शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० ] [ श्रीशारदा तिलक हुत्वायुतं निधायाग्रे तीक्ष्णांस्त्रिंशच्छरान्पुनः । तेषु संपातयेद्भूयः स्पृष्ट्वा तन्नियुतं जपेत् । ६३ वेधयेत्परसेनायां क्षणान्नष्टा दिशो दश । प्राप्नुयान्नष्टसंज्ञा सा पलायनपरायणा ।६४ जपित्वा सितगुञ्जानां कुडवं कुलिकोदये । विकिरेच्छत्रु सेनायां गूढः तन्नापणादिषु ।६५ ज्वरमारी महारोगैः पीडिता सैन्यनायकैः । परस्परविरोधेन नश्येद्गच्छेन्म्रियेत सा । ६६ सेनासंस्तम्भने मंत्री कारस्करसमुद्भवैः । पुष्पैः सहस्रं जुहुयात्तत्पत्रै स्ता निवर्तयेत् । ६७ अंगारवारे कुलिके जप्त्वा भस्म चितोद्भवम् । विनिः क्षिपेद्रिमूर्ध्नि विद्विष्टो देशतो ब्रजेत् । ६८ सन्ध्या में जप करना चाहिये तो एक पक्ष भर में वाँक्षित वश में आ जाया करता है । मन्त्र का ज्ञाता अग्नि में देवी का अर्चन करके तीक्ष्ण तैल के द्वारा दश हजार आहुतियाँ देकर उसे अपने आगे निधा- पित करे । तीक्ष्ण तीव्र शरों को उनमें सम्मानित करे, फिर उनका स्पर्श करके नियुत जप करे । ६२-६३। उनसे शत्रु की सेना में वेध कर तो क्षण भर में दशों दिशाओं में सेना नष्ट हो जाती है । वह सेना नष्ट संज्ञा को प्राप्त होती है और पलायन करने में तत्पर हो जाया करती कुलिकोदय के समय में चार प्रस्थ सफेद गुंजाओं को जप करके शत्रु की सेना में विकीर्ण कर देवे और आप आपण आदि में गूढ होकर रहे ।६५। ज्वर भारी महारोगों से पीड़ित सेना नायक आपस में ही विरोध के द्वारा नष्ट हो जाते हैं गमन कर जाते हैं और मर ज ते हैं। ६६। सेना के संस्तम्भन करने से मन्त्रधारी कारस्कर से समुत्पन्न पुष्पों से एक सहस्र आहुतियां देवे और उनके पत्रे से होम करे तो सेना को निर्वात्तित कर दिया करता है। ६७। अंगार वार में कुलिक वेला में जप करके