शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम पटल ] [ २०१ शालिपिष्टमयीं कृत्वा पुत्तलीं मधुरान्विताम् ।४७ जप्तां प्रतिष्ठितप्राणां पूजयेद्रविवासरे । वशं नयति राजानं नारी व नरनेव वा ।४८ कण्ठमात्रोदके स्थित्वा वीक्ष्य तोयगतं रविम् । त्रिसस्रं जपेन्मन्वमिष्टां कन्यां लभेन्नरः ।४६ मन्त्रधारी पीपल की श्रेष्ठ समिधाओं को त्रिमधूर से समाप्लुत करके फिर उनसे हवन करे तो शीघ्र ही ब्राह्मणों को अपने वश में कर लेता है। पद्द्मों से होम करके पार्थिवों को वशीभूत कर लिया करता है—पलाश (ढाक) के पुष्पों के द्वारा होम करके उनकी पत्नियों को अपने वश में करता है और कुमुदों का हवन करके मन्त्रियों को वश में कर लेता है। पच्चीस बार जप किये हुए जल से प्रतिदिन स्नान करे और जो अपने आपका अभिषेक करे तो वह सभी प्रकार से सौभाग्य वाला हो जाता है। पच्चीस बार जप करके अभिमन्त्रित जल जो प्रातःकाल में पीता है तो मनुष्य बहुत बड़ी प्रज्ञा का लाभ कर कवियों का भी अग्रणी (अगुआ) हो जाया करता है। कपूर, गुग्गल से संयुत कुंकुम से भली भाँति साधित को लेकर तिलक करे तो बहुत ही उत्तम राजा को वश्य करने वाला होता है। शाली के पिष्ट से परिपूर्ण और मधुर से युक्त पुतली बनाकर उसका जप करके प्राण प्रतिष्ठा करे और रविवार के दिन उसका अर्चन करना चाहिए तो वह पुरुष राजा को अपने वश में कर लेता है और नारी अथवा नर को वश्य कर लिया करता है ।४३।४८। कण्ठ मात्र जल में स्थित होकर जल में सूर्य का दर्शन करे। तीन सहस्र मन्त्र का जप करे तो मनुष्य अपनी अभीष्ट कन्या को प्राप्त कर लिया करता है ।४६। अन्नं तन्मन्त्रितं मन्त्री भुञ्जीत श्रीप्रसिद्धये । लिखितां भस्मनां मायां ससाध्यां फलकादिषु ।५० तत्काले दर्शयेद्यन्त्रं सुखं सूयेत् गर्भिणी ।५१ शक्तयन्तः स्थितसाध्यकमैभवने वह्नेर्वृतं शक्तिभिः-