भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

२१६ ] [ श्री शारदा तिलक इत्थं जपादिभिर्मन्त्री मन्त्रे सिद्धे विधानवित्। कुर्यात्प्रयोगानेतेन मनुना स्वमनीषितान् । ९४ अब सिंह मन्त्र बतलाया जाता है, प्रणव के अनन्तर वज्रनख दंष्ट्रायुधाय—वह स्वरूप है, सिंहाय—यह स्वरूप है इसके अनन्तर हूँ फट् ओर अन्तमें नमः यह पद होता है । यही सिंह मन्त्र माना गया है । ।६। इस मन्त्र द्वारा आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र के द्वारा मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । मन्त्र के ज्ञाता को चाहिए कि उसमें मूत्ति में देवी का आवाहन करके भली-भाँति उनका अर्चन करे । ९०। पहिले अङ्गावृत्ति का यजन करके फिर पत्रों में शक्तियोंका यजन करें । जया, विजया, कीर्त्ति, प्रीति, प्रभा, श्रद्धा, मेधा, श्रुति ये बताई गयी हैं । इनसे अपने नाम के आदि अक्षर का उच्चारण करे । पत्रों के अग्र भागों में क्रम के अनुसार आठ आयुधों का अर्चन करना चाहिए । ९१- ९२। ने आठ आयुध ये हैं—शंख, चक्र, गदा, खङ्ग, पाश, अंकुश, शर और धनुष । इसके उपरान्त बाहिर लोकेश्वरों का तथा उनके अनन्तर उनके अस्त्रों का पूजन करे । इस रीति से मन्त्रधारी जो विधान का ज्ञाता होवे जप आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर इस मन्त्र के द्वारा अपने मनीषित प्रयोगों को करे । ९३-९४। प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नव शोभनान् । रत्नहेमादिसंयुक्तान्पदेषु नवसु स्थितान् । ९५ मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः । पूज्य गन्धपुष्पाद्यै रभिषिञ्चेन्नराधिपम् । १६ राजा विजयते शत्रून्साधकोविजयश्रियम् । रोगी दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः । १७ वन्ध्याभिषिक्ता विधिना लभते तनयं वरम् । मन्त्रेणानेन सजाप्तमाज्यं क्षुद्रज्वरापहम् । गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा । ९८