भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 511 में से

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एकादश पटल ] [ २६१ पुत्र का कौन विस्मरण किया करता है, अर्थात् कोई भी उसको भूल नहीं सकता है ।१३५। भगवान् शम्भु के जटाओं में निवास करने वाले गङ्गा के जल को अपने कर कमलों के द्वारा आदान करके लीला से समीपमें शिव का अर्चन करते हुए गजानन का भक्तिसे युक्त भक्तिगण भजन किया करते हैं ।१३६। कुमार अर्थात् स्वामि कार्तिकेय के द्वारा पर्वतराज की पुत्री के मुक्त पयोधरों को अपने लिये करों के सीकरोंके द्वारा मुग्धता से प्रक्षालन करते हुए उन गज के समान मुख वालों का मैं भजन करता हूँ ।१३७। हे गजास्य ! काल स्वरूप आपके द्वारा हस्त सूँड) को समृद्ध त करके पुष्कर (हाथी के सूँड का अग्रभाग) के रन्ध्र से मुक्त किये हुये सीकर हैं वे व्योम के आँगन में मोतियों के समान कान्ति वाले तारागण विचरण किया करते हैं ।१३८। गजास्य अर्थात् श्री गणेश के सागर में क्रीड़ारत होने पर जल समूह के वेग के अति- क्रमण करने पर देवगण कल्प का अवसान विचार करके कैलास के स्वामी की स्तुतियों के द्वारा स्तवन किया करते हैं ।१३६। नागानन (गणेश) के नाग (गज) का उत्तरीय वस्त्र करने पर क्रीड़ा में रत ही जाने से देव कुमारों के संघों के द्वारा तुम्हारे क्षण पर्यन्त कालगति का त्याग करके वे दोनो सूर्यचन्द्र कन्दुकता को प्राप्त हुए थे ।१४०। मदोल्लसत्पञ्चमुखैरजस्रमध्यापयन्तं सकलागमार्थान् । देवानृषीन् भक्तजनैकमित्रं हेरम्बमर्कारुजमाश्रयामि ।१४१ पादाम्बुजाभ्यामतिवामनाभ्यां कृतार्थयन्तं कृपया धरित्रीम् । अकारणं कारणमोप्तवाचां तं नागवक्त्रं न जहाति चेतः ।१४२ येनार्पितं सत्यवतीसुताय पुराणमालिख्य विषाणकोट्या। तंचन्द्रमौलेस्तनयं तपोभिरवाप्यमानन्दघनं भजामि ।१४३ पदं स्तुतीनामपदं श्रुतीनां लीलावतारं परमेष्टमूर्त्तेः। नागात्मको वा पुरुषात्मकोवेत्यभेद्यमाद्यं भज विघ्नराजम् ।१४४ पाशाङ्कुशौ भग्नरदं त्वभीष्टं करैर्दधानं कररन्ध्रमुक्तैः । मुक्ताफलाभैः पृथुसीकरोधैः सिंचत्समग्रं शिवयोर्भजामि ।१४५

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