शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश पटल ] { २४१ मन्दारपारिजातादिकल्पवृक्षलताकुलम् । उद्भूतरत्नच्छायाभिररुणीकृतभूतलम् ।३३ उद्यद्दिनकरेन्दुभ्यामुद्भासितदिगन्तरम् । तस्य मध्ये पारिजातं नवरत्नमयं स्मरेत् ।३४ ऋतुभिः सेवितं षड्भिरनिशं प्रीतिवर्द्धनैः । तस्याधस्तान्महापीठे रचिते मातृकाम्बुजे । षट्कोणान्तस्त्रि(णस्थान्त्रि)कोणस्थं महागशपित स्मरेत् । ३५ अब महा गणपति के मन्त्र का उद्धार बतलाते हैं-श्री-शक्ति स्मर - भू और विघ्न के बीजों को सबसे प्रथम कहे-इसके पीछे चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले गणपति को और वरान्त में वरद पढ़े । यह कहकर सर्वजन वशमानय और दो ठकार पढ़े । इसके आदि में प्रणव होता है-ऐसे यह मन्त्र अट्ठाईस अक्षरों वाला कहा गया है ।२८-२६। इसका ऋषि गणक होता है-इसका छन्द निचृदान्वित गायत्री है । इसका देवता देवों के द्वारा वन्दित महा गणपति कहा गया है ।३०। छै बीजों में स्थित दीर्घ भाव अपने बीज से इस मन्त्र के छै अङ्गों का यथा विधि विधान के वेत्ता को कल्पित करना चाहिए ।३१। इसके रस के सागर में नौ रत्नों परिपूर्ण द्वीप का स्मरण करे । उसकी तरङ्गों से धुले हुए पर्यन्त भाग वाले-मन्द वायु से सेवित- मन्दार-पारिजात आदि पाँच कल्प वृक्ष लताओं से समाकुल उद्भूत रत्नों की कान्ति से अरुण किये हुए भूतल वाले को-उड्डीयमान सूर्य और चन्द्र से समुद्भासित दिशाओं के अन्तर से संयुत का ध्यान करके उसके मध्य में नौ प्रकारके रत्नों से परिपूर्ण परिजात का स्मरण करना चाहिए ।३२-३४। वह प्रीति वाले धनों से युक्त छै ऋतुओं के द्वारा निरन्तर सेवित है । उसके नीचे रचित महापीठ पर मातृकाम्बुज में षट्कोण के अन्दर त्रिकोण में स्थित महा गणपति का स्मरण अर्थात् ध्यान करना चाहिए ।३५।