शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम पटल ] [ २१७ मध्ये तारे बीजमन्तस्थसाध्यं पत्रेष्वष्टौ मन्त्रवर्णान्विलिख्य । त्रिष्टुब् वीतं वेष्टितं मातृकार्णैर्यन्त्रं दौर्गं भुपूरस्थं विदध्यात् ।१६ क्षुद्रभूतमहारोगचौरसर्प निवारणम् । विजयश्रीपदं पुंसां गर्भिणीना सुखप्रदम् ।२० भ्रान्तं वियतसनयनं श्वेतो मर्द्दिनि ठद्वयम् । अष्टाक्षरीयमाख्याता विद्या महिषमर्द्दिनी ।२१ इसके अनन्तर विधानके साथ परम शोभन नौ कलशोंकी प्रतिष्ठा, षित करके, जोकि रत्न औके सुवर्ण से संयुक्त होवें—नौ पदों में स्थित करे । जो कलश मध्य में स्थित है उसमें देवी का अर्चन करे और इतर कलशोंमें जया आदि का पूजन करना चाहिए । गन्ध पुष्पादि उपचारों के द्वारा भली-भाँति पूजन करके नराधिप का अभिषेक करे ।१५।१६। इससे राजा अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त किया करता है और साधक विजय श्री को प्राप्त किया करता है । जो रोगी हो वह दीर्घ आयु की प्राप्ति करता और समस्त व्याधियों से रहित हो जाया करता है ।१७। विधि से अभिषेक की हुई वन्ध्या नारी परम श्रेष्ठ सुत को प्राप्त करती है । इस मन्त्र से अभिमन्त्रित आज्य क्षुद्रज्वर के अपहरण करने वाला होता है । विशेष रूप से जप की हुई भस्म आदि लाभ किया करती है ।१८। अब मन्त्र बतलाते हैं-मध्य में, कर्णिका में, तार में ( प्रणव में ) अन्तःसम स छ अर्थात् मध्यास्थ्य साध्य साधक नाम कर्म के सहित दौर्ग बीज को लिखे और आठ पत्रोंमें मन्त्र के वर्णों का लेखन करे तथा त्रिष्टुप् से वीत और मातृका वर्णों से वेष्टित करे इस यन्त्र को भूपुर के मध्य में स्थित करना चाहिए ।१९। यह मन्त्र यन्त्र क्षुद्र भूत, महारोग, चारों ओर सर्पों का निवारण करने वाला होता है । पुरुषों को विजय और श्री के प्रदान करने वाला होता है । तथा गर्भिणियों के सुख का प्रदाता है ।२०। भान्त—मकार, विद्युत्—ढकार, सनयन—इकार के सहित, श्वेत—षकार, मर्द्दिनि—स्वरूप, दोठकार और स्वाहा —यह विद्या अष्टाक्षरों वाली महिष-मर्दिनी कही गयी है ।२१।