भारतकोश
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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

२३८ ] [ श्रीशारदा तिलक वक्रतुण्डमेकदंष्ट्र महोदरगजाननौ । लम्बोदराख्यं विकटं विघ्नराजमनंतरम् ।१३ धूम्रवर्णं दलाग्रेष ब्राह्मयाद्याः पूजयेत्ततः । लोकपालास्तदस्त्राणि देवमित्थं समर्चयेत् ।१४ उग्रा, तेजावती, संस्था, विघ्न नाशिनी, सर्वाद्दिशक्ति कमलासन के लिये हृदयावधि यह पीठ मन्त्र है । इससे विभु को आसन देना चाहिये । मूलमन्त्र से मूर्ति की भली-भाँति कल्पना करके उसमें भग- वान् विघ्नेश्वर का यजन करे ।८-६। कणिका में चारों दिशाओं में सर्व प्रथम इनका पूजन करना चाहिये । गणाधिक, गणेशान, तुरीय, गण- नायक, गमक्क्रीड़, इनको क्रम से पीत, गो रक्त और नील रुचि वालों का जो सभी नागेन्द्रोंके भूषणों से युक्त तथा भक्ष्य लक्षित पुष्करो वालों का पूर्व की ही भाँति केसरों में अंग देवताओं का अर्चन करे । पत्रों के मध्य में विधि के सहित वक्र तुन्ड आदि का अर्चन करना चाहिये १०-१२। वक्र तुण्ड, एकदृष्ट, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण का यजन करे । दलों के अग्रभागों में फिर ब्राह्मणी आदि का पूजन करना चाहिये । फिर लोक पालों का तथा उनके अस्त्रों का यजन करके इसी रीति से देव का अभ्यर्चम करे । १३-१४। सिद्धमंत्रः प्रकुर्वीत प्रयोगान्कल्पचोदितान् । तर्पयेत्सलिलैः शुद्धैर्दिनशो गणनायकम् ।१५ चतुश्चत्वारिशदाद्यं चतुः शतममन्द्रितः । प्राप्नुयान् मण्डलादर्वागभीष्टमधिकं नरः ।१६ नारिकेलैः कृतो होमश्चतुर्थ्यां श्रीप्रदो भवेत् । शुक्लपक्षप्रतिपदभारभ्यदिनशः सुधीः ।१७ चतुर्थ्यन्तं नारिकेलसक्तुलाजातिलैः क्रमात् । चतुः शतः प्रजुहुयाद्वश्याः स्युः सर्वजन्तवः ।१८ सतिलैस्तेण्डुलैर्होमो लक्ष्मीवश्यप्रदो भवेत् ।

एकादश पटल ] [ २३६ लजैस्त्रिमधुरोपेतैर्होमः कन्या प्रयच्छति ।१६ अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाँछितम्। आज्यःक्तहविषा होमः साधयेदीस्पितं नृणाम् ।२० दध्ना विलोलि (१) तैर्लोणैर्होमो निशि चतुदिनम्। संवादं कुरुते तद्वश्यं वितनुते सदा ।२१ यह सिद्ध मन्त्र है फिर कथ्य प्रेरित प्रयोगों को करे। दिनो दिन शुद्ध जलो के द्वारा गणनायक तर्पण का करना चाहिये । अतन्द्रित रह- कर चारसौ चोवालीस दिन करे तो मण्डल के पूर्व ही मनुष्य अधिक अभीष्ट की प्राप्ति किया करता है ।१५-१६। नारियलो के द्वारा होम किये जाने वाला पुरुष जोकि चतुर्थी में करे तो यह श्री का प्रदाता होता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ करके दिन में सुधी चतुर्थी के अन्त तक नारियल, सक्तु, लाजा ओर तिलों से क्रमश- चारसौ आहुतियां देवे तो सभी जन्तुगण वंश्य हो जाते हैं ।१७-१८। तिलो के सहित तण्डुलों के द्वारा किया होम लक्ष्मी के वश करने वाला होता है तीन मधुरों से अक्त लाजाओ से किया गया होम कन्या को दिया करता है ।१६। इस विधान में कन्या अपने अभीष्ट वर को प्राप्त किया करती है। मनुष्यों के दोरिपत को आज्य से अक्त हवि से किया हुआ होम साधित कर देता है ।२०। हवि से लोलित लोण से रात्रि मे चार दिन तक किया हुआ होम सम्वाद करता है उस भाँति अवश्य ही सदा विस्तार करता है ।२१। श्वेतार्कभवमूले रक्तचंदनदारुणा । इभभज्जेन निम्बेन दान्तदन्तेन वा कृतम् ।२२ विघ्नेश्वर समभ्यर्च्य शीताँशुग्रहणे जपेत् । स्पृष्ट्वा मंत्री निराहारस्त शिखायाँ समुद्वहन् ।२३ युद्धेषु व्यवहारादौ विजयश्रियमाप्नुयात् । मन्त्रेधानेन सजप्ता रोचना मदसयुतां ।२४ तिलकक्रियया सर्वान्वशं नयति मानवान् ।

२४० ] [ श्रीशारदा तिलक अनुलोमविलोमस्थबीजे नाम समालिखेत् ।२५ नवनीते समर्च्च्य स्पृष्ट्वा प्राणमनुञ्जपेत् । अष्टोत्तरशतं भूयो मूलमन्त्रं प्रजप्य तत् ।२६ भक्षयेन्मौनमास्थाय यामिन्यां सप्तवासरम् । स वश्यो जायते शीघ्र साधकन्य न संशयः ।२७ अथवा सफेद आक के मूल में रक्त चन्दन के काष्ठ से भज के द्वारा निम्ब से अथवा हाथी के दाँतसे होम किया जावे ।२२। विघ्नेश्वर का भली-भाँति अर्चन करके चन्द्रमा के ग्रहण में जप करना चाहिये । स्पर्श करके मन्त्र के धारण करने वाला निराहार रहकर अपनी शिखा उद्धहन करते हुये युद्धादि में और व्यवहार आदि में विजय श्री को प्त किया करता है । इस मन्त्र के द्वारा भली-भाँति जप की हुई र्थात् अभिमन्त्रित रोचना को मद से संयुत करे उससे तिलक की क्या करे तो सब मनुष्यों को अपने वश में कर लिया करता है । अनु- लोम और विलोम में स्थित बीज में नाम का लेखन करे और नवनीत में अभ्यर्चन करके प्राण का स्पर्श कर जप करे । फिर एक सौ आठ बार मूल मन्त्र का जाप करें । मौन व्रत में समास्थित होकर सात दिन पर्यन्त रात्रि में भक्षण करे तो साधकका लक्ष्य शीघ्र ही वश्य हो जाया करता है इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।२३-२७। श्रीशक्तिस्मरभूविघ्नबीजानि प्रथमं वदेत् । ङेन्तं गणपति पश्चाद्वारान्ते वरदं पठेत् ।२८ उक्त्वा सर्वजनमन्ते वशमानय ठद्वयम् । अष्टाविंशत्यक्षरोऽयं ताराद्योमनुरीरितः ।२६ गणकः स्वाहृषिश्छन्दो गायत्री निचृदन्विता । महागणपतिः प्रोक्तो देवता देववन्दिता ।३० षड्बीजस्थस्वबीजेन दीर्घभावा प्रकल्पयेत् । षडङ्गानि मनोरस्य यथाविधि विधानवित् ।३१ नवरत्नमय द्वीप' स्मरेदिक्षुपसाम्बुधौ । तद्वीचिधौतपर्यन्तं मन्दमारुतसेवितम् ।३२

एकादश पटल ] { २४१ मन्दारपारिजातादिकल्पवृक्षलताकुलम् । उद्भूतरत्नच्छायाभिररुणीकृतभूतलम् ।३३ उद्यद्दिनकरेन्दुभ्यामुद्भासितदिगन्तरम् । तस्य मध्ये पारिजातं नवरत्नमयं स्मरेत् ।३४ ऋतुभिः सेवितं षड्भिरनिशं प्रीतिवर्द्धनैः । तस्याधस्तान्महापीठे रचिते मातृकाम्बुजे । षट्कोणान्तस्त्रि(णस्थान्त्रि)कोणस्थं महागशपित स्मरेत् । ३५ अब महा गणपति के मन्त्र का उद्धार बतलाते हैं-श्री-शक्ति स्मर - भू और विघ्न के बीजों को सबसे प्रथम कहे-इसके पीछे चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले गणपति को और वरान्त में वरद पढ़े । यह कहकर सर्वजन वशमानय और दो ठकार पढ़े । इसके आदि में प्रणव होता है-ऐसे यह मन्त्र अट्ठाईस अक्षरों वाला कहा गया है ।२८-२६। इसका ऋषि गणक होता है-इसका छन्द निचृदान्वित गायत्री है । इसका देवता देवों के द्वारा वन्दित महा गणपति कहा गया है ।३०। छै बीजों में स्थित दीर्घ भाव अपने बीज से इस मन्त्र के छै अङ्गों का यथा विधि विधान के वेत्ता को कल्पित करना चाहिए ।३१। इसके रस के सागर में नौ रत्नों परिपूर्ण द्वीप का स्मरण करे । उसकी तरङ्गों से धुले हुए पर्यन्त भाग वाले-मन्द वायु से सेवित- मन्दार-पारिजात आदि पाँच कल्प वृक्ष लताओं से समाकुल उद्भूत रत्नों की कान्ति से अरुण किये हुए भूतल वाले को-उड्डीयमान सूर्य और चन्द्र से समुद्भासित दिशाओं के अन्तर से संयुत का ध्यान करके उसके मध्य में नौ प्रकारके रत्नों से परिपूर्ण परिजात का स्मरण करना चाहिए ।३२-३४। वह प्रीति वाले धनों से युक्त छै ऋतुओं के द्वारा निरन्तर सेवित है । उसके नीचे रचित महापीठ पर मातृकाम्बुज में षट्कोण के अन्दर त्रिकोण में स्थित महा गणपति का स्मरण अर्थात् ध्यान करना चाहिए ।३५।

२४४ ] [ श्री शारदा तिलक करना चाहिए ।५४। रति के करों में उत्पल है और कोदन्डे अस्त्र को धारण करने वाला कामदेव है। सौम्य दिशा में प्रियङ्गु वृक्ष के नीचे मही और पौत्री का अर्चन करे ।४५। भूमि अपने हाथों मे शुक्ल व्रीहि के अग्रभाग को धारण करने वाली है और गदा तथा चक्र को धारण करने वाला पति है। देव के आगे लक्ष्मी के सहित गोपनायक का यजन करना चाहिए ।४६। छै कोणोंमें आमोद आदिक श्री से समन्वित पूजित करने चाहिए। अग्नकोण में सिद्धि के सहित आमोदका अर्चन करे ।४७। अग्निकोण में समृद्धि से संयुत प्रमोद का अर्चन करना चाहिये । ईश कोण में कान्ति के साथ सुमुख का यजन करे ।४८। वरुण कोण में मदनावती से समन्वित दुर्मुखका अर्चन करना चाहिये। निशाचर कोण में महद्वा के सहित विघ्न का पूजन करे ।४६। वायव्ये विघ्नहर्त्तारं द्राविण्या सहितं यजेत् । पाशांकुशाभयाभीष्टधारिणोऽरुणविग्रहाः ।५० गण्डभित्तिगलद्दानपूरधौतमुखाऽम्बुजा । विघ्नास्तत्प्रमदाः सर्वा मदाघूर्णितलोचनाः ।५१ एकहस्तधृताम्भोना इतरालिङ्गितप्रियाः । षट् कोणपार्श्वयोः पूज्योः शंखपद्मनधी क्रमात् ।५२ निजप्रियाभ्यां सहितौ पूर्वोदोरितलक्षणौ । केतरेष्वङ्गपूजा स्याद्ब्राह्मयाद्याः पत्रमध्यगाः ।५३ बहिर्लोकेश्वराः पूज्या वज्रादीनि ततः परम् । इत्थं जपादिभिः सिद्धः प्रयोगांत्स्वमनो षितान् ।५४ साधयेदष्टभिर्देवैर्येत्नैर्व्वाकल्पचोदितै । पद्महोमेन भूपालॉस्तत्पत्नीरुत्पलैः शुभैः ।५५ मन्त्रिणः कुमुदैः फुल्लैर्विप्रान् पिप्लसम्भवेः । समिद्वरैर्नैरपतीनुदुम्बरसमुद्भवैः ।५६ वायव्य कोणमें द्राविणी के साथ विघ्नहर्त्ता का यजन करे। ये सब पाश-अंकुश और अभीष्ट के धारण करने वाले हैं और इसका

एकादश पटल ] [ २४५ ष्नु अरुण वर्ण वाला है। गण्ड स्थल गलते हुए मद के पूर से धोये हुए मुख कमल वाले है । ५०। ऐसे विघ्नगण है और उनकी प्रमदायें सब मद से घूर्णित लोचनों वाली है ।५१। ये सब अपने एक हाथों में कमल धारण करने वाली है और दूसरे करकमल से प्रिय को आलिङ्गित करने वाली है । षट् कोणों के पार्श्व भागों में क्रम से शंख और पद्म निधि का पूजन करना चाहिए । ५२। ये दोनों ही अपनी-अपनी प्रियाओं के सहित होंवे । इसके स्वरूप लक्षण पहिले ही बतला दिये हैं । केसरों में अङ्गों की पूजा करे और ब्राह्मणी आदि का पत्रों के मध्य में यजन करे ।५३। बाहिर लोकपालों का तथा उनके बाहिर वज्र आदि उनके आयुधों का यजन करना चाहिए । इस रीति से जप आदि के द्वारा मन्त्र सिद्ध होता है । फिर अपने वाञ्छित प्रयोगोंका साधन करे । आठ द्रव्यों के द्वारा अथवा अन्यों के द्वारा जो कल्प में प्रेरित किये गये हैं होम करे । पद्मों से भूपालों को और शुभ उत्पलों से उनकी पत्नियों को वश में करे । ५४-५५। विकसित कुमुदोंसे मन्त्रियों को और पीपल की श्रेष्ठ समिधाओं विप्रो को — गूलर की समिधाओं से होम के द्वारा नर-पतियों को वश में करना चाहिए । ५६। प्लक्षै वश्यान्वटोद्भूतैः शूद्रान्मन्त्री वशं नयेत् । मधुना स्वर्णलाभः स्याद्गोदुग्धेन लभेत गाः ।५७ आज्यहोमेन महतीं श्रियमाप्नोति मानवः । दध्ना सर्वसमृद्धिः स्यादन्नैरत्नपतिर्भवेत् । ५८ वृष्टिकामः प्रजुहुयाद्वेतसानां समिद्वरैः । कुसुम्भकुसुमैर्हुत्वा वासांसि लभतेऽचिरात् ।५६ प्रत्येकमादौ मूलेन चतुर्वारं प्रतर्पयेत् । श्रीशक्तिरतिभूलक्ष्मीः स्वबीजाद्याः प्रियान्विताः ।६० आमोदादीन् स्वबीजाद्यान् शक्तियुक्तांश्च तर्पयेत् । चतुश्चतुः पृथङ् मन्त्री शंखपद्मनिधी तथा । ६१

२४६ ] [ श्रीशारदा तिलक नामादिबीजसहितौ तर्पयेत् स्वप्रियान्वितौ । तर्पणेनामुना स्वीयमिष्ट्याप्नोति मण्डलात् ॥६२ पाकड़ और वट की उत्पन्न समिधाओ के द्वारा शूद्रो को मंत्रधारी वश्य कर लेता है । मधु से होम करने पर स्वर्ण का लाभ होता है और गाय के दूध से होम करने पर गोओ का लाभ होता है ।५७। आज्य के होम से मानव बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । दधि के होम से सम्पूर्ण समृद्धि होती है और अन्नों के द्वारा होम से अन्नपति होजाय करता है ।५८। जो वृष्टि की कामना वाला हो उसे वेतसो को श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिए । कुसुम्भ के कुसुमो से हवन करके शीघ्र ही वस्त्रों का लाभ प्राप्त करता है ।५८। आदि में मूल मन्त्र के द्वारा प्रत्येक का चार बार तर्पण करना चाहिए । श्री शक्ति, रति, भू लक्ष्मी जिनके आदि में बीज होवे और प्रिय से समन्वित होवें, अपने बीजों को आदि से रखने वाले तथा शक्ति से युक्त आमोद आदि का तर्पण करे । मन्त्रधारी पृथक्-पृथक् चार-चार बार तर्पण करे । तथा शंख निधि और पद्म निधिका अपनी प्रियाओ से सयुक्त नामादि बीज सहित का तर्पण करे । इस तर्पण के करने से मन्डल से अपने अभीष्ट को प्राप्त करता है ।६०-६२। स्मृतिस्थं मांसमौबिन्दुयुक्तं भूबीजमीरितम् ।६३ बीजं षट्कोणमध्ये स्फुरदनलपुरे तारङ्ग दिक्षु लक्ष्मीं । मा-कन्दर्पभूमीस्तदनुरसपुटेष्वारिखेद्वीजषट्कम् । तत्सन्धिष्वअंगमन्त्रान्वसुदलकमले मूलमन्त्रस्थवर्णान् शिष्टान्पत्रेषु विद्वान्विलिखतु गुणशश्चन्त्यमन्त्ये पलाशै ॥६४ आवीतं लिपिभिः क्रमॊक्रमवशान्पाशाङ्कुशाभ्यामपि क्ष्मागेहद्वितयेन वेष्टदमिदं यन्त्रं गणाधीशितुः । लाक्षाकुङ्कुमरोचनामृगमदैर्भूर्जेवरे हेम्नि वा संलिख्याभिवहल्लभेत् सकलैः संप्रार्थनीयां श्रियम् ॥६५

एकादश पटल ] [ २४७ उक्तं महागणपतेर्विधानं सुरपूजितम् । सर्वसिद्धिकर पुसां सतस्तपुरुषार्थदम् ।६६ मायाविरपदद्वंद्व ततो गणपतिं वदेत् । खड्गीशपावकौ पश्चाद्वरदान्ते वदेत्पुनः ।६७ सर्वलोकं मे पदान्ते वशमानय ठद्वयम् । षड्विंशत्यक्षरोमन्त्रो भजतां सुरपादपः ।६८ गणकः स्यादृषश्छन्दो गायत्रं देवता मनोः । विरिवघ्नेश्वरः प्रोक्ता भजतां सुरपादपः ।६६ अन्तः करणवेदेषु भूतपञ्चविलोचनैः । एवं विभक्तै र्मन्त्रार्णै र्मायाद्यैरं गकल्पना । महागणपतेः प्रोक्तं स्थाने मन्त्री विचिन्तयेत् ।७० मांस, लकार, स्मृतिस्थ, गकारस्थ, ओरूप और विन्दु यह भू बीज कहा गया है । मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है-आठ दलों वाले कमल में षट्कोण के मध्य में शोभित त्रिकोण में प्रणव में स्थित गणपति के ग-इस बीज को लिखना चाहिए । त्रिकोण से बाहिर दिशाओं में षट् कोणों में बीजों के षट्कको लिखे । माया-लक्ष्मी-कन्दर्भ भूमिको लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्ग मन्त्रों को लिखकर शिष्ट पतों में विद्वान् मूलमंत्र में स्थिति वर्णों का लेखन करे । अन्त्य वर्ण को आठवें दल में एक ही को लिखे । इसको त्रिगुणित करे । पत्रमें लिपियों से भावीत करे । क्रमोत्क्रम वशों से पाशांकुशों से भी भूगृह हृदय में वेष्टित यह गणाधीश का यन्त्र है । लाख, कुंकुम, रोचना और मृगमद से भोजपत्र पर अथवा हेम पर भली भाँति लिखकर अभिवहन करने से समस्तों के द्वारा सप्रार्थनीय श्री का लाभ किया करता है ।६३-६५। यह महागणपति का विधान सुरों के द्वारा पूजित कहा गया है । वह पुरुषों को सब सिद्धियों के वर देने वाला और समस्त पुरु- षार्थों का प्रदाता होता है ।६६। जब विरि गणपति के मन्त्र को बत- लाते हैं-दो बार मायाविरि पद को कहकर फिर गणपति कहे,

२४८ ] [ श्रीशारदा तिलक खगीश, व, पावक रेफ, हृल्लेखा, इसके बीज पीछे 'वरदान्ते' बोले सर्व लोक में वश मानव इसको बोलकर दो ठकार कहे । यह छब्बीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके करने वालों के लिए यह कल्पवृक्ष ही है ।६७। ६८। गणक इसका ऋषि है गायत्र छन्द है और मन्त्र का देवता विरि विघ्नेश्वर है । यह सेवन करने वालों के मनोरथों को पूर्ण करने के लिए साक्षात् कल्पवृक्ष के ही समान होता है ।५६। अब षडङ्ग बतलाते हैं- अन्तःकरण चार-वेद-चार, इषु-पांच, भूत-पाँच, लोचन-दो द्वितीय का षट् पदों से षडङ्ग है। तृतीय का महागणपति के ही समान होता है। इस प्रकार से विभक्त मन्त्र के वर्णों से मायादि के द्वारा अङ्ग कल्पना होती है। महा-गणपति के स्थान के प्रोक्त होने पर मन्त्रधारी पुरुष विशेष चिन्तन अर्थात् ध्यान करे ।९०। सिन्दूराभनिभाननं त्रिनयनं हस्तेषु पाशाङ्कुशौ विभ्राणं मधुमत्कपालमनिशं साद्र्धेन्दुमौलि भजेत् । पुष्ट्याश्लिष्टतनुं ध्वजाग्रकरया पद्मोल्लसद्धस्तया । तद्योन्याहितपाणिमात्तवसुसत्पात्रोल्लसत्पुष्करम् ॥९१ चतुर्र्लक्षं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं हुतक्रिया। प्राक्प्रोक्तै रष्टभिर्द्रव्यैस्मिध्वक्तैः समीरिता ।७२ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे तीव्रादिनवशक्तिके । मूलेन मूर्तिं तसंकल्प्य तत्रावाह्यार्चयेद्विभुम् ।७३ मिथुनावृत्तिराद्या स्यादामोदाद्यै र्दिगम्बरैः । द्वितीयाङ्गै तृतीया स्याच्चतुर्थी मातृभिः स्मृता ।७४ पञ्चमी लोकपालैः स्यात्षष्ठी वज्रादिभिः स्मृता । इति सिद्धमनुं श्री प्रफुल्लैः सरसीरुहैः ।७५ जुहुयाद्गणगौरौ सर्वै तण्डुलैस्तिलमिश्रितैः । हुत्वा श्रियमाप्नोति मोदकैराज्यलोलितै ।७६ हुत्वा विजयमाप्नोति पार्थिवोयुद्धभूमिषु । मधुत्रयेण हवन वश नयति पार्थिवान् ।७७

एकादश पटल ] [ २४६ सिन्दूर के तुल्य मुख से युक्त-तीन नयनों वाले करकमलों में पाश और अंकुश को धारण किये हुए हैं-मधु से संयुक्त कपाल निरन्तर विद्यमान है-अर्ध चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले पुष्टि के द्वारा आलिंगित शरीर से संयुत हैं। जो ध्वज के अग्रभाग को करमें लिए हुए हैं और हस्त में पद्म धारण किए हुए हैं जिससे यह परम शोभित है। उसकी योनि में कर को आहित कर रक्खा है और वसुयुक्त पात्र को सूंड में ग्रहण कर सुशोभित हैं ।७१। इस मन्त्र का चार लाख जप करे और जप के दशांश का होम किया करे। यह होम तीनों मधुरों से अक्त पूर्व में कहे हुए आठ द्रव्यों के द्वारा करनी चाहिए। पूर्व में वर्णित पीठ पर यजन करे जिसमें तीव्रा आदि नौ शक्तियां होवे। मंत्र से मूर्ति की भली भांति कल्पना करके उसमें आवाहन करके विभु का अभ्यर्चन करना चाहिए ।७२-७३। मिथुना वृत्ति आद्या होती है-दिगम्बर आमो- दादि से द्वितीया होती है। अङ्गों से तृतीया होती है-मातृगणों से चतुर्थी होती है ।७४। लोकपालों से पांचवीं और वज्राद से छठवीं होती है। इस प्रकार सिद्ध मन्त्र होता है। मंत्रधारी खिले हुये कमलों के द्वारा होम करे तो सब वश में आ जाते हैं। तिलों से मिश्रित तण्डुलों से हवनने करने से श्री की प्राप्ति किया करता है। आज्य में लोलित मोदकों से होमकरके विजय पाता है। जो पार्थिव युद्ध भूमिमें गया हुआ होवे, वह मधुरों से किया हुआ हवन पार्थिवों को वश में कर लेता है ।७५-७७। भक्ष्यभोज्यादिकं सर्वं हुत्वा भीष्टानि साधयेत् । शक्तिरुच्चं निजं बीजं महागणपति वदेत् ।७८ ङेऽन्तमग्निवधूः प्रोक्तो मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । गणकः स्यादृषिश्छन्दो गायत्री निचृदादिका ।७६ उदिता देवता तन्त्रे नाम्ना शक्तिगणाधिपः। व्यस्तैः समस्तैर्मन्त्रस्य पदैरङ्गानि कल्पयेत् ।८० मुक्तागौरं मदगजमुखं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं ।

२५० ] [ श्रीशारदा तिलक अङ्कस्थायाः सरसिजरुचेः स्वध्वजालम्बिपाणे- र्देव्यायोनौ विनिहितरं रत्नमौलिभजामः ।८१ लक्षमेकं संख्यं जपेन्मन्त्रं मधूकैस्तद्दशांशतः । जुहुयादर्चिते वह्नौ दिनशोदेवमर्चयेत् ।८२ प्रोक्ते पूजयेत्पीठे प्रागुक्तेनैव वर्त्मना । हुत्वेक्षुखण्डैर्मतिमान् राज्यश्रियमवाप्नुयात् ।८३ नालिकेरफलैस्तद्वद्रम्भापक्वफलैस्तुतः । ३ वशयत्यखिलं लोकं पृथुकैः शर्करान्वितैः ।८४ वशं नयति राजानं सक्तुभिर्ब्राह्मणान् शुभैः । घृतहोमेन धनवान् जायते नात्र संशयः ।८५ भक्ष्य-भोज्यादिक सबका हवन करके पुरुष अभीष्टों का साधन किया करता है। भक्ष्य लड्डू आदि है और भोज्य अन्न आदिहै। शक्ति से रुद्ध निज बीज, फिर महाग गणपति, यह कहे जिसके अन्त में चतुर्थी विभक्ति होवे—फिर, स्वाहा कहे—यह बारह अक्षरों वाला मन्त्र कहा है। इसका ऋषि गणक, छन्द गायत्री निष्टुदादिक है। तन्त्र में शक्ति गणाधिप देवता कहा गया है। मन्त्रके व्यस्त और समस्त पदों से अङ्गो की कल्पना करनी चाहिए ।७८-८०। अब ध्यान बताया जाता है— आपका वर्ण मुक्ताके तुल्य एकदम गौर है—पद से संयुत गज के समान मुख है—चूड़ा में चन्द्र को धारण करने वाले तथा तीन नेत्रों से युक्त से—अपने कर कमलों में अरविन्द-अंकुश-रत्न कुम्भ को धारण करने वाले हैं और अपनी गोद में विराजमान कमल की कान्ति वाली और अपने ध्वज पर समालम्बित कर वाली देवी की योनि में कर को निहत किए हुए—मस्तक में रत्न को धारण करने वाले देव का हम भजन करते हैं ।८१। इस मन्त्र को एक लाख जप और का दशांश मधू को से होम करना चाहिए । जो समर्चित वह्नि में करे और प्रति दिन देव का अर्चन करे ।८२। पूर्व में कहे हुए पीठ पर पूर्वोक्त मार्ग से ही यजन करना चाहिए । गतिमान् ईख के खण्डो से होम करके राज्य श्री को

एकादश पटल ] [ २५१ प्राप्त किया करता है। शर्करा नारियल के फलों से तथा कदली के पके हुये फलों से होम करके सम्पूर्ण लोक को अपने वश में ले आता है । शर्करा से समन्वित पृथुकों से होम करके राजा को और शुभ सक्तुओंसे होम करके ब्राह्मणों को वश में कर लेता है। तथा घृत के द्वारा होम करने से धनवान् होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।८५। शक्त्या रुद्धं निज बीजं वशमानयठद्वयम्। तारोद्योमनुराख्यातो रुद्रसंख्याक्षरान्वितः ।८६ ऋष्याद्याः पूर्वमुक्ताः स्युरङ्गमन्त्रपदैर्भवेत् । एकेनादौ त्रिभिर्द्वाभ्यां त्रिभिर्द्वाभ्यामनन्तरम् । समस्तेनास्त्रमाख्यातगंक्लृप्तिरियं मता ।८७ हस्तैर्बिभ्रतमिक्षुदण्डवरदौ पाशाङ्कुशौ पुष्कर स्पृष्टस्वप्रमदावरांगमनयाऽऽश्लिष्टं ध्वजाग्रस्पृशा । श्यामांगया विधुताब्जया त्रिनयनं चन्द्राद्धंचूडंब्वपा- रक्तं हस्तिमुखं स्मरामि सततं भोगातिलोलं विभुम् ।८८ लक्षत्रयं जपेन्मन्त्रमिक्षु खण्डैर्दशांशतः । अपूपैराज्ययुक्तैर्वा जुहुयान्मन्त्रसिद्धये ।८६ स्वगुरुं धनधान्याद्यैः प्रीणयेत्प्रीतमानसः । पूजा पूर्ववदादिष्टाततः काम्यानि साधयेत् ।६० हत्वापूपैस्त्रिमध्वक्तैर्वणयेद्भुवि पार्थिवान् । चतुर्थ्या नालिकेरेण महतीं श्रियमश्नुते ।६१ शक्ति (स्वाहा) से रुद्ध निज बीज (ग) होवे और वश मानय-यह पद मता दो ठकार होवें, आदि में प्रणव होवे, यहमन्त्र एकादश अक्षरों वाला कहा गया है ।८६। इसके ऋषि आदिक पूर्व में कह दिये गये हैं। अङ्ग मन्त्र पदों से होते हैं। आदि में एक से, दो से, तीन से और अन- न्तर में दो और तीन से तथा समस्त से अस्त्र कहा गया है। यही अङ्ग क्लृप्ति मानी गयी है ।८७। अब ध्यान बतलाया जाता है-करों के द्वारा इक्षु दण्ड और वरदान धारण किये हुए हैं तथा पाश और

२५२ ] [ श्रीशारदा तिलक अंकुश धारण करने वाले हैं-अपने पुष्कर (सूँड) से अपनी प्रमदा के श्रेष्ठ अङ्ग का स्पर्श कर रहे हैं। ध्वज के अग्र भाग को स्पर्श करने वाली तथा कमल धारिणी इस श्यामांगी के द्वारा समालिंगित है-तीन नेत्रों से युक्त अर्ध चन्द्र को मस्तक में धारण करने वाले, भोग में अतीव चंचल, गज के समान मुख वाले, जमा के पुष्प के तुल्य रक्तवर्ण से युक्त विभु का निरन्तर स्मरण करता हूँ ।८८। इस मन्त्र का तीन लाख जप करना चाहिए तथा ईश के दन्डों से दशांश होम करे अथवा मन्त्र की सिद्धि के लिए आज्य से समन्वित पूओं से हवन करना चाहिए ।८६। प्रसन्न मन वाले व्यक्ति को अपने गुरुदेव को धन- धान्यादि के द्वारा प्रीणित करना चाहिए । पूजा पूर्व की ही भाँति अभीष्ट होती है। इसके अनन्तर काम्य प्रयोगों का साधन करे ।६०। तीन मधुगों से अक्त पूओं के द्वारा होम करके भूमण्डल में पार्थिवों की वश में ले आया करता है। चतुर्थी में नारियलों से हवन करके महती श्री को प्राप्त करता है । लवणैर्मधुसंयुक्तैर्वशयेद्वनिताजनम् । संवर्त्तकोनेत्रयुतः पार्श्वोह्नीयासनस्थितः ।६२ प्रसादनाथ हृन्मन्त्रः स्वबीज्यो दशाक्षरः । गणको मुनिरस्य स्याद्विराट्छद उदाहृतम् ।६३ क्षिप्रप्रसादिनो विघ्नो देवतास्य समीरिता । दीर्घयुक्तेन वोजेन षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।६४ पाशाङ्कुशौ कल्पलतां विषाणं दधत्स्वशुण्डांहितबीजपूरः । रक्तास्त्रिनेत्रस्तरुणेन्दुमौलिर्हसिज्ज्वलोहस्तिमुखोऽवताद्वः ।६५ लक्षं जपेज्जपस्यान्ते जुहुयादयुतं तिलैः । समधु (मधुर) त्रितयैर्द्रव्यैरथवाष्टाभिरीरितैः ।६६ एकाक्षसेदिते पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैर्धूपदीपैर्गजाननम् ।६७ अङ्गानि पूर्वमभ्यर्च्य विघ्नानष्टौ यजेत्ततः । विघ्नं विनायकं शूरवीरं वरसंज्ञकम् ।६८

एकादश पटल ] [ २५३ इभवक्त्रं चैकदन्तं लम्बोदरमनन्तरम् । पत्राग्रेष्वर्चयेत्पश्चाद्ब्राह्म्याद्यास्तदनन्तरम् । ६६ मधु से युक्त लवणों से हवन करके अनिता जनों को वश में कर लिया करता है । अब क्षिप्रप्रसादन के मन्त्र से बतलाया जाता है । सम्वर्त्तक-क्षकार, नेत्र-इकार से युत, पार्श्व-पकार, वह्निवासन- रेफसम, स्वबीजाद्य - गं । इस बीज के आदि वाला प्रसादन के लिये हृन्मन्त्र दश अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि गणक है-विराट् छन्द है और क्षिप्रप्रसादन है विघ्न इसका देवता बताया गया है । दीर्घ युक्त बीज के द्वारा षट् अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये । ६२-६४। अब ध्यान बताया जाता है-पाश - अंकुश-कल्पलता-विषाण को धारण करते हुए अपनी सूँड से बीजपुर को आहित करने वाले-रक्त वर्ण से युक्त-तीन नेत्रों से समन्वित-तरुण चन्द्र को मस्तक में धारण करने वाले-हार से समुज्ज्वल-हाथी के समान मुख वाले आपकी रक्षा करे ।६४। इन मन्त्र का एक लाख जप करे और जप का दशांश भाग दश हजार तिलों से हवन करना चाहिये । त्रिमधुर द्रव्यों से अथवा कथित आठ द्रव्यों से होम करे ।६५-६६। एकाक्षरोदित पीठपर वक्ष्यमाण मार्ग के द्वारा गन्ध पुष्पादि से और धूप-दीपों से गजानन प्रभु का यजन करना चाहिए ।६७। पूर्व में अङ्गों का पूजन करके फिर आठ विघ्नों का अभ्यर्चन करे । उन आठों के नामों का परिगणन किया जाता है-विघ्न, विनायक, शूर, वीर, वरद, इभवक्त्र, एकदन्त, लम्बोदर ये आठ हैं । पीछे पत्रों के अग्र भागों में ब्रह्माणी आदिक का अर्चन करना चाहिए ।६६। लोकपालास्तदस्त्राणि विघ्नपूजासमीरिता । आज्यान्नैर्जुहुयान्नित्यमन्वन्वाक्वत्सराद्भवेत् । १०० पायसान्नेन महती श्रियमाप्नोति मानवः । आज्यहोमेन वशयेत्प्राणिनः सकलान्सुधीः ।१०१

२५४ ] [ श्रीशारदा तिलक नारिकेलफलं पक्वं लोष्ठचर्मसमन्वितम् । जुहुयात्प्रत्यं न्त्री मण्डलात्सिद्धिमाप्नुयात् ॥१०२ जुहुयादष्टाभिर्द्रव्यैर्मधुरत्रयसंयुतैः । वश्येत्पार्थिवान्सर्वान् तत्पत्नीविधिनाऽमुना ॥१०३ दिनादिषु चतुश्चत्वारिंशद्वारैः शुभोदकैः । तर्पयेद्विघ्नराजस्य मस्तके श्रीप्रसिद्धये ॥१०४ पाशांकुशौ कल्पलतां स्वदन्तं करैर्वहन्तं कनकाद्रिकान्तम्। सोपानपङ्क्त्या दिनानाथविम्बादायान्तमम्भोजगतं विचिन्त्य।१०५ इसके अनन्तर लोकपालों का तथा उनके आयुधों का यजन करना चाहिए । इस रीति से भगवान् विघ्नेश्वर की पूजा कही गयी है । आज्य और अन्न से नित्य होम करे तो एक वर्ष में अन्नवान हो जाया करता है ॥१००। पायस और अन्न से हवन करने से मानव बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । सुधी पुरुष आज्य के द्वारा हवन करके समस्त प्राणियों को अपने वश में कर लिया करता है ॥१०१। परिपक्व नारियल का फल जो लोष्ठ चर्म से संयुत होवे—मन्त्रधारी प्रतिदिन इससे होम करे तो एक मण्डल से सिद्धि को प्राप्त किया करता है । (यहाँ लोष्ठ शब्दमें अन्तर्वर्ती नारियल का ऊपर का भाग है और उसके ऊपर का भाग त्वचा है जिसको चर्म शब्द से कहा गया है) । मधुरत्रय से समन्वित आठ द्रव्यों से होम करे तो इस विधि से समस्त पार्थिवों को और उनकी पत्नियों को अपने वश में कर लेता है ॥१०२। १०३। दिन के आदि काल में शुभ जल से चौवालीस बार तर्पण करना चाहिए । श्री को प्रसिद्धि के लिए विघ्नराज के मस्तक में तर्पण करना चाहिए । श्री की प्रसिद्धि के लिए विघ्नराज के मस्तक में तर्पण करे ॥१०४। अब तर्पण करने से समय में विशेष ध्यान बतलाया जाता है - अपने करों से पाश-अंकुश-कल्पलता-अपना दाँत धारण करते हुए हैं और कनकाद्रिकान्त को वहन करने वाले हैं । सोपानों की पंक्ति के द्वारा दिननाथ के विम्ब से आगमन करते हुए हैं । और अम्भोज से स्थित हैं—ऐसा ही ध्यान करना चाहिए ॥१०५।

एकादश पटल ] [ २५५ प्रागुक्तमन्त्रसम्प्रोक्तान्प्रयोगाःमनुनाऽमुना । तैरस्तिन्नथवा प्रोक्तात् कुर्यान्मन्त्री विधानवित् ।१०६ पञ्चांतको विदुयुतो यामकर्णविभूषितः । तारादिहृदयांतोऽयं हेरम्बमनुरीरितः ।१०७ चतुर्वर्णांतमकी नृणां चतुर्वर्गफलप्रदः । षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि ममाचरेत् ।१०८ मुक्ताकाञ्चननीलकुन्दघुसृणच्छायैस्त्रिनेत्रान्वितै- र्नानास्यैर्हरिवाहन शशिधर' हेरम्बमर्कप्रभम् । दृप्तं दानमभीतिमोदकदर टङ्क' शिरोक्षात्मिकां मालां मदनमङ्कुशं त्रिशिखकदोभिर्दधान भजे ।१०६ लक्षत्रय जपेन्मन्त्र दशांशं जुहुवात्तिलैः । तीव्रादिपूजिते पीठे देवं हेरम्बमर्चयेत ।११० प्रणवः कवचद्वन्द्व' महासिंहाय ग ततः । हेरम्बेति पद पश्चादासनाय हृदन्वितः ।१११ अयमासनमत्रः स्यातत्रदंद्यादमुनाऽऽसनम् । तारादिविघ्नबीजेन मूर्ति तस्य प्रकल्पयेत ।११२ विधान का ज्ञाता मन्त्रधारी पुरुष इस मन्त्र के द्वारा पूर्व में कहे हुये प्रयोगों को अथवा इसमें कहे हुओं को उसके द्वारा करे ।१०६। पञ्चान्तक-गकार, नाम नेत्र, ऊकार, जो बिन्दु से युत हो, प्रणव आदि में हो और हृदय अन्त में-ऐसा हेरम्ब का मन्त्र कहा गया है ।१०७। यह चार वर्णोंके स्वरूप वाला मन्त्र है जो चतुर्वर्गके फल को देने वाला होता है। षट् दीर्घक् बीज के द्वारा छं अङ्गों का समाचरण करना चाहिए ।१०८। ध्यान—मुक्ता, काञ्चन नील कुन्द घुसृण-कुंकुम के सदृश कान्ति वाले नाग के मुखों से युक्त-तीन नेत्रों से समन्वित- हरि के वाहन वाले-चन्द्र के धारी-सूर्य की प्रभा से मुक्त— दृप्त, दान-अभय-मोद करोंमें धारण करने वाले-अक्षमाला, मदन-अंकुज और त्रिलिश को धारण करने वाले हेरम्बका मैं भजन करता हूँ ।१०६।

२५६ ] [ श्रीशारदा तिलक इस मन्त्र का तीन लाख जप करे और जप को दशांश तिलों से होम करना चाहिये । तीव्रा आदि से पूजित पीठकर हेरम्ब देव का अर्चन करे ।११०। प्रणव-कवच द्वन्द्व अर्थात् हुँ-हुँ और फिर ग, इसके पीछे हेरम्ब-यह पद आसन के लिये हृदन्वित होवे ।१११। यह आसन का मन्त्र होता है । इस मन्त्र से आसन अर्पित करना चाहिये । जिसके प्रणव कादि में होवे ऐसे विघ्न के बीज के द्वारा उनकी मूर्ति को प्रकल्पित करे ।११२। आवाह्य पूजयेत्तस्यामङ्गावरणसंयुतम् । वाह्ये लोकेश्वरा पूज्या वज्रादीनि ततः परम् ।११३ एवमभ्यर्चयेन्नित्यं साधयेत्स्वमभीप्सितम् । मोदकैर्जुहुयात्षष्ठ्यामष्टम्यां कृशरैस्तथा ।११४ चतुर्दशीदिनेऽपूपैर्यजुहुयाद्वाञ्छिताप्तये । एभिर्द्रव्यैः प्रजुहुयान्मन्त्रो पूर्वदिनेष्वपि । साधयेत्सकलान्कामान्यत्नेनैव साधकः ।११५ अम्भोजं प्रथमं लिखेद्वसुदलं मध्ये स्वबीजान्तरे । साध्याख्याम्बहिरङ्गमन्त्रविलसत्किञ्जल्कसंशोभितम् । पत्राणामुदरे विभज्य मुनिशो मालामनुं शेषिता- षड् वर्णंश्चरमे दले परिवृत शक्त्या शकारेण च ।११६ रोचनामदकाश्मीरैर्भूजपत्रे विलिख्य तत् । वेष्टित श्वेतसूत्रेण लोहैस्त्रिभिरपि क्रमात् ।११७ धारयेद्बाहुना यंत्र सर्वान्कामानवाप्नुयात् । शक्त्यङकुशोध्ववान्ते स्यात्स्वबीजं हृदयं ततः ।११८ सर्वविघ्नाधिपायन्ते ङेऽन्तं सर्वार्थसिद्धिदम् । प्रवदेत्सर्वदुःखप्रशमनाय पदं ततः ।११६ उस मूर्ति में आवाहन करके अङ्गावरण से समन्वित का अर्चन करना चाहिए । बाहिर में लोकेश्वरों का अर्चन करे और उनके बाहिर वज्रादि उनके आयुधों का यजन करे ।११३। इसी रीतिमें नित्य अर्चन

एकादश पटल ] [ २५७ करे और अपना अभीप्सित का साधन करना चाहिए । षष्ठी तिथि में मोदकों के द्वारा होम करे तथा अष्टमी में कृशरों से हवन करना चाहिए ।११४। चतुर्दशी तिथि में पूओं से वांछितों की प्राप्ति के लिये होम करना चाहिये । इस मन्त्र सहित द्रव्यों के द्वारा मन्त्रधारी पूर्व दिनों में भी आहुतियाँ देवे । साधक बिना ही पत्रों के सब कामों का साधन करे ।११५। सर्व प्रथम कमल का लेखन करे जिसमें आठ दल होवे । मध्य में अपने बीज के अन्तर में साध्य का नाम लिखे । जो अंक मन्त्रों से भूषित किञ्जल्क से संशोभित होवे । साध्य के साथ साधक और उसके कार्य को लिखना चाहिए । पत्रों के उदर में सात प्रकार से विभाग करके माला मन्त्र को शेषित वर्णों को अन्तिम दल में लिखे और शक्ति और प्रकार से परिवृत करे । रोचना मद और काश्मीर से भोज पत्र में उसे लिखे । फिर क्रम से सूत्र से और तीन लोहों से वेष्टित करे । इस मन्त्र बाँधी ‘वाह मे’ धारण करे तो साधक सभी कामनाओं को प्राप्त कर लिया करता है । शक्ति- अंकुश को ध्रुव के अन्त में लिखे फिर अपना बीज और हृदय लिखे, अन्त में चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले सर्व विघ्नाधिपाय लिखे तो यह सब अर्थों की सिद्धि का देने वाला होता है । इसके पश्चात् सर्वा दुःख प्रशमनाय-यह पद कहे ।११६-११९। एह्येहि भगवन्सर्व खादय स्तम्भय द्वयम् । भुवनेशी स्वबीजजाङ्ग नतिः पावकवल्लभाः ।१२० पुनरङ्कुशमायान्तं पञ्चपञ्चाशदक्षरः । मालामन्त्रेण मनुना प्रयोगान् साधयेत्सुधीः ।१२१ तारं खङ्गीश्वरः कूर्मो निःस्वरेणान्तईरित । ध्रुवे नतिः सप्तवर्णः सुब्रह्मण्यात्मकोमनुः । वह्निबीजेन षड्दीर्घयुक्तेनाङ्गक्रिया मता ।१२२ सिन्दूरारुणकान्तिमिन्दुवदनं केयूरहारादिभि- र्दिव्यैराभरणैर्विभूषिततनुं स्वगस्य सौख्यप्रदम् ।

२५८ ] [ श्रीशारदा तिलक अम्भोजाभयशक्तिकुक्कुटधरं रक्ताङ्गरागांशुकम् । सुब्रह्मण्यमुपास्महे प्रणमतां भीतिप्रणाशोद्यतम् ।१२३ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं साज्येन हविषा ततः । दशांशं जुहुयादन्ते ब्राह्मणानापि भोजयेत् ।१२४ धर्म्मादिकल्पिते पीठे वह्निमण्डलपश्चिमे । पूजयेद्विधिना देवमुपचारैर्यथोदितैः ।१२५ केसरेष्वङ्गपूजा स्यात्पत्रमध्यगतानिमान् । जयन्ताख्यमग्निवेश्यं कृत्तिकापुत्रसंज्ञकम् ।१२६ इसके अनन्तर ऐहि एहि भगवान् सर्व खाद्य और स्तम्भय-इन को दो-दो बार कहे । भुवनेशी का अपना बीज-ह्रीं गं-नतिः पावक वल्लभा अर्थात् स्वाहा कहे । फिर आमान्त अंकुश कहे-यह माला मन्त्र पचपन अक्षरों वाला होता है । इस माला मन्त्र के द्वारा साधक सुधी अपने प्रयोगों का साधन करे ।१२०-१२१। अब सुब्रह्मण्य मन्त्र को बतलाते हैं-प्रणव-खगीश-वः, कूर्म-चकार, निःस्वर-स्वर से हीन, णान्तः-तकार, भुवे यह स्वरूप हैं । फिर नति नमः-यह पद कहे-यह सुब्रह्मण्य के स्वरूप वाला मन्त्र सात वर्षों वाला होता है । षट् दीर्घ से युक्त वह्नि बाज से हङ्गक्रिया मानी गयी है ।१२२। अब ध्यान बतलाया जाता है-सिन्दूर के समान कान्ति से युक्त चन्द्र के समान मुख वाले-केयूर और हार आदि परम दिव्य भूषणों से विभूषित शरीर से समन्वित-स्वर्ग के सौख्य के प्रदान करने वाले -- करों से कमल, अभयदान-शक्ति और कुक्कुटको धारण करने वाले-रक्त अङ्गराग से युक्त वस्त्र वाले - प्रीति और प्रमाण को उद्यत रहते हैं जो प्रणाम करने वाले हैं ऐसे सुब्रह्मण्य देवकी हम उपासना करते हैं ।१२३। इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिये । और घृत के सहित हविसे जप का दशांश होम करे और अन्त में ब्राह्मणोंको भोजन करना चाहिये ।१२४। वह्नि मण्डल के पश्चिम में धर्म्मादि से कल्पित पीठ पर यथो- चित उपचारों के द्वारा विधि के साथ देवता का पूजन करना चाहिए । केसरों से अङ्ग पूजा करे तो ये पत्रों के मध्य संस्थित है ।१२५-१२६।

एकादश पटल } { २५६ अनन्तर भूतपतिं सेनान्यं गुहसंज्ञकम् । हेमशूलं विशालाक्षं शक्तिशूलकरान् यजेत् १२७ दिग्दलाग्रेषु पूर्बादि देवसेनापतिं पुनः । विद्यां मेधां ततो वज्रं कोणस्थान् शक्तिकुक्कुटौ १२८ मयूरं द्वीपमध्यचैद्वाह्ये लोकेश्वरान्पुनः । अस्त्राणि तेषामते स्युः सुब्रह्मण्यार्चनेरिता १२६ स्वादुभिर्भक्ष्यभोज्याद्यैः षष्ठ्यां संप्रीणयेद्विभुम् । पूजयेद्देवताबुद्ध्या कुमारब्रह्मचारिणः ।१३० सतानं विजयं वीर्यरक्षामायुः श्रियं यशः । प्रदद्यात्साधकस्याशु सुब्रह्मण्यः सुरार्चितः १३१। जपतर्पणपूजादौ विघ्नेश सर्वसिद्धिदम् । प्रीणयेदनया स्तुत्या प्राप्तये सर्वसम्पदाम् ।१३२ ॐ रूमामाद्यं प्रवदन्ति सन्तोवाचः श्रुतौ यामभियं गृणन्ति । गजाननं देवगणानताङ्घ्रि भजेऽहपद्धेन्दुकृतोवतसम् ।१३३ जयन्त-अग्नि वैश्य-कृत्तिका पुत्र-भूतपति-सेनान्य-गुह- हेम शूल-विशालाक्ष ओर शक्ति तथा त्रिशूल करों में रखने वालों का यजन करना चाहिये । १२७। दिग्दलों के पूर्व अग्र भागों में पूर्बादि देव सेनापति का यजन करे - विद्या-मेधा-वज्र और कोणों में स्थितों का- शक्ति और कुक्कुटों का, मयूर, द्वीप का अर्चन करना चाहिये फिर बाहिर में लोकेश्वरों का तथा उनके अन्त में अस्त्रों का अर्चन सुब्रह्मण्य के यजन में कहा गया है ।१२८-१२६। परम स्वादु भक्ष्य भोज्यों के द्वारा षष्ठी में विभु को प्रीणित करना चाहिए । देवता की बुद्धि से कुमार ब्रह्मचारियों का पूजन करना चाहिये ।१३०। सुरों के द्वारा समर्चन किये हुये सुब्रह्मण्य देव साधना करने वाले व्यक्तियों को शीघ्र ही सन्तति -विजय -दीर्घ - रक्षा -आयु -श्री-यश को देते हैं ।१३१। जप, तर्पण और पूजा आदि में समस्त सिद्धियों के प्रदाता विघ्नेश को प्रीणित करे । इस स्तुति के द्वारा उनको प्रसन्न करे