शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम पटल ] [ २१५ ।१-२। इस मन्त्र का ऋषि नारद है—गायत्री छन्द है और इस मन्त्र का देवता दुर्गा कही गई है, जिनको सत्पुरुषों ने बतलाया है। यह दुरितों और आपदाओं के निवारण करने वाला है। ३। साधक को चाहिये कि नमस्कार से रहित मूल मन्त्र से ह्रामाद्यों के सहित विधि- पूर्वक षट् अङ्गों को करे।४। ध्यान—सिंह के वहन पर विराजमान चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाली—मरकतप्रस्थ अपनी चार भुजाओं के द्वारा शङ्ख-चक्र-धनुध और शरों को धारण करने वालों है— तीन नेत्रों से शोभित—मोतियों के हार, अङ्गद, कङ्कण में से युक्त तथा झनकार करने वाली काञ्ची और नूपुरों वाली है—रण में उल्ल- सित कुण्डलों से विभूषित दुर्गादेवी आपके दुर्गों अर्थात् कष्टों का हरण करने वाली होवे ।५। इस मन्त्र का आठ लाख जप करे। इन्द्रियों को जीत लेने वाला साधक मधुर से लोलित तिलों के द्वारा अथवा पयोन्ध से लोलित किये हुओं से एक सहस्र आहुतियाँ देवे ।६। इस रीति से नौ शक्तियों से समन्वित पीठ को भली-भाँति पूजन करें—नौ शक्तियों के नामों को बतलाया जाता है—प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नन्दिनी, सुप्रभा, विजया और सर्व सिद्धिदा—ये नौ शक्तियाँ हैं। इनका ह्रस्वत्रयकनीवों से रहित अचों से यजन करना चाहिये ।७-८। प्रणवान्तरे वज्रनखदंष्ट्रायुधाय च । महासिंहाय वर्मास्त्रं नतिः सिंहमनुर्मतः ।६ दद्यादासनमेतेन मूत्ति मूलेन कल्पयेत् । तस्यां संपूजयेन्मूर्ती देवीमावाह्य मन्त्रवित् ।१० अङ्गावृत्तिं पुराभ्यर्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् । जया च विजया कीर्ति प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः ।११ श्रद्धा मेधा श्रुतिः प्रोक्ता स्वनामाद्यक्षरादिकाः । पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टायुधानि यथाक्रमात् ।१२ चक्रशङ्खगदाखड्गपशांकुशशरान्धनुः । लोकेश्वरांस्ततो वाह्ये तेषामस्त्राण्यनन्तरम् ।१३