शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
दशम पटल ६ २२७ ऐसा ध्यान करके चार लाख मन्त्र का जप करे । मन्त्रवादी उसका दशांश शाली, घृत और तिलों से ही हवि से हवन करे ।७२। पूर्व से कहे हुये पीठ पर अंग आदि के साथ देवी का यजन करे । पूर्व की ही भाँति अंग पूजा करे और दलों में निम्न वर्णित इनका पूजन करना चाहिये-आर्या, दुर्गा, भद्रा, भद्रकाली, अम्बिका, क्षेमा, वेदगर्भा, क्षेमं- करी—ये आठ शक्तियाँ हैं ।७३-७४। पत्रों के मध्य में शंख, चक्र, असि खेटक, बाण, कोदण्ड, शूल और कपालाम्त अस्त्रों का पूजन करे ।७५। दलों के अग्रभागोंमें ब्रह्माणी आदि का यजन करके इसके पश्चात् लोक- पालों का पूजन करना चाहिये। यह प्रयोगोंमें सिद्ध मन्त्र है। इस रीति से देवी का चिन्तन करे ।७७। ध्यान, कालाग्नि के सदृश, केशों में अर्ध चन्द्र शोभित हैं-भाल में नेत्र के भूषण वाली, भय देने वाले सिंह के ऊपर समारूढ, शंख, चक्र, कृपाण, खेटक, चाप और बाणों को करों में धारण करती हुई-शूल वाली भुजा से संयुत समस्त असुर सैनिकों र्गवजित करने वाली देवी का मैं ध्यान करता हूं ।७७। प्रातः स्नानरतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् । जपेत्तस्याशु सिद्ध्यन्ति धनधान्यादिसम्पदः ।७८ अनेनैव विधानेन ग्रहक्षुद्ररिपूञ्जयेत् । नाभिमात्रोदके स्थित्वा देवीमर्कगतां स्मरन् ।७६ जपेदष्टात्तरशतं लभेत महतीं श्रियम् । अयुतं वटवृक्षोत्थैः सश्रृङ्गैरर्चितेऽनले ।८० होमं समिद्धरैः कुर्यान्नाशयत्यापदां कुलम् । घोराभिचारान्भूतादीन् शमयेद्विधिनाऽमुना ।८१ अपामार्गसद्भवैर्वा तिलैर्वा काननोद्भवैः । सर्षपैर्वा कृतोहोमः क्षुद्रापस्मारनाशनः । ८२ अभीष्टसिद्धयै जुहुयादार्कंर्मन्थी समिद्वरैः । सहस्रमर्कवारादिदिवसास्न्देश संयतः ।८३
२२८ ] [ श्रीशारदा तिलक सारान् शुद्धान्समादाय शकलान्मन्तुनाऽमुना । जुहुयादेधिने वह्नौ सप्तरात्रमतन्द्रितः ।८४ प्रातःकाल में स्नान में रत होकर नित्य ही एक सहस्र आठ बार मन्त्र जप करे तो शीघ्र ही धन-धान्य आदि सम्पदायें सिद्ध हो जाती हैं ।७८। इसी विधान के द्वारा ग्रह और क्षुद्र रिपुओं पर विजय प्राप्त किया करता है। नाभि मात्र जलमें स्थित होकर सूर्य मण्डलमें विराज- मान देवी का स्मरण करे ।७६। इस प्रकार से एक सौ आठ बार जप करे तो यह जापक महती श्री को प्राप्त करता है । फिर समेधित अग्नि में मृङ्ग सहित वट वृक्ष की समिधाओं से दश हज़ार आहुतियाँ देवे तो आपदाओं के समुदाय का विनाश कर दिया करता है। इस विधि से परम घोर भूतादि अभिचारों का शमन कर दिया करता है । अथवा अपामार्ग की समिधाओं से या वन में समुत्पन्न हुए तिलों से अथवा सघर्षों के द्वारा होम करने वाला क्षुद्र अपस्मार का नाश करने वाला होता है ।८०-८२। मन्त्रधारी पुरुष को अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए आक की श्रेष्ठ समिधाओं से होम करना चाहिए । अर्क वार से आदि लेकर दश दिन तक परम संयत होकर होम करे ।८३। इस मन्त्र से शुद्ध सारों के खण्डो का समादन करे और तन्द्रा रहित होकर सात रात्रि पर्यन्त प्रज्वलित अग्नि में हवन करे ।८४। साधयेदखिलं स्वभीष्टं मन्त्रवित्तमः । कुमुदैर्वशयेद्विप्रान्नृपतीन्पद्महोमतः ।८५ तत्पत्नीरुत्पलै फुल्लैर्वैश्यान्कह्लारहोमतः । शूद्रान् लवणहोमेन जातीपुष्पैः समान (१) बुधः (पुनः) ।८६ व्रीहिभिर्जुहुयान्नित्यं वत्सराद्व्रीहिमान्भवेत् । दूर्वाहोमेन दीर्घायुर्मधुना रत्नवान्भवेत् ।८७ अन्नैरन्नसमृद्धिः स्यादाज्येन लभते धनम् । गोदुग्धेन गवां वृद्धिमाप्नुयान्नात्र संशयः ।८८
दशम पटल ] [ २२६ ज्वरे ग्रहे गरे सर्पे तर्जन्या संस्पृशञ्जपेत् । स्मृत्वा शूलकरां देवीं तत्क्षणादेव तान्हरेत् ।८६ गर्भितं साध्यनामानैः पत्रे मनुमिमं लिखेत् । कुलालमृत्कृतायां तत्प्रतिमायाँ हृदि न्यसेत् ।६० कृतप्राणप्रतिष्ठान्तां पूजितां कुसुमादिभिः । निधायाग्रे जपुम्मन्त्रष्टोत्तरसहस्रकम् ।६१ इसका प्रकार यह होता है कि वह मन्त्र का ज्ञाता पुरुष निरन्तर अपने सम्पूर्ण अभीष्ट को साधित कर लिया करता है। कुमुदों के होम से विप्रों को और पद्मों के हवन से नृपतियों को वश में कर लिया करता है ।८५। बुध पुरुष विकसित उत्पलों के होम से उनकी पत्नियों को और कल्हार के पुष्पों से वैश्यों को तथा लवण के होम स शूद्रों को और जाती पुष्पों के होम से समनरों को वश में कर लेता है ।८६। व्रीहियों के द्वारा नित्य हवन करे तो एक वर्ष में वह व्रीहि वाला हो जाता है। दूर्वा के होम से दीर्घ आयु वाला और मधु के होम से होम करने वाला रत्नों वाला हो जाया करता है ।८७। अन्न के होम से अन्न की समृद्धि होती है तथा आज्य के होम से धन का लाभ किया करता है । गाय के दूध से होम करने से गोओं भी वृद्धि हुआ करती है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।८८। ज्वर में, ग्रह, में विष में और सर्प दंशन में अपनी तर्जनी के द्वारा स्पर्श करते हुए जप करना चाहिए उस समय में शूल कर में धारण करने वाली देवी का स्मरण करके ही स्पर्श करे तो उसी क्षण उन सबका हरण कर दिया करता है ।८६। साध्य के साथ के वर्णों से गर्भित पत्र में इस मन्त्र को लिखे । कुम्हार की मिट्टी से निर्मित की हुई प्रतिमा के हृदय में न्यास करे । उसकी प्राण प्रतिष्ठा करके पुष्प आदि के द्वारा पूजित करे । उसको अपने आगे रखकर के एक सहस्र आठ बार मन्त्र का जप करे ।६०-६१। सध्यास पक्षमात्रेण वशमायाति वाँछितम् । अभ्यर्च्य देवीमनले तीक्ष्णतैलेन मंत्रवित् ।६२
२३० ] [ श्रीशारदा तिलक हुत्वायुतं निधायाग्रे तीक्ष्णांस्त्रिंशच्छरान्पुनः । तेषु संपातयेद्भूयः स्पृष्ट्वा तन्नियुतं जपेत् । ६३ वेधयेत्परसेनायां क्षणान्नष्टा दिशो दश । प्राप्नुयान्नष्टसंज्ञा सा पलायनपरायणा ।६४ जपित्वा सितगुञ्जानां कुडवं कुलिकोदये । विकिरेच्छत्रु सेनायां गूढः तन्नापणादिषु ।६५ ज्वरमारी महारोगैः पीडिता सैन्यनायकैः । परस्परविरोधेन नश्येद्गच्छेन्म्रियेत सा । ६६ सेनासंस्तम्भने मंत्री कारस्करसमुद्भवैः । पुष्पैः सहस्रं जुहुयात्तत्पत्रै स्ता निवर्तयेत् । ६७ अंगारवारे कुलिके जप्त्वा भस्म चितोद्भवम् । विनिः क्षिपेद्रिमूर्ध्नि विद्विष्टो देशतो ब्रजेत् । ६८ सन्ध्या में जप करना चाहिये तो एक पक्ष भर में वाँक्षित वश में आ जाया करता है । मन्त्र का ज्ञाता अग्नि में देवी का अर्चन करके तीक्ष्ण तैल के द्वारा दश हजार आहुतियाँ देकर उसे अपने आगे निधा- पित करे । तीक्ष्ण तीव्र शरों को उनमें सम्मानित करे, फिर उनका स्पर्श करके नियुत जप करे । ६२-६३। उनसे शत्रु की सेना में वेध कर तो क्षण भर में दशों दिशाओं में सेना नष्ट हो जाती है । वह सेना नष्ट संज्ञा को प्राप्त होती है और पलायन करने में तत्पर हो जाया करती कुलिकोदय के समय में चार प्रस्थ सफेद गुंजाओं को जप करके शत्रु की सेना में विकीर्ण कर देवे और आप आपण आदि में गूढ होकर रहे ।६५। ज्वर भारी महारोगों से पीड़ित सेना नायक आपस में ही विरोध के द्वारा नष्ट हो जाते हैं गमन कर जाते हैं और मर ज ते हैं। ६६। सेना के संस्तम्भन करने से मन्त्रधारी कारस्कर से समुत्पन्न पुष्पों से एक सहस्र आहुतियां देवे और उनके पत्रे से होम करे तो सेना को निर्वात्तित कर दिया करता है। ६७। अंगार वार में कुलिक वेला में जप करके
· दशम पटल ] [ २३१ चिता की अद्भुत भस्म को शत्रु के मस्तक में निक्षिप्त कर देवे तो विद्विष्ट देश से गमन कर जाया करता है ।६८। मरुन्निपातितैः पत्रैः कारस्करसमुद्भवैः । तस्य पादरजोयुक्तैर्होमादुच्चाटयेदरीन् ।६६ कारस्करमयीं कृत्वा प्रतिमां च सुशोभनाम् । जप्तां प्रतिष्ठितप्राणां छेदयेदंगशः पुनः ।१०० काकोलूकवसायुक्तष्टोत्तरसहस्रकम् कृष्णपक्षचतुर्दश्यां श्मशाने हव्यवाहने ।१०१ जुहुयान्म्रियतेऽरातिरेवमेव दिनत्रयात् । उन्मत्तसमिधां होमान्नूताः स्युः शत्रवः क्षणात् ।१०२ उलूककाकयोः पत्रैः स्ववसारक्तसंयतैः । जुहुयान्निशि कांतारे शत्रुः कालातिथिर्भवेत् ।१०३ शत्रोः प्रतिकृति मंत्री प्रतिष्ठितसमीरणाम् । शोषणेन विलिप्तांगीमत्युष्णां निक्षिपेज्जले ।१०४ ज्वराक्रांतो भवेच्छीघ्रन्दग्धसेकाच्छम नयेत् । तर्जनीं त्रिशिख दोर्भ्याधारयन्तीं भयङ्कराम् ।१०५ रक्तां ध्यात्वा रवेर्बिम्बे प्रजपेद्यु तं मनुम् । मारये दचिरादेव रिपुन्बन्धुसमन्वितान् ।१०६ खड्गखेटकसन्नद्धां संक्रुद्धां भानुमण्डले । ध्यात्वा मंत्र जपेन्मंत्रो नाशये द चिरादरीन् ।१०७ वायु के द्वारा गिराये हुये कारस्कर से समुत्पन्न पत्रों से जो उसके चरणों की रज से युक्त होंवे, इससे होम करने से शत्रुओं का उच्चाटन करे ।६६। कारस्कर से परिपूर्ण सुशोभन प्रतिमा का निर्माण करके प्राण प्रतिष्ठा करके अभिमन्त्रित करे । फिर अंकुश से छेदन करे और काक तथा उल्लू की वसा से युक्त करके एक सहस्र आठ वार कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में अग्नि में श्मशान में हवन करे इससे तीन दिन में ही शत्रु की मृत्यु हो जाती है । उन्मत्त की समिधाओं के होम से एक ही क्षणमें
२३२ } [ श्रीशारदा तिलक शत्रुओं की मृत्यु हो जाती है । १००-१०२। उल्लू और कौओं के पंखों से जो अपनी उनकी ही बसा और रक्त से संयुत होवे वन में रात्रि में होम करे तो शत्रु काल का अतिथि हो जाता है । १०३। मंत्रधारी शत्रु की प्रतिकृत करके उसकी प्राण प्रतिष्ठा करे फिर उसे शोषण से विलिप्त अङ्गों वाली करे । फिर अत्यन्त उष्ण जल में निक्षिप्त कर देवे ।१०४। इसका यह प्रभाव है कि वह शीघ्र ही ज्वराक्रान्त हो जाता है । दुग्ध के सेक से समन करे । दोनों बाहुओं से तर्जनी और त्रि- शिख का वहन करने वाली-भयंकर रक्ता का सूर्य के बिम्ब में ध्यान करे और दश हजार मन्त्र का जप करे । इसका यह प्रभाव है कि थोड़े ही समय में बन्धुओं से समन्वित शत्रुओंका मरण कर देता है ।१०५-१०६। खङ्ग और खेटक से सन्नट-बाहु और बहुत अधिक क्रुद्ध देवी का सूर्य मण्डल में ध्यान करके मन्त्रधारी जप करे तो थोड़े ही समय में शत्रुओं का विनाश कर दिया करता है ।१०७। चापबाणधरां भीमां सिंहस्थां ज्वलनोपमाम् । सृजन्तीं बाणनिवहान्धावन्ती ताहशं रिपुम् ।१०८ ध्यात्वा जपेन्मनुमिममयुतं तोयमध्यगः । रिपुं च परसेनां च द्रुतमुच्चाटयेद्ध्रुवम् ।१०६ आनित्यकृमसमिद्धोमान्मुच्यते रोगशोकतः । पुष्पैस्तदीयैर्वशयेन्मधुराक्तैर्मतङ्गजन् । ११० रक्षायै पञ्चगव्येन लिम्पेज्जप्तेन दन्तिनः । गव्याज्यतिलसिद्धार्थैरानित्यकसमिद्धरैः । १११ दुग्धान्नापञ्चगव्याभ्यां तण्डुलेन घृतेन च । एतैः पृथक् पृथक् द्रव्यैरष्टोत्तरसहस्रकम् । ११२
दशम पटल ] [ २३३ चाप-वण को धारण करने वाली—भीम—सिंह पर समारूढ़— अग्नि के तुल्य जाज्वल्यमान-बाणों के समुदाय का सृजन करती हुई और उसी भाँति के शत्रु की ओर धावन करती हुई देवी का ध्यान करके जल के मध्य में स्थित होकर इस मन्त्र का दश हजार जप करना चाहिए। इससे जापक व्यक्ति शत्रु को और पराई सेना को शीघ्र निश्चित रूप से उच्चाटन कर देता है ।१०८-१०६। आग्नित्यक की समिधाओं के होम से रोग और शोक से मुक्त हो जाता है। मधुर से अक्त उसके पुष्पों से होम करने पर मतंगजों को वश में कर लेता है। ।११०। रक्षा के लिये उप किये हुये पञ्चगव्य से रक्षा के लिये हाथियों का लिम्पन करे। गायका घृत तिल-सिद्धार्थ-आग्नित्यक की श्रेष्ठ समि- धाओं से दुग्धान्न, पंचगव्यों से—तण्डुल से और घृत से—इन द्रव्यों से अलग-अलग एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिए ।१११-११२। जु याद्दिनशोविप्रान्भोजयेन्मधुरादिभिः । गुरवे दक्षिणां दद्याद्वस्त्राभरणसंयुताम् ।११३ मातङ्गाश्च तुरङ्गाश्च वर्द्धन्ते विधिनाऽमुना । सर्वव्याधिविनिर्मुक्ताः क्षुद्रपीडाविवर्जिताः ।११४ कारयेद्वग्नवृक्षेण शिल्पिनाऽऽयुधपञ्चकम् । शंखखड्गगदाङ्गाधि शार्ङ्गं कौमोदकीं क्रमात् ।११५ पंचगव्येषु निःक्षिप्य तानि स्पृष्ट्वा मनुं जपेत् । सम्यक् पंचसहस्राणि तेषु संपातयेत्पुनः ।११६ तावदब्जेन जुहुयान्न्यस्वैः स्वैः पूजयेत्क्रमात् । उद्धृत्य पञ्चगव्येभ्यः पूर्ववत्प्रजपेन्मनुम् ।११७ अवटान्पञ्च निखनेद्दिक्षु मध्यादिषु क्रमात् । अवटेष्वेषु पूर्णेषु पञ्चगव्येन साधकः ।११८ आयुधानि प्रजप्तानि पञ्च घोषपुरःसरम् । विन्यसेत्तेषु मध्यादिपूजां कुर्याद्यथापुरा ११६ और विप्रों को मधुर आदि के द्वारा भोजन करावे। अपने श्रो
गुरुदेव के लिये वस्त्रों और आभरणों से समन्वित दक्षिणा देवे ॥११३॥ इस मन्त्र के द्वारा हाथी और घोड़े बढ़ जाते हैं। वे सब व्याधियों से रहित होते हैं और क्षुद्र पीड़ा से वर्जित हुआ करते हैं ॥११४। ब्रह्म वृक्ष से किसी शिल्पी के द्वारा पाँच आयुधों का निर्माण करावे । क्रम से शंख, खंग, रथांग (चक्र), शांगं और कोमोदकी—ये पाँच आयुध हैं ॥११५॥ पंचगव्य में निक्षेप करके उनका स्पर्श करके मन्त्र का जप करना चाहिये । भली-भाँति पांच सहस्र जप करे और फिर उनमें सम्पातन करे ।११६। तब तक घृत से होम करे और क्रम से अपने २ मन्त्रों के द्वारा पूजन करे । पंचागव्य से निकालकर पूर्व की ही तरह मन्त्र का जप करना चाहिये ।११७। मध्यादि दिशाओं में क्रम से पाँच अवटों को खनन करे । साधक के द्वारा ये सब अवट पंचागव्य से परिपूर्ण होने पर ध्वनि के साथ पाँच आयुधों को मन्त्र के अभिमन्त्रित करें और उनको उन अवटों में डाल देवे अर्थात् विन्यस्त करे । और पहिले के समान मध्यहृत की पूजा करे ।११८-११६। बालुकाभिः समापूर्य मृद्भिः कुर्यात्समस्थलम् । बलिं च विकिरेत्तत्र तेषां मंत्रैर्यथाक्रमम् ॥१२० दिक् पतिभ्या बलि दत्वा ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । दीनान्धकृपणादींश्च तोषयेद्भोजनादिभिः ।१२१ गुरुवे दक्षिणां दद्यादात्मवित्तानुसारतः । यत्रैवं विहिता रक्षा देशे वा नगरे पुरे ॥१२२ ग्रामे गेहेऽथवा तत्र वर्द्धन्ते सम्पदः सदा । अश्मपातादयो दोषा भूतप्रेतादिसंयुताः ।१२३ अभिचारकृताः कृत्यारिपुचौराद्युपद्रवाः । नेक्षन्ते तां दिशं भीतास्तर्जिता देवताज्ञया ।१२४ बालुका प्रभृति से समापूरित करके सिद्धि से उनको समस्थल कर देवे । उनके मन्त्रों के द्वारा क्रमानुसार वहाँ पर वलि का विकिरण करना चाहिये । दिक्पालों को बलि देकर फिर ब्राह्मणों को भोजन
दशम पटल ] [ २३५ करावे। और भोजन आदि के द्वारा दीन अन्ध और कृपण आदि का तोष करना चाहिये ।१२०-१२१। अपने वित्त शक्ति अनुसार गुरुदेव के लिये दक्षिणा देवे। जहां पर इस प्रकार से रक्षा विहित होवे - देश में नगर में, पुर में, ग्राम में अथवा गृह में रक्षा की जावे वहां पर सदा ही सम्पदायें वृद्धि को प्राप्त हुआ करती है। अश्मपात आदि दोष--भूत- प्रेत से संयुत--अभिचार से किये हुये तथा कृत्या, रिपु और चोरों आदि के उपद्रव ये सब देवता की आज्ञा से तर्जित हुये उस दिशा की ओर देखते नही हैं ।१२२-१२४। पद्म भानुदलान्वितं प्रंविलिखेत्तत्कर्णिकायां पुनः स्तारं शक्तिबीजसाध्यसहितं तत्केसरेषु क्रमात् । मर्द्दिन्या मनुसंभवान् युगलशोवर्णान्पुनः पत्रगा । न्मंत्रार्णा गुणशो विभाग विलेखेदन्त्ये दले ।१२५ मातृकावर्णसंवीत भूपुरद्वयमध्यगम् । यंत्र वि ध्यनिवासिन्याः प्रोक्तं सर्वं समृद्धिदम् ।१२६ रक्षाकरं विवेषेण क्षुद्रभूतादिनाशकम् । राज्यदं भ्रष्टराज्यानां वश्यदं वस्यमिच्छताम् । १२७ सुतार्थिनां सुतद रोगिणां रोगशान्तिदम् । बहुनां किमिहोक्तेन यंतं तत्कामदीमणिः ।१२८ बारह दलों से समन्वित एक पद्म लिखकर उसकी कर्णिका में माया बीज में गन्तुक सनिसर्गं दोगं बीज दल रखकर उसमें साध्य के सहित प्रणव लिखे। महिषमर्दिनी के उसके केसरों में युगल शवर्णों को फिर लिखे। इस तरह से मूल मन्त्र के वर्णों की तीन आवृत्ति करे। अन्तिम एक अक्षर को अन्तिम दल में लिखे मातृका वर्णों से भूपुर मध्य में रहने वाले से संवीत करे। तह विन्ध्य निवासिनी का मन्त्र होता है जो सब समृद्धियों का प्रदाता है ।१२५-१२६। यह विशेष रूप से रक्षा के करने वाला है और क्षुद्र भूतादि का विनाशक होता है। यह भ्रष्ट राज्य
२३६ ] [ श्रीशारदा तिलक वालों को राज्य के देने वाला है और जो वश्य के इच्छुक हैं उनको वश्य करने वाला है ।१२७। सुत के चाहने वालों सुतप्रदाता होता है और रोगियों के रोग की शान्ति का देने वाला है। इसके विषय में बहुत कथन करने से लाभ है यही कहा जाता है कि यह मन्त्र कामना के देने वाली मणि ही है ।१२८।
एकादश पटल ॥ गणपति प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये गणपतेर्मन्त्रान्सर्वार्थसिद्धिदान् । याल्लँब्ध्वा मानवा नित्यं साधयन्ति मनोरथान् ।१ पंचान्तकः शशिधरं बीजं गणेपतेर्विदुः । गणकः स्यान्मुनिश्चन्दोनिचि॒त् विघ्नोऽस्य देवता । षड् दीर्घभाजा बीजेन कुर्यादङ्गाक्रियां मनोः ।२ सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तवद्भिर्द धानम् । दन्तं पाशाङ् कुशेट्टान्यरुकरविलसद्बीजपूराभिरामम् ।३ बालेन्दुद्योतिमौलिं करिपति-दनं दानपूरार्द्र गण्डं । भोगीन्दावद्धभूषं भजत गणपति रक्तावस्त्राङ्गरागम् ॥४ वेदलक्षं जपेन्मत्रं दश श जुहुयात्ततः । मोदकैः पृथुकैर्लाजैः जक्तुभिश्चेक्ष पर्वभिः ।५ नारिकेरैस्तिलैः शुद्धैः सुपक्कैः कदलीफलैः । अष्टद्रव्याणि विघ्नस्व कथित्रानि मनीषिभिः ।६ तीव्रादिशक्तिभिर्युक्ते पीठे विघ्नेश्वर यजेत् । { तीव्राख्या ज्वलिनी नन्दा भोगदा कामरूपिणी ।७ } इसके अनन्तर सब अर्थों की सिद्धियोंके देने वाले गणपति के मन्त्रों
एकादश पटल ] [ २३७ को बतलाया जायगा जिनको प्राप्त करके मानव नित्य मनोरथों का साधन किया करते हैं ।१। पंचात्मक, गकार, जो शशिवर अर्थात्-विन्दु युक्त हो वही गणपति का बीज होता है, उसका मुनि गणक है-छन्द निविद् है और इसका विघ्न देवता होता है। यह दीर्घ भाक् बीज से मन्त्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए। अब ध्यान बतलाते हैं-गणपति सिन्दूर की आभा से युक्त है-तीन नेत्रों वाले हैं-इनका उदर बहुत बड़ा है —यह हस्त कमलों में दन्त, पाश, अंकुश और वरदानको धारण करने वाले हैं-उरुकर में बीजपुर से सुन्दर शोभित है, भालचन्द्र, से मस्तक द्युतिमान् है-गज के समान मुख से संयुत है तथा दान से पूर्ण और आर्द्र गण्ड स्थल वाले हैं-मोतियों से आबद्ध भूषा वाले हैं ऐसे रक्त वस्त्राँग राग वाले गणपति का भजन करो ।२-३-४। इस मन्त्र का चार लाख जप करे और उसका दृशांश मोदक-पृथुक-लाजासक्तु और ईख के पर्वों से तथा नारियल शुद्ध तिल और पके कदली फलों से हवन करे । ये आठ द्रव्य ही मनीषियों ने विघ्नेश्वर के कहे हैं ।५। तीव्र शक्तियों से युक्त पीठ पर विघ्नेश्वर का यजन करना चाहिए। शक्तियों के नामों का परिगणन करके उन्हें बतलाया जाता है-तीव्रज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामरूपिणी ।७। उग्रा तेजोवती सत्या नवमी विघ्ननाशिनी । सर्वादिशक्तिकमलासनाय हृदयावधिः ।८ पीठमन्त्रोऽयनेतेन प्रदद्यादासनं विभोः । मूलेन मूर्तिं संकल्प्य तस्यां विघ्नेश्वरं यजेत् ।६। कर्णिकायां चतुर्दिक्षु प्रथमं पूजयेदिमान् । गणाधिपं गणेशानं तृतीयं गणनायकम् ।१० गणक्रीड पीमगौररक्तनीलरुचः क्रमात् । सर्वांन्नागेन्द्रभूषाढ्यान्भक्ष्यलक्षितपुष्करान् ।११ यथापूर्वं ततोभ्यर्चेत्केसरेष्वङ्गदेवताः । पत्रमध्येपु विधिवद्वक्रतुण्डादिकान्यजेत् ।१२
२३८ ] [ श्रीशारदा तिलक वक्रतुण्डमेकदंष्ट्र महोदरगजाननौ । लम्बोदराख्यं विकटं विघ्नराजमनंतरम् ।१३ धूम्रवर्णं दलाग्रेष ब्राह्मयाद्याः पूजयेत्ततः । लोकपालास्तदस्त्राणि देवमित्थं समर्चयेत् ।१४ उग्रा, तेजावती, संस्था, विघ्न नाशिनी, सर्वाद्दिशक्ति कमलासन के लिये हृदयावधि यह पीठ मन्त्र है । इससे विभु को आसन देना चाहिये । मूलमन्त्र से मूर्ति की भली-भाँति कल्पना करके उसमें भग- वान् विघ्नेश्वर का यजन करे ।८-६। कणिका में चारों दिशाओं में सर्व प्रथम इनका पूजन करना चाहिये । गणाधिक, गणेशान, तुरीय, गण- नायक, गमक्क्रीड़, इनको क्रम से पीत, गो रक्त और नील रुचि वालों का जो सभी नागेन्द्रोंके भूषणों से युक्त तथा भक्ष्य लक्षित पुष्करो वालों का पूर्व की ही भाँति केसरों में अंग देवताओं का अर्चन करे । पत्रों के मध्य में विधि के सहित वक्र तुन्ड आदि का अर्चन करना चाहिये १०-१२। वक्र तुण्ड, एकदृष्ट, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण का यजन करे । दलों के अग्रभागों में फिर ब्राह्मणी आदि का पूजन करना चाहिये । फिर लोक पालों का तथा उनके अस्त्रों का यजन करके इसी रीति से देव का अभ्यर्चम करे । १३-१४। सिद्धमंत्रः प्रकुर्वीत प्रयोगान्कल्पचोदितान् । तर्पयेत्सलिलैः शुद्धैर्दिनशो गणनायकम् ।१५ चतुश्चत्वारिशदाद्यं चतुः शतममन्द्रितः । प्राप्नुयान् मण्डलादर्वागभीष्टमधिकं नरः ।१६ नारिकेलैः कृतो होमश्चतुर्थ्यां श्रीप्रदो भवेत् । शुक्लपक्षप्रतिपदभारभ्यदिनशः सुधीः ।१७ चतुर्थ्यन्तं नारिकेलसक्तुलाजातिलैः क्रमात् । चतुः शतः प्रजुहुयाद्वश्याः स्युः सर्वजन्तवः ।१८ सतिलैस्तेण्डुलैर्होमो लक्ष्मीवश्यप्रदो भवेत् ।
एकादश पटल ] [ २३६ लजैस्त्रिमधुरोपेतैर्होमः कन्या प्रयच्छति ।१६ अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाँछितम्। आज्यःक्तहविषा होमः साधयेदीस्पितं नृणाम् ।२० दध्ना विलोलि (१) तैर्लोणैर्होमो निशि चतुदिनम्। संवादं कुरुते तद्वश्यं वितनुते सदा ।२१ यह सिद्ध मन्त्र है फिर कथ्य प्रेरित प्रयोगों को करे। दिनो दिन शुद्ध जलो के द्वारा गणनायक तर्पण का करना चाहिये । अतन्द्रित रह- कर चारसौ चोवालीस दिन करे तो मण्डल के पूर्व ही मनुष्य अधिक अभीष्ट की प्राप्ति किया करता है ।१५-१६। नारियलो के द्वारा होम किये जाने वाला पुरुष जोकि चतुर्थी में करे तो यह श्री का प्रदाता होता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ करके दिन में सुधी चतुर्थी के अन्त तक नारियल, सक्तु, लाजा ओर तिलों से क्रमश- चारसौ आहुतियां देवे तो सभी जन्तुगण वंश्य हो जाते हैं ।१७-१८। तिलो के सहित तण्डुलों के द्वारा किया होम लक्ष्मी के वश करने वाला होता है तीन मधुरों से अक्त लाजाओ से किया गया होम कन्या को दिया करता है ।१६। इस विधान में कन्या अपने अभीष्ट वर को प्राप्त किया करती है। मनुष्यों के दोरिपत को आज्य से अक्त हवि से किया हुआ होम साधित कर देता है ।२०। हवि से लोलित लोण से रात्रि मे चार दिन तक किया हुआ होम सम्वाद करता है उस भाँति अवश्य ही सदा विस्तार करता है ।२१। श्वेतार्कभवमूले रक्तचंदनदारुणा । इभभज्जेन निम्बेन दान्तदन्तेन वा कृतम् ।२२ विघ्नेश्वर समभ्यर्च्य शीताँशुग्रहणे जपेत् । स्पृष्ट्वा मंत्री निराहारस्त शिखायाँ समुद्वहन् ।२३ युद्धेषु व्यवहारादौ विजयश्रियमाप्नुयात् । मन्त्रेधानेन सजप्ता रोचना मदसयुतां ।२४ तिलकक्रियया सर्वान्वशं नयति मानवान् ।
२४० ] [ श्रीशारदा तिलक अनुलोमविलोमस्थबीजे नाम समालिखेत् ।२५ नवनीते समर्च्च्य स्पृष्ट्वा प्राणमनुञ्जपेत् । अष्टोत्तरशतं भूयो मूलमन्त्रं प्रजप्य तत् ।२६ भक्षयेन्मौनमास्थाय यामिन्यां सप्तवासरम् । स वश्यो जायते शीघ्र साधकन्य न संशयः ।२७ अथवा सफेद आक के मूल में रक्त चन्दन के काष्ठ से भज के द्वारा निम्ब से अथवा हाथी के दाँतसे होम किया जावे ।२२। विघ्नेश्वर का भली-भाँति अर्चन करके चन्द्रमा के ग्रहण में जप करना चाहिये । स्पर्श करके मन्त्र के धारण करने वाला निराहार रहकर अपनी शिखा उद्धहन करते हुये युद्धादि में और व्यवहार आदि में विजय श्री को प्त किया करता है । इस मन्त्र के द्वारा भली-भाँति जप की हुई र्थात् अभिमन्त्रित रोचना को मद से संयुत करे उससे तिलक की क्या करे तो सब मनुष्यों को अपने वश में कर लिया करता है । अनु- लोम और विलोम में स्थित बीज में नाम का लेखन करे और नवनीत में अभ्यर्चन करके प्राण का स्पर्श कर जप करे । फिर एक सौ आठ बार मूल मन्त्र का जाप करें । मौन व्रत में समास्थित होकर सात दिन पर्यन्त रात्रि में भक्षण करे तो साधकका लक्ष्य शीघ्र ही वश्य हो जाया करता है इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।२३-२७। श्रीशक्तिस्मरभूविघ्नबीजानि प्रथमं वदेत् । ङेन्तं गणपति पश्चाद्वारान्ते वरदं पठेत् ।२८ उक्त्वा सर्वजनमन्ते वशमानय ठद्वयम् । अष्टाविंशत्यक्षरोऽयं ताराद्योमनुरीरितः ।२६ गणकः स्वाहृषिश्छन्दो गायत्री निचृदन्विता । महागणपतिः प्रोक्तो देवता देववन्दिता ।३० षड्बीजस्थस्वबीजेन दीर्घभावा प्रकल्पयेत् । षडङ्गानि मनोरस्य यथाविधि विधानवित् ।३१ नवरत्नमय द्वीप' स्मरेदिक्षुपसाम्बुधौ । तद्वीचिधौतपर्यन्तं मन्दमारुतसेवितम् ।३२
एकादश पटल ] { २४१ मन्दारपारिजातादिकल्पवृक्षलताकुलम् । उद्भूतरत्नच्छायाभिररुणीकृतभूतलम् ।३३ उद्यद्दिनकरेन्दुभ्यामुद्भासितदिगन्तरम् । तस्य मध्ये पारिजातं नवरत्नमयं स्मरेत् ।३४ ऋतुभिः सेवितं षड्भिरनिशं प्रीतिवर्द्धनैः । तस्याधस्तान्महापीठे रचिते मातृकाम्बुजे । षट्कोणान्तस्त्रि(णस्थान्त्रि)कोणस्थं महागशपित स्मरेत् । ३५ अब महा गणपति के मन्त्र का उद्धार बतलाते हैं-श्री-शक्ति स्मर - भू और विघ्न के बीजों को सबसे प्रथम कहे-इसके पीछे चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले गणपति को और वरान्त में वरद पढ़े । यह कहकर सर्वजन वशमानय और दो ठकार पढ़े । इसके आदि में प्रणव होता है-ऐसे यह मन्त्र अट्ठाईस अक्षरों वाला कहा गया है ।२८-२६। इसका ऋषि गणक होता है-इसका छन्द निचृदान्वित गायत्री है । इसका देवता देवों के द्वारा वन्दित महा गणपति कहा गया है ।३०। छै बीजों में स्थित दीर्घ भाव अपने बीज से इस मन्त्र के छै अङ्गों का यथा विधि विधान के वेत्ता को कल्पित करना चाहिए ।३१। इसके रस के सागर में नौ रत्नों परिपूर्ण द्वीप का स्मरण करे । उसकी तरङ्गों से धुले हुए पर्यन्त भाग वाले-मन्द वायु से सेवित- मन्दार-पारिजात आदि पाँच कल्प वृक्ष लताओं से समाकुल उद्भूत रत्नों की कान्ति से अरुण किये हुए भूतल वाले को-उड्डीयमान सूर्य और चन्द्र से समुद्भासित दिशाओं के अन्तर से संयुत का ध्यान करके उसके मध्य में नौ प्रकारके रत्नों से परिपूर्ण परिजात का स्मरण करना चाहिए ।३२-३४। वह प्रीति वाले धनों से युक्त छै ऋतुओं के द्वारा निरन्तर सेवित है । उसके नीचे रचित महापीठ पर मातृकाम्बुज में षट्कोण के अन्दर त्रिकोण में स्थित महा गणपति का स्मरण अर्थात् ध्यान करना चाहिए ।३५।
२४४ ] [ श्री शारदा तिलक करना चाहिए ।५४। रति के करों में उत्पल है और कोदन्डे अस्त्र को धारण करने वाला कामदेव है। सौम्य दिशा में प्रियङ्गु वृक्ष के नीचे मही और पौत्री का अर्चन करे ।४५। भूमि अपने हाथों मे शुक्ल व्रीहि के अग्रभाग को धारण करने वाली है और गदा तथा चक्र को धारण करने वाला पति है। देव के आगे लक्ष्मी के सहित गोपनायक का यजन करना चाहिए ।४६। छै कोणोंमें आमोद आदिक श्री से समन्वित पूजित करने चाहिए। अग्नकोण में सिद्धि के सहित आमोदका अर्चन करे ।४७। अग्निकोण में समृद्धि से संयुत प्रमोद का अर्चन करना चाहिये । ईश कोण में कान्ति के साथ सुमुख का यजन करे ।४८। वरुण कोण में मदनावती से समन्वित दुर्मुखका अर्चन करना चाहिये। निशाचर कोण में महद्वा के सहित विघ्न का पूजन करे ।४६। वायव्ये विघ्नहर्त्तारं द्राविण्या सहितं यजेत् । पाशांकुशाभयाभीष्टधारिणोऽरुणविग्रहाः ।५० गण्डभित्तिगलद्दानपूरधौतमुखाऽम्बुजा । विघ्नास्तत्प्रमदाः सर्वा मदाघूर्णितलोचनाः ।५१ एकहस्तधृताम्भोना इतरालिङ्गितप्रियाः । षट् कोणपार्श्वयोः पूज्योः शंखपद्मनधी क्रमात् ।५२ निजप्रियाभ्यां सहितौ पूर्वोदोरितलक्षणौ । केतरेष्वङ्गपूजा स्याद्ब्राह्मयाद्याः पत्रमध्यगाः ।५३ बहिर्लोकेश्वराः पूज्या वज्रादीनि ततः परम् । इत्थं जपादिभिः सिद्धः प्रयोगांत्स्वमनो षितान् ।५४ साधयेदष्टभिर्देवैर्येत्नैर्व्वाकल्पचोदितै । पद्महोमेन भूपालॉस्तत्पत्नीरुत्पलैः शुभैः ।५५ मन्त्रिणः कुमुदैः फुल्लैर्विप्रान् पिप्लसम्भवेः । समिद्वरैर्नैरपतीनुदुम्बरसमुद्भवैः ।५६ वायव्य कोणमें द्राविणी के साथ विघ्नहर्त्ता का यजन करे। ये सब पाश-अंकुश और अभीष्ट के धारण करने वाले हैं और इसका
एकादश पटल ] [ २४५ ष्नु अरुण वर्ण वाला है। गण्ड स्थल गलते हुए मद के पूर से धोये हुए मुख कमल वाले है । ५०। ऐसे विघ्नगण है और उनकी प्रमदायें सब मद से घूर्णित लोचनों वाली है ।५१। ये सब अपने एक हाथों में कमल धारण करने वाली है और दूसरे करकमल से प्रिय को आलिङ्गित करने वाली है । षट् कोणों के पार्श्व भागों में क्रम से शंख और पद्म निधि का पूजन करना चाहिए । ५२। ये दोनों ही अपनी-अपनी प्रियाओं के सहित होंवे । इसके स्वरूप लक्षण पहिले ही बतला दिये हैं । केसरों में अङ्गों की पूजा करे और ब्राह्मणी आदि का पत्रों के मध्य में यजन करे ।५३। बाहिर लोकपालों का तथा उनके बाहिर वज्र आदि उनके आयुधों का यजन करना चाहिए । इस रीति से जप आदि के द्वारा मन्त्र सिद्ध होता है । फिर अपने वाञ्छित प्रयोगोंका साधन करे । आठ द्रव्यों के द्वारा अथवा अन्यों के द्वारा जो कल्प में प्रेरित किये गये हैं होम करे । पद्मों से भूपालों को और शुभ उत्पलों से उनकी पत्नियों को वश में करे । ५४-५५। विकसित कुमुदोंसे मन्त्रियों को और पीपल की श्रेष्ठ समिधाओं विप्रो को — गूलर की समिधाओं से होम के द्वारा नर-पतियों को वश में करना चाहिए । ५६। प्लक्षै वश्यान्वटोद्भूतैः शूद्रान्मन्त्री वशं नयेत् । मधुना स्वर्णलाभः स्याद्गोदुग्धेन लभेत गाः ।५७ आज्यहोमेन महतीं श्रियमाप्नोति मानवः । दध्ना सर्वसमृद्धिः स्यादन्नैरत्नपतिर्भवेत् । ५८ वृष्टिकामः प्रजुहुयाद्वेतसानां समिद्वरैः । कुसुम्भकुसुमैर्हुत्वा वासांसि लभतेऽचिरात् ।५६ प्रत्येकमादौ मूलेन चतुर्वारं प्रतर्पयेत् । श्रीशक्तिरतिभूलक्ष्मीः स्वबीजाद्याः प्रियान्विताः ।६० आमोदादीन् स्वबीजाद्यान् शक्तियुक्तांश्च तर्पयेत् । चतुश्चतुः पृथङ् मन्त्री शंखपद्मनिधी तथा । ६१
२४६ ] [ श्रीशारदा तिलक नामादिबीजसहितौ तर्पयेत् स्वप्रियान्वितौ । तर्पणेनामुना स्वीयमिष्ट्याप्नोति मण्डलात् ॥६२ पाकड़ और वट की उत्पन्न समिधाओ के द्वारा शूद्रो को मंत्रधारी वश्य कर लेता है । मधु से होम करने पर स्वर्ण का लाभ होता है और गाय के दूध से होम करने पर गोओ का लाभ होता है ।५७। आज्य के होम से मानव बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । दधि के होम से सम्पूर्ण समृद्धि होती है और अन्नों के द्वारा होम से अन्नपति होजाय करता है ।५८। जो वृष्टि की कामना वाला हो उसे वेतसो को श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिए । कुसुम्भ के कुसुमो से हवन करके शीघ्र ही वस्त्रों का लाभ प्राप्त करता है ।५८। आदि में मूल मन्त्र के द्वारा प्रत्येक का चार बार तर्पण करना चाहिए । श्री शक्ति, रति, भू लक्ष्मी जिनके आदि में बीज होवे और प्रिय से समन्वित होवें, अपने बीजों को आदि से रखने वाले तथा शक्ति से युक्त आमोद आदि का तर्पण करे । मन्त्रधारी पृथक्-पृथक् चार-चार बार तर्पण करे । तथा शंख निधि और पद्म निधिका अपनी प्रियाओ से सयुक्त नामादि बीज सहित का तर्पण करे । इस तर्पण के करने से मन्डल से अपने अभीष्ट को प्राप्त करता है ।६०-६२। स्मृतिस्थं मांसमौबिन्दुयुक्तं भूबीजमीरितम् ।६३ बीजं षट्कोणमध्ये स्फुरदनलपुरे तारङ्ग दिक्षु लक्ष्मीं । मा-कन्दर्पभूमीस्तदनुरसपुटेष्वारिखेद्वीजषट्कम् । तत्सन्धिष्वअंगमन्त्रान्वसुदलकमले मूलमन्त्रस्थवर्णान् शिष्टान्पत्रेषु विद्वान्विलिखतु गुणशश्चन्त्यमन्त्ये पलाशै ॥६४ आवीतं लिपिभिः क्रमॊक्रमवशान्पाशाङ्कुशाभ्यामपि क्ष्मागेहद्वितयेन वेष्टदमिदं यन्त्रं गणाधीशितुः । लाक्षाकुङ्कुमरोचनामृगमदैर्भूर्जेवरे हेम्नि वा संलिख्याभिवहल्लभेत् सकलैः संप्रार्थनीयां श्रियम् ॥६५
एकादश पटल ] [ २४७ उक्तं महागणपतेर्विधानं सुरपूजितम् । सर्वसिद्धिकर पुसां सतस्तपुरुषार्थदम् ।६६ मायाविरपदद्वंद्व ततो गणपतिं वदेत् । खड्गीशपावकौ पश्चाद्वरदान्ते वदेत्पुनः ।६७ सर्वलोकं मे पदान्ते वशमानय ठद्वयम् । षड्विंशत्यक्षरोमन्त्रो भजतां सुरपादपः ।६८ गणकः स्यादृषश्छन्दो गायत्रं देवता मनोः । विरिवघ्नेश्वरः प्रोक्ता भजतां सुरपादपः ।६६ अन्तः करणवेदेषु भूतपञ्चविलोचनैः । एवं विभक्तै र्मन्त्रार्णै र्मायाद्यैरं गकल्पना । महागणपतेः प्रोक्तं स्थाने मन्त्री विचिन्तयेत् ।७० मांस, लकार, स्मृतिस्थ, गकारस्थ, ओरूप और विन्दु यह भू बीज कहा गया है । मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है-आठ दलों वाले कमल में षट्कोण के मध्य में शोभित त्रिकोण में प्रणव में स्थित गणपति के ग-इस बीज को लिखना चाहिए । त्रिकोण से बाहिर दिशाओं में षट् कोणों में बीजों के षट्कको लिखे । माया-लक्ष्मी-कन्दर्भ भूमिको लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्ग मन्त्रों को लिखकर शिष्ट पतों में विद्वान् मूलमंत्र में स्थिति वर्णों का लेखन करे । अन्त्य वर्ण को आठवें दल में एक ही को लिखे । इसको त्रिगुणित करे । पत्रमें लिपियों से भावीत करे । क्रमोत्क्रम वशों से पाशांकुशों से भी भूगृह हृदय में वेष्टित यह गणाधीश का यन्त्र है । लाख, कुंकुम, रोचना और मृगमद से भोजपत्र पर अथवा हेम पर भली भाँति लिखकर अभिवहन करने से समस्तों के द्वारा सप्रार्थनीय श्री का लाभ किया करता है ।६३-६५। यह महागणपति का विधान सुरों के द्वारा पूजित कहा गया है । वह पुरुषों को सब सिद्धियों के वर देने वाला और समस्त पुरु- षार्थों का प्रदाता होता है ।६६। जब विरि गणपति के मन्त्र को बत- लाते हैं-दो बार मायाविरि पद को कहकर फिर गणपति कहे,
२४८ ] [ श्रीशारदा तिलक खगीश, व, पावक रेफ, हृल्लेखा, इसके बीज पीछे 'वरदान्ते' बोले सर्व लोक में वश मानव इसको बोलकर दो ठकार कहे । यह छब्बीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके करने वालों के लिए यह कल्पवृक्ष ही है ।६७। ६८। गणक इसका ऋषि है गायत्र छन्द है और मन्त्र का देवता विरि विघ्नेश्वर है । यह सेवन करने वालों के मनोरथों को पूर्ण करने के लिए साक्षात् कल्पवृक्ष के ही समान होता है ।५६। अब षडङ्ग बतलाते हैं- अन्तःकरण चार-वेद-चार, इषु-पांच, भूत-पाँच, लोचन-दो द्वितीय का षट् पदों से षडङ्ग है। तृतीय का महागणपति के ही समान होता है। इस प्रकार से विभक्त मन्त्र के वर्णों से मायादि के द्वारा अङ्ग कल्पना होती है। महा-गणपति के स्थान के प्रोक्त होने पर मन्त्रधारी पुरुष विशेष चिन्तन अर्थात् ध्यान करे ।९०। सिन्दूराभनिभाननं त्रिनयनं हस्तेषु पाशाङ्कुशौ विभ्राणं मधुमत्कपालमनिशं साद्र्धेन्दुमौलि भजेत् । पुष्ट्याश्लिष्टतनुं ध्वजाग्रकरया पद्मोल्लसद्धस्तया । तद्योन्याहितपाणिमात्तवसुसत्पात्रोल्लसत्पुष्करम् ॥९१ चतुर्र्लक्षं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं हुतक्रिया। प्राक्प्रोक्तै रष्टभिर्द्रव्यैस्मिध्वक्तैः समीरिता ।७२ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे तीव्रादिनवशक्तिके । मूलेन मूर्तिं तसंकल्प्य तत्रावाह्यार्चयेद्विभुम् ।७३ मिथुनावृत्तिराद्या स्यादामोदाद्यै र्दिगम्बरैः । द्वितीयाङ्गै तृतीया स्याच्चतुर्थी मातृभिः स्मृता ।७४ पञ्चमी लोकपालैः स्यात्षष्ठी वज्रादिभिः स्मृता । इति सिद्धमनुं श्री प्रफुल्लैः सरसीरुहैः ।७५ जुहुयाद्गणगौरौ सर्वै तण्डुलैस्तिलमिश्रितैः । हुत्वा श्रियमाप्नोति मोदकैराज्यलोलितै ।७६ हुत्वा विजयमाप्नोति पार्थिवोयुद्धभूमिषु । मधुत्रयेण हवन वश नयति पार्थिवान् ।७७