शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६८ ] [ श्री शारदा तिलक इन्द्र कोण में शोभित दण्ड-कुण्डिका अक्ष अभय वाली गायत्री का मंत्र- धारी पूजन करे और उसी प्रकार वाले ब्रह्माजी का भी यजन करना चाहिए । राक्षस कोण में शंख—चक्र गदा और पद्म के धारण करने वाली पीतवस्त्र से संयुत सावित्री का अर्चन करे और उसी प्रकार से विष्णु का यजन करे । वायुकोण में परशु—अक्षमाला—अभय और वरदान से युक्त सरस्वती का अर्चन करे और इसी प्रकार से उसी तरह के लक्षणों वाले रुद्र का भी यजन करना चाहिये । अग्निकोण में मणि- करण्डक रत्न—कुम्भ का अर्चन करे । वरों से धारण किये हुए पीत- तुन्दिल धन नाथक को सव्यहस्त से आलिंगन करके वाम हस्त से धनद के अङ्क में समारूढ़ अम्बुजधारिणी महालक्ष्मी का अभ्यर्चन करना चाहिये । वारुण में मदन, बाण, पाश, अंकुश, शरासन को धारण करते हुए जया के समान रक्त रत्न भूषण धारिणी का पूजन करे । २२-२८। पाणिना, रमणाङ्कस्थां रतिं सम्यक् समर्चयेत् । ऐशाने पूजयेत्सम्यक् विघ्नराजं प्रियान्वितम् ।२९ सृणिपाशधरं कान्तावराङ्गस्पृक्करांगुलिम् । माध्वीपूर्णकपालाढ्यं विघ्नराजं दिगम्बरं ।३० पुष्करे विलसद्रत्नस्फुरच्चषकधारिणम् । सिन्दूरसदृशाकारांमुद्दाममदविभ्रमाम् ।३१ धृतरक्तोत्पलामन्यपाणिना तु ध्वजस्पृशम् । आश्लिष्टकान्तामरुणां पुष्टिसंज्ञैर्दिगम्बराम् ।३२ कर्णिकायां, निधी पूज्यौ षट्कोणोभयपार्श्वयोः । अङ्गानि केसरेष्वेताः पश्चात्पत्रेषु पूजयेत् ।३३ अनङ्गाकुसुमा पश्चादनंगकुसुमातुरा । अनंगमदना पश्चादनंगमदनातुरा ।३४ भुवनपाला गगन—वेगा चैग ततः परम् । शशिरेखाथ गगन-रेखा चैवाष्टशक्तयः ।३५ पाणि से रमण की गोद में संस्थिता रति का भली भाँति पूजन