भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

२२८ ] [ श्रीशारदा तिलक सारान् शुद्धान्समादाय शकलान्मन्तुनाऽमुना । जुहुयादेधिने वह्नौ सप्तरात्रमतन्द्रितः ।८४ प्रातःकाल में स्नान में रत होकर नित्य ही एक सहस्र आठ बार मन्त्र जप करे तो शीघ्र ही धन-धान्य आदि सम्पदायें सिद्ध हो जाती हैं ।७८। इसी विधान के द्वारा ग्रह और क्षुद्र रिपुओं पर विजय प्राप्त किया करता है। नाभि मात्र जलमें स्थित होकर सूर्य मण्डलमें विराज- मान देवी का स्मरण करे ।७६। इस प्रकार से एक सौ आठ बार जप करे तो यह जापक महती श्री को प्राप्त करता है । फिर समेधित अग्नि में मृङ्ग सहित वट वृक्ष की समिधाओं से दश हज़ार आहुतियाँ देवे तो आपदाओं के समुदाय का विनाश कर दिया करता है। इस विधि से परम घोर भूतादि अभिचारों का शमन कर दिया करता है । अथवा अपामार्ग की समिधाओं से या वन में समुत्पन्न हुए तिलों से अथवा सघर्षों के द्वारा होम करने वाला क्षुद्र अपस्मार का नाश करने वाला होता है ।८०-८२। मन्त्रधारी पुरुष को अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए आक की श्रेष्ठ समिधाओं से होम करना चाहिए । अर्क वार से आदि लेकर दश दिन तक परम संयत होकर होम करे ।८३। इस मन्त्र से शुद्ध सारों के खण्डो का समादन करे और तन्द्रा रहित होकर सात रात्रि पर्यन्त प्रज्वलित अग्नि में हवन करे ।८४। साधयेदखिलं स्वभीष्टं मन्त्रवित्तमः । कुमुदैर्वशयेद्विप्रान्नृपतीन्पद्महोमतः ।८५ तत्पत्नीरुत्पलै फुल्लैर्वैश्यान्कह्लारहोमतः । शूद्रान् लवणहोमेन जातीपुष्पैः समान (१) बुधः (पुनः) ।८६ व्रीहिभिर्जुहुयान्नित्यं वत्सराद्व्रीहिमान्भवेत् । दूर्वाहोमेन दीर्घायुर्मधुना रत्नवान्भवेत् ।८७ अन्नैरन्नसमृद्धिः स्यादाज्येन लभते धनम् । गोदुग्धेन गवां वृद्धिमाप्नुयान्नात्र संशयः ।८८