शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ८, ब्रा० २, कँ० ६-१४ शतपथब्राह्मण / १६३ क्योंकि उस समय लेने का काम जारी था। अब कहा, 'ससृवांसम्' अर्थात् लिये हुए, क्योंकि जब लेने का काम पूरा हो चुका, इसलिए कहा 'ससृवांसम्' ॥६॥ अब वह अनुयाजों की आहुति देता है। इस यज्ञ द्वारा जिस-जिस देवता की आहुति दी गई और जिस-जिस के लिए यज्ञ किया गया, उनके लिए आहुतियां दी जा चुकीं। अब उन्हीं इष्ट देवों के लिए फिर आहुतियां देता है, इसलिए इसका नाम अनुयाज है। (जिस देवता के लिए यज्ञ हो चुका उस देवता को 'इष्ट' कहते हैं। अनुयाज का अर्थ है अनु+याज-'जो आहुति पीछे से दी जाय') ॥७॥ अनुयाज इसलिए किये जाते हैं। अनुयाज ही छन्द हैं। छन्द ही देवों के पशु हैं। जिस प्रकार पशु जुतकर मनुष्यों के लिए बोझ ले जाते हैं, उसी प्रकार छन्द भी युक्त होकर देवताओं के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। जब छन्दों ने देवों को तृप्त किया और देवों ने छन्दों को तृप्त किया, यह पहले था। अब युक्त छन्दों ने देवों तक यज्ञ को पहुँचाया और उनको तृप्त किया ॥८॥ और अनुयाज करने का यह भी कारण है—अनुयाज ही छन्द हैं। इस प्रकार वह इन (छन्दों) को तृप्त करता है, इसलिए अनुयाज करता है। जिस वाहन से यात्रा की उसी वाहन को छोड़कर कहते हैं—'इसको जल दो। इसको खाना दो।' और यही वाहन का तृप्त करना है ॥९॥ वह पहले बर्हि-यज्ञ करता है। छन्दों में सबसे पहले छोटा छन्द गायत्री बोला जाता है। छन्दों को पशु या वाहन कहा, इसलिए 'जोतना' शब्द प्रयुक्त हुआ, और यह है शक्ति (वीर्य) के कारण, क्योंकि यह श्येन होकर सोम को देवों तक ले गया था। अब इसको यथार्थ नहीं समझते कि छोटे-से गायत्री छन्द को छन्दों में सबसे पहले जोतें। इसीलिये अनुयाजों में देवों ने छन्दों को ठीक-ठीक कर दिया जिससे भूल न हो जाय ॥१०॥ अब सबसे पहले बर्हि-यज्ञ करता है। यह लोक ही बर्हि है। ओषधि बर्हि है। इस प्रकार इस लोक में ओषधियों को रखता है। वे ओषधियां इस लोक में स्थापित होती हैं। इस छन्द में सब 'जगत्' प्रतिष्ठित है, इसलिए इसको 'जगती' कहा। इसलिए उन्होंने जगती छन्द को पहले कहा ॥११॥ अब नराशंस-यज्ञ करता है। अन्तरिक्ष ही नराशंस है। प्रजा को नर कहते हैं। ये नर (मनुष्य) अन्तरिक्ष में बोलते हुए विचरते हैं। जब मनुष्य बोलता है तो कहते हैं 'शंसति', इसलिए अन्तरिक्ष को नराशंस कहा। अन्तरिक्ष ही त्रिष्टुप् है। इसलिए त्रिष्टुप् छन्द को दूसरा दर्जा दिया ॥१२॥ अब अग्नि अन्तिम है। गायत्री ही अग्नि है। इसीलिये गायत्री को अन्तिम दर्जा दिया। इस प्रकार उन्होंने छन्दों को यथार्थ दर्जों में प्रतिष्ठित कर दिया, जिससे भूल न हो ॥१३॥ अध्वर्यु कहता है, 'देवों के लिए यज्ञ करो', और होता इस प्रकार आरम्भ करता है, 'देवं, देवम्'। क्योंकि छन्द देवों के देव हैं, ये पशु हैं। पशु ही इनके घर हैं। घर ही प्रतिष्ठा हैं!