शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम पटल ] [ २१३ आरोग्यैश्वर्यजननं युद्धेषु विजयप्रदम् ।१११ लिखेत्सरोजे स्वरकेसराढ्ये वर्गाष्टपत्रे वसुधापुरस्थे । पाशाङ्कुशाभ्यां गुणशः प्रबद्धां मायांलिखेन्मध्यगतांसाध्याम्११२ सर्वोत्तममिदं यन्त्रं धारितं कुरुते नृणाम् । आरोग्यैश्वर्यसौभाग्यविजयादीननारतम् ।११३ अभ्यर्चन करने के पश्चात् बारह हजार की संख्या में मन्त्र का जप करना चाहिये । प्रिय साध्य का अभिषेक करके यन्त्र को शिखा में बाँध लेवे ।१०६। इसके प्रभाव से मनुष्य कान्ति, पुष्टि, धरा, आरोग्य और शान्ति लाभ करता है । नित्य ही ही बहुत अधिक आदर से पूजन करना चाहिए ।१०७। भूत-प्रेत और पिशाच उसका अवलोकन करने में भी समर्थ नहीं हुआ करते हैं । फिर इसको साधित करके अपने शिरस्त्राण में लिखकर धारण करे ।१०८। राजा युद्ध में शत्रुओं का हनन करके विजय का लाभ किया करता है ।१०६। वज्र से अङ्कित वह्निपुर द्वय में पाश और अंकुश से संयुत उसको मध्य में और वाह्य वृत्त में कोण में उदरस्थ साध्य को वारम्बार चारों ओर लिखना चाहिये ।११०। भोजपत्र पर लिखा हुआ यह यन्त्र मनुष्योंको अपने वश्य करने वाला हुआ करता है । यह आरोग्य और ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाला है और युद्धों में विजय प्रदान करने वाला हुआ करता है ।१११। स्वर केसर से आढ्य वसुधापुर में स्थित वर्गाष्ट पत्र में सरोज में पाश और अंकुश से युक्त गुणों से प्रबुद्ध साध्य के सहित मध्यगता माया को लिखें ।११२। यह सबसे उत्तम यन्त्र है । यह धारण किया हुआ मनुष्यों के आरोग्य, ऐश्वर्य, सौभाग्य और विजय आदि को निरन्तर क्रिया करता है ।११३