भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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दशम पटल ] [ २३३ चाप-वण को धारण करने वाली—भीम—सिंह पर समारूढ़— अग्नि के तुल्य जाज्वल्यमान-बाणों के समुदाय का सृजन करती हुई और उसी भाँति के शत्रु की ओर धावन करती हुई देवी का ध्यान करके जल के मध्य में स्थित होकर इस मन्त्र का दश हजार जप करना चाहिए। इससे जापक व्यक्ति शत्रु को और पराई सेना को शीघ्र निश्चित रूप से उच्चाटन कर देता है ।१०८-१०६। आग्नित्यक की समिधाओं के होम से रोग और शोक से मुक्त हो जाता है। मधुर से अक्त उसके पुष्पों से होम करने पर मतंगजों को वश में कर लेता है। ।११०। रक्षा के लिये उप किये हुये पञ्चगव्य से रक्षा के लिये हाथियों का लिम्पन करे। गायका घृत तिल-सिद्धार्थ-आग्नित्यक की श्रेष्ठ समि- धाओं से दुग्धान्न, पंचगव्यों से—तण्डुल से और घृत से—इन द्रव्यों से अलग-अलग एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिए ।१११-११२। जु याद्दिनशोविप्रान्भोजयेन्मधुरादिभिः । गुरवे दक्षिणां दद्याद्वस्त्राभरणसंयुताम् ।११३ मातङ्गाश्च तुरङ्गाश्च वर्द्धन्ते विधिनाऽमुना । सर्वव्याधिविनिर्मुक्ताः क्षुद्रपीडाविवर्जिताः ।११४ कारयेद्वग्नवृक्षेण शिल्पिनाऽऽयुधपञ्चकम् । शंखखड्गगदाङ्गाधि शार्ङ्गं कौमोदकीं क्रमात् ।११५ पंचगव्येषु निःक्षिप्य तानि स्पृष्ट्‌वा मनुं जपेत् । सम्यक् पंचसहस्राणि तेषु संपातयेत्पुनः ।११६ तावदब्जेन जुहुयान्न्यस्वैः स्वैः पूजयेत्क्रमात् । उद्धृत्य पञ्चगव्येभ्यः पूर्ववत्प्रजपेन्मनुम् ।११७ अवटान्पञ्च निखनेद्दिक्षु मध्यादिषु क्रमात् । अवटेष्वेषु पूर्णेषु पञ्चगव्येन साधकः ।११८ आयुधानि प्रजप्तानि पञ्च घोषपुरःसरम् । विन्यसेत्तेषु मध्यादिपूजां कुर्याद्यथापुरा ११६ और विप्रों को मधुर आदि के द्वारा भोजन करावे। अपने श्रो