शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० ] [ श्रीशारदा तिलक अनुलोमविलोमस्थबीजे नाम समालिखेत् ।२५ नवनीते समर्च्च्य स्पृष्ट्वा प्राणमनुञ्जपेत् । अष्टोत्तरशतं भूयो मूलमन्त्रं प्रजप्य तत् ।२६ भक्षयेन्मौनमास्थाय यामिन्यां सप्तवासरम् । स वश्यो जायते शीघ्र साधकन्य न संशयः ।२७ अथवा सफेद आक के मूल में रक्त चन्दन के काष्ठ से भज के द्वारा निम्ब से अथवा हाथी के दाँतसे होम किया जावे ।२२। विघ्नेश्वर का भली-भाँति अर्चन करके चन्द्रमा के ग्रहण में जप करना चाहिये । स्पर्श करके मन्त्र के धारण करने वाला निराहार रहकर अपनी शिखा उद्धहन करते हुये युद्धादि में और व्यवहार आदि में विजय श्री को प्त किया करता है । इस मन्त्र के द्वारा भली-भाँति जप की हुई र्थात् अभिमन्त्रित रोचना को मद से संयुत करे उससे तिलक की क्या करे तो सब मनुष्यों को अपने वश में कर लिया करता है । अनु- लोम और विलोम में स्थित बीज में नाम का लेखन करे और नवनीत में अभ्यर्चन करके प्राण का स्पर्श कर जप करे । फिर एक सौ आठ बार मूल मन्त्र का जाप करें । मौन व्रत में समास्थित होकर सात दिन पर्यन्त रात्रि में भक्षण करे तो साधकका लक्ष्य शीघ्र ही वश्य हो जाया करता है इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।२३-२७। श्रीशक्तिस्मरभूविघ्नबीजानि प्रथमं वदेत् । ङेन्तं गणपति पश्चाद्वारान्ते वरदं पठेत् ।२८ उक्त्वा सर्वजनमन्ते वशमानय ठद्वयम् । अष्टाविंशत्यक्षरोऽयं ताराद्योमनुरीरितः ।२६ गणकः स्वाहृषिश्छन्दो गायत्री निचृदन्विता । महागणपतिः प्रोक्तो देवता देववन्दिता ।३० षड्बीजस्थस्वबीजेन दीर्घभावा प्रकल्पयेत् । षडङ्गानि मनोरस्य यथाविधि विधानवित् ।३१ नवरत्नमय द्वीप' स्मरेदिक्षुपसाम्बुधौ । तद्वीचिधौतपर्यन्तं मन्दमारुतसेवितम् ।३२