भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

२१८ ] [ श्री शारदा तिलक महिषहिंसिके हूँ फट् हृदयं परिकीर्तितम् । महिषशत्रो शार्ङ्गि हूँ फट् शिरोऽङ्गं समुदाहृतम् ।२२ महिषं भीषयद्वन्द्वं हूँफडन्तः शिखामनुः । महिष हनयुग्मान्ते देवि हूँफट् तनुच्छदम् ।२३ महिषान्ते सूदिति हूँफडन्तमस्त्रसमीरितम् । मन्त्रैरेतैर्जातियुक्तैः पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् ।२४ गारुडोपलसन्निभां मणिमौलिकुण्डलमण्डिताम् । नौमिभालविलोचनां महिषोत्तमाङ्गनिषेदुषीम् ।२५ चक्रशंखकृपाणखेटकवाणकार्मुकशूलकान् । तर्ज्जनीमपिविभ्रतीं निजबाहुभिः शशिशेखराम् ।२६ अष्टलक्ष जपेन्मन्त्र तत्सहस्रं तिलैः शुभैः । हुत्वा प्रागीरीते पीठ यजेन्महिषमर्दिनाम् ।२७ संपूज्याङ्गानि पत्रेषु दुर्गाख्यां वरवर्णिनीम् । आर्याह्वां तृतीयां च चतुर्थी कनकप्रभाम् ।२८ पञ्चमीं कृत्तिकासंज्ञा षष्ठीमप्यभयप्रदाम् । कन्यां सुरूपां प्रभजेन्मन्त्रौ दीर्घस्वरैः क्रमात् ।२६ महिष हिंसि के हूँ फट्—वह हृदय कीर्त्तित किया गया है—महिष शत्रो शार्ङ्गि हूँ फट्—शिर अङ्ग कहा गया है ।२२। महिर्ष भीषयद्वन्द्वं हूँ फट्—शिखा मन्त्र है । महिष दो हन के अन्त में देवि हूँ फट्—यह तनुच्छद है ।२३। महिष के अन्त में सूदिनि हूँ फट्—यह अस्त्र कहा गया है । इन मन्त्रों से जातियुक्त हैं पञ्च अङ्गों को प्रकल्पित करना चाहिए ।२४। ध्यान—गारुडोपल के सदृश—मणि मौलि कुण्डलों से मण्डित—भाल में विलोचन वाली—महिष के उत्तम अङ्ग पर विराज- मान—शङ्ग, चक्र, कृपाण खेटक, वाण, कार्मुक और शूल को धारण करने वाली—मस्तक में चन्द्र को धारण करती हुई—तर्जनी को भी अपनी बाहुओंसे विभरण करने वाली को नसस्कार करता हूँ ।२५-२६ इस मन्त्र का आठ लाख जप करे । एक सहस्र शुभ तिलों से हवन करे