। प्रथम आठ अक्षरों वाला मन्त्र होता है। इसके उपरान्त कामिनी— रञ्जिनि और अन्त में स्वाहा होता है—यह सत्पुरुषों के द्वारा दूसरा आठ अक्षरों वाला मन्त्र कीर्त्तित किया गया है ।८७।८८ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि सवर्म फट्। द्विठान्तः षोडशार्णोऽयं मन्त्रः सद्भिरुदीरितः ।९९ लिखित्वा भूर्जपत्रादौ यन्त्रमेतद्यथाविधि। धारयेद्वामबाहौ वा कण्ठे वा निजमूर्द्धनि । १०० वशयेत्सकलान्मर्त्यान् विशेषेण महीपतिम्। नीलपट्टे विलिख्यैतद्गुटिकीकृत्य तत्पुनः । १०१ साध्यप्रतिकृतौ सिकथनिर्मितायां हृदि न्यसेत्। पात्रे त्रिमधुरापूर्णे-निःक्षिप्यैनां विधानतः ।१०२ सम्पूज्य गन्धपुष्पाद्यैर्बलि निःक्षिप्य रात्रिषु। मूलमन्त्रं जपेन्मन्त्री नित्यमष्टसहस्रकम् ।१०३ सप्ताद्वाहाच्छितां नारीमाहरेत्स्मरविह्वलाम्। भूर्जपत्रे विलिख्यैतत् गुटकीकृत्य तत्पुनः । १०४ लाक्षया ताम्ररजतकाञ्चनैर्वेष्टयेत्क्रमात्। तत्कुम्भे न्यस्य सम्पूज्य यथावद्भुवनेश्वरीम् । १०५