शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम पटल ] [ २३५ करावे। और भोजन आदि के द्वारा दीन अन्ध और कृपण आदि का तोष करना चाहिये ।१२०-१२१। अपने वित्त शक्ति अनुसार गुरुदेव के लिये दक्षिणा देवे। जहां पर इस प्रकार से रक्षा विहित होवे - देश में नगर में, पुर में, ग्राम में अथवा गृह में रक्षा की जावे वहां पर सदा ही सम्पदायें वृद्धि को प्राप्त हुआ करती है। अश्मपात आदि दोष--भूत- प्रेत से संयुत--अभिचार से किये हुये तथा कृत्या, रिपु और चोरों आदि के उपद्रव ये सब देवता की आज्ञा से तर्जित हुये उस दिशा की ओर देखते नही हैं ।१२२-१२४। पद्म भानुदलान्वितं प्रंविलिखेत्तत्कर्णिकायां पुनः स्तारं शक्तिबीजसाध्यसहितं तत्केसरेषु क्रमात् । मर्द्दिन्या मनुसंभवान् युगलशोवर्णान्पुनः पत्रगा । न्मंत्रार्णा गुणशो विभाग विलेखेदन्त्ये दले ।१२५ मातृकावर्णसंवीत भूपुरद्वयमध्यगम् । यंत्र वि ध्यनिवासिन्याः प्रोक्तं सर्वं समृद्धिदम् ।१२६ रक्षाकरं विवेषेण क्षुद्रभूतादिनाशकम् । राज्यदं भ्रष्टराज्यानां वश्यदं वस्यमिच्छताम् । १२७ सुतार्थिनां सुतद रोगिणां रोगशान्तिदम् । बहुनां किमिहोक्तेन यंतं तत्कामदीमणिः ।१२८ बारह दलों से समन्वित एक पद्म लिखकर उसकी कर्णिका में माया बीज में गन्तुक सनिसर्गं दोगं बीज दल रखकर उसमें साध्य के सहित प्रणव लिखे। महिषमर्दिनी के उसके केसरों में युगल शवर्णों को फिर लिखे। इस तरह से मूल मन्त्र के वर्णों की तीन आवृत्ति करे। अन्तिम एक अक्षर को अन्तिम दल में लिखे मातृका वर्णों से भूपुर मध्य में रहने वाले से संवीत करे। तह विन्ध्य निवासिनी का मन्त्र होता है जो सब समृद्धियों का प्रदाता है ।१२५-१२६। यह विशेष रूप से रक्षा के करने वाला है और क्षुद्र भूतादि का विनाशक होता है। यह भ्रष्ट राज्य