शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२३८ ] [ श्रीशारदा तिलक वक्रतुण्डमेकदंष्ट्र महोदरगजाननौ । लम्बोदराख्यं विकटं विघ्नराजमनंतरम् ।१३ धूम्रवर्णं दलाग्रेष ब्राह्मयाद्याः पूजयेत्ततः । लोकपालास्तदस्त्राणि देवमित्थं समर्चयेत् ।१४ उग्रा, तेजावती, संस्था, विघ्न नाशिनी, सर्वाद्दिशक्ति कमलासन के लिये हृदयावधि यह पीठ मन्त्र है । इससे विभु को आसन देना चाहिये । मूलमन्त्र से मूर्ति की भली-भाँति कल्पना करके उसमें भग- वान् विघ्नेश्वर का यजन करे ।८-६। कणिका में चारों दिशाओं में सर्व प्रथम इनका पूजन करना चाहिये । गणाधिक, गणेशान, तुरीय, गण- नायक, गमक्क्रीड़, इनको क्रम से पीत, गो रक्त और नील रुचि वालों का जो सभी नागेन्द्रोंके भूषणों से युक्त तथा भक्ष्य लक्षित पुष्करो वालों का पूर्व की ही भाँति केसरों में अंग देवताओं का अर्चन करे । पत्रों के मध्य में विधि के सहित वक्र तुन्ड आदि का अर्चन करना चाहिये १०-१२। वक्र तुण्ड, एकदृष्ट, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण का यजन करे । दलों के अग्रभागों में फिर ब्राह्मणी आदि का पूजन करना चाहिये । फिर लोक पालों का तथा उनके अस्त्रों का यजन करके इसी रीति से देव का अभ्यर्चम करे । १३-१४। सिद्धमंत्रः प्रकुर्वीत प्रयोगान्कल्पचोदितान् । तर्पयेत्सलिलैः शुद्धैर्दिनशो गणनायकम् ।१५ चतुश्चत्वारिशदाद्यं चतुः शतममन्द्रितः । प्राप्नुयान् मण्डलादर्वागभीष्टमधिकं नरः ।१६ नारिकेलैः कृतो होमश्चतुर्थ्यां श्रीप्रदो भवेत् । शुक्लपक्षप्रतिपदभारभ्यदिनशः सुधीः ।१७ चतुर्थ्यन्तं नारिकेलसक्तुलाजातिलैः क्रमात् । चतुः शतः प्रजुहुयाद्वश्याः स्युः सर्वजन्तवः ।१८ सतिलैस्तेण्डुलैर्होमो लक्ष्मीवश्यप्रदो भवेत् ।