भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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दशम पटल ६ २२७ ऐसा ध्यान करके चार लाख मन्त्र का जप करे । मन्त्रवादी उसका दशांश शाली, घृत और तिलों से ही हवि से हवन करे ।७२। पूर्व से कहे हुये पीठ पर अंग आदि के साथ देवी का यजन करे । पूर्व की ही भाँति अंग पूजा करे और दलों में निम्न वर्णित इनका पूजन करना चाहिये-आर्या, दुर्गा, भद्रा, भद्रकाली, अम्बिका, क्षेमा, वेदगर्भा, क्षेमं- करी—ये आठ शक्तियाँ हैं ।७३-७४। पत्रों के मध्य में शंख, चक्र, असि खेटक, बाण, कोदण्ड, शूल और कपालाम्त अस्त्रों का पूजन करे ।७५। दलों के अग्रभागोंमें ब्रह्माणी आदि का यजन करके इसके पश्चात् लोक- पालों का पूजन करना चाहिये। यह प्रयोगोंमें सिद्ध मन्त्र है। इस रीति से देवी का चिन्तन करे ।७७। ध्यान, कालाग्नि के सदृश, केशों में अर्ध चन्द्र शोभित हैं-भाल में नेत्र के भूषण वाली, भय देने वाले सिंह के ऊपर समारूढ, शंख, चक्र, कृपाण, खेटक, चाप और बाणों को करों में धारण करती हुई-शूल वाली भुजा से संयुत समस्त असुर सैनिकों र्गवजित करने वाली देवी का मैं ध्यान करता हूं ।७७। प्रातः स्नानरतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् । जपेत्तस्याशु सिद्ध्यन्ति धनधान्यादिसम्पदः ।७८ अनेनैव विधानेन ग्रहक्षुद्ररिपूञ्जयेत् । नाभिमात्रोदके स्थित्वा देवीमर्कगतां स्मरन् ।७६ जपेदष्टात्तरशतं लभेत महतीं श्रियम् । अयुतं वटवृक्षोत्थैः सश्रृङ्गैरर्चितेऽनले ।८० होमं समिद्धरैः कुर्यान्नाशयत्यापदां कुलम् । घोराभिचारान्भूतादीन् शमयेद्विधिनाऽमुना ।८१ अपामार्गसद्भवैर्वा तिलैर्वा काननोद्भवैः । सर्षपैर्वा कृतोहोमः क्षुद्रापस्मारनाशनः । ८२ अभीष्टसिद्धयै जुहुयादार्कंर्मन्थी समिद्वरैः । सहस्रमर्कवारादिदिवसास्न्देश संयतः ।८३