भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 511 में से

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गुरुदेव के लिये वस्त्रों और आभरणों से समन्वित दक्षिणा देवे ॥११३॥ इस मन्त्र के द्वारा हाथी और घोड़े बढ़ जाते हैं। वे सब व्याधियों से रहित होते हैं और क्षुद्र पीड़ा से वर्जित हुआ करते हैं ॥११४। ब्रह्म वृक्ष से किसी शिल्पी के द्वारा पाँच आयुधों का निर्माण करावे । क्रम से शंख, खंग, रथांग (चक्र), शांगं और कोमोदकी—ये पाँच आयुध हैं ॥११५॥ पंचगव्य में निक्षेप करके उनका स्पर्श करके मन्त्र का जप करना चाहिये । भली-भाँति पांच सहस्र जप करे और फिर उनमें सम्पातन करे ।११६। तब तक घृत से होम करे और क्रम से अपने २ मन्त्रों के द्वारा पूजन करे । पंचागव्य से निकालकर पूर्व की ही तरह मन्त्र का जप करना चाहिये ।११७। मध्यादि दिशाओं में क्रम से पाँच अवटों को खनन करे । साधक के द्वारा ये सब अवट पंचागव्य से परिपूर्ण होने पर ध्वनि के साथ पाँच आयुधों को मन्त्र के अभिमन्त्रित करें और उनको उन अवटों में डाल देवे अर्थात् विन्यस्त करे । और पहिले के समान मध्यहृत की पूजा करे ।११८-११६। बालुकाभिः समापूर्य मृद्भिः कुर्यात्समस्थलम् । बलिं च विकिरेत्तत्र तेषां मंत्रैर्यथाक्रमम् ॥१२० दिक् पतिभ्या बलि दत्वा ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । दीनान्धकृपणादींश्च तोषयेद्भोजनादिभिः ।१२१ गुरुवे दक्षिणां दद्यादात्मवित्तानुसारतः । यत्रैवं विहिता रक्षा देशे वा नगरे पुरे ॥१२२ ग्रामे गेहेऽथवा तत्र वर्द्धन्ते सम्पदः सदा । अश्मपातादयो दोषा भूतप्रेतादिसंयुताः ।१२३ अभिचारकृताः कृत्यारिपुचौराद्युपद्रवाः । नेक्षन्ते तां दिशं भीतास्तर्जिता देवताज्ञया ।१२४ बालुका प्रभृति से समापूरित करके सिद्धि से उनको समस्थल कर देवे । उनके मन्त्रों के द्वारा क्रमानुसार वहाँ पर वलि का विकिरण करना चाहिये । दिक्पालों को बलि देकर फिर ब्राह्मणों को भोजन

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