शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम पटल ] [ १८६ करे। ऐशान दिशा में प्रिया से समन्वित विघ्नराज का अर्चन करना चाहिए। २६। सृणि और पाश को धारण करने वाले कान्ता के श्रेष्ठ अङ्ग का स्पर्श करती हुई कर की अंगुलियों से संयुत—माध्वी से परि- पूर्ण कपाल से समन्वित दिगम्बर अर्थात् वस्त्र रहित नग्न विघ्नराज हैं । ३०। विघ्नराज पुष्कर में कान्तिमान् रत्नों से स्फुरण करते हुए चषक को धारण करने वाले हैं। ऐसे ही स्वरूप वाले विघ्नराज का अर्चन करना चाहिए। सिन्दूर के सदृश आकार वाली—उद्दाम मद के विभ्रमों से संयुत रक्तोत्पल को धारण की हुई और अन्य कर से ध्वज का स्पर्श करने वाली कान्त का अश्लेष की हुई अरुण और दिगम्बरा पुष्टिका यजन करे । ३१-३२। कर्णिका में षट्कोण के दोनों पाश्र्वों में निधियों का पूजन करना चाहिए। केसरो में अङ्गों का यजन करे। इसके पीछे पत्रों में इनका अर्चन करना चाहिए। ३३। ये आठ शक्तियाँ हैं—अनङ्ग कुसुमा—पीछे अनङ्ग कुसुमातुरा, अनङ्ग मदना, अनङ्ग मदनातुरा, भुवनपाला, गगनवेगा, शशिरंखा, गगनरेखा—इन आठों का अभ्यर्चन करे । ३४-३५। पाशाङ्कुशवराभीतिधारिण्योऽरुणविग्रहाः । ततः षोडशपत्रेषु कराली विकराल्युसा । ३६ सरस्वती श्रीदुर्गाषा लक्ष्मीश्रुतयौ स्मृतिधृतिः । श्रद्धा मेधा मतिःकान्तिरार्याः षोडश शक्तयः । ३७ खड्गखेटकधारिण्यः श्यामा पूज्यश्च मातरः । पद्माद्वहिसमभ्यर्च्यः शक्तयः परिचारिकाः । ३८ प्रथमाऽनंगरूंपा स्यादादनंगमदना ततः । मदनातुरा भुवन-वेगा भुवनपालिका । ३६ स्यात्सर्वशिशिरानंगवेदनाऽनंगमेखला । चषकं तालवृन्तंच ताम्बूलं छत्रमुज्ज्वलम् । ४० चामरेचांऽशुकं पुष्प बिभ्राणा कर पङ्कजैः । सर्वाभरणसंदीप्ताल्लोकपालांन्बहिय॑जेत् । ४१