भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२१२ ] [ श्री शारदा तिलक 'ह्रीं गौरि रुद्र दयिते योगेश्वरि' वर्म के सहित फट् जिसके अन्त में दो ठकार होवें—यह सोलह वर्णों वाला मन्त्र सत्पुरुषों के द्वारा कहा गया है ।६६। इस मन्त्र को भोजपत्र आदि पर विधि के साथ लिखकर इसको साधक अपनी बांयी बाहु में अथवा कण्ठ में या अपने मस्तक में बाँधे तो वह सब मनुष्यों को वशमें कर लिया करता है और विशेष रूप से नृपति को अपने वशमें कर लेता है । नील पट्ट पर इसको लिखकर फिर गुटिका बनाकर सिक्य के द्वारा निर्माण की हुई साध्यकी प्रतिमा के हृदय में न्यस्त कर देवे । तीन मधुरों से परिपूर्ण पात्र में इसको निधान से निक्षिप्त कर देवे । गन्ध पुष्प आदि के द्वारा भली- भाँति पूजन करके रात्रि के समय में बलि का विक्षेपण करे । मन्त्रधारी को नित्य ही मूल मन्त्रका आठ सहस्र जप करना चाहिये । १००-१०३ एक ही सप्ताह में अपनी मनोवांछित काम वासना से विह्वल नारी का आहरण कर लेता है । भोजपत्र पर इसको लिखकर फिर उसकी गुटिका बनावे ।१०४। लाख से ताम्र, चाँदी, सुवर्ण से क्रम से इसको वेष्टित करे । उसको कुम्भ में न्यस्त करके भुवनेश्वरी देवी का यथा रीति से भली-भाँति अर्चन करना चाहिये ।१०५ संस्पृश्य तज्जपन्मन्त्रं दिवाकरसहस्रकम् । अभिषिच्य प्रियं साध्यं बध्नीयाद्यन्त्रमा शिखम् । १०६ कान्तिं पुष्टिं धरारोग्यशांति लभते नरः । भित्तौ विलिख्य तद्यन्त्रं पूजतेन्नित्यमादरात् ।१०७ भूतप्रेतपिशाचास्तं न वीक्षितुमपि क्षमाः । तद्विलिख्य शिरस्त्राणे साधितं धारयेद्भटः ।१०८ युद्धे रिपून् बहून्हत्वा जयताप्नोति पार्थिवः ।१०६ वज्राङ्किते वहिनपुरद्वये तां पाशांकुशाद्यभ्यामुदरस्थसाध्यम् । मध्येऽथकोणेष्ठवथ वाह्यवृत्ते पुनः पुनस्तां विलिलेत्स मन्तात् ।११० भूर्जे लिखितमेतत्स्यात्सर्ववश्यकरं नृणाम् ।