भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२३२ } [ श्रीशारदा तिलक शत्रुओं की मृत्यु हो जाती है । १००-१०२। उल्लू और कौओं के पंखों से जो अपनी उनकी ही बसा और रक्त से संयुत होवे वन में रात्रि में होम करे तो शत्रु काल का अतिथि हो जाता है । १०३। मंत्रधारी शत्रु की प्रतिकृत करके उसकी प्राण प्रतिष्ठा करे फिर उसे शोषण से विलिप्त अङ्गों वाली करे । फिर अत्यन्त उष्ण जल में निक्षिप्त कर देवे ।१०४। इसका यह प्रभाव है कि वह शीघ्र ही ज्वराक्रान्त हो जाता है । दुग्ध के सेक से समन करे । दोनों बाहुओं से तर्जनी और त्रि- शिख का वहन करने वाली-भयंकर रक्ता का सूर्य के बिम्ब में ध्यान करे और दश हजार मन्त्र का जप करे । इसका यह प्रभाव है कि थोड़े ही समय में बन्धुओं से समन्वित शत्रुओंका मरण कर देता है ।१०५-१०६। खङ्ग और खेटक से सन्नट-बाहु और बहुत अधिक क्रुद्ध देवी का सूर्य मण्डल में ध्यान करके मन्त्रधारी जप करे तो थोड़े ही समय में शत्रुओं का विनाश कर दिया करता है ।१०७। चापबाणधरां भीमां सिंहस्थां ज्वलनोपमाम् । सृजन्तीं बाणनिवहान्धावन्ती ताहशं रिपुम् ।१०८ ध्यात्वा जपेन्मनुमिममयुतं तोयमध्यगः । रिपुं च परसेनां च द्रुतमुच्चाटयेद्ध्रुवम् ।१०६ आनित्यकृमसमिद्धोमान्मुच्यते रोगशोकतः । पुष्पैस्तदीयैर्वशयेन्मधुराक्तैर्मतङ्गजन् । ११० रक्षायै पञ्चगव्येन लिम्पेज्जप्तेन दन्तिनः । गव्याज्यतिलसिद्धार्थैरानित्यकसमिद्धरैः । १११ दुग्धान्नापञ्चगव्याभ्यां तण्डुलेन घृतेन च । एतैः पृथक् पृथक् द्रव्यैरष्टोत्तरसहस्रकम् । ११२