शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० १, अ० ८, ब्रा० ३, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १६५ अनुयाज ही छन्द हैं। इसीलिए अध्वर्यु कहता है कि 'देवों के लिए यज्ञ करो', और हर एक बार होता इस प्रकार आरम्भ करता है, 'देवं देवम्' ॥१४॥ अब कहता है—"वसुवने वसुधेयस्य" अर्थात् "वसुधा की अधिक प्राप्ति के लिए।" वषट्कार देवता के लिए ही होता है। देवता के लिए ही आहुति दी जाती है। परन्तु यहाँ अनुयाजों में कोई देवता नहीं है। जब वह कहता है—'देवं बर्हिः', तब न तो अग्नि है, न इन्द्र, न सोम, और जब कहता है—'देवो नराशंसः', तब भी कोई नहीं; और जो अग्नि है वह निदान में गायत्री ही है ॥१५॥ अब 'वसुवने वसुधेयस्य' कहने का प्रयोजन यह है कि अग्नि ही वसुवान् (धन को लेने- वाला) और इन्द्र ही वसुधेय (धन को धारण करनेवाला) है। छन्दों के देवता हैं इन्द्र + अग्नि। इस प्रकार देवता के लिए ही वषट्कार बोला जाता है और देवता के लिए ही आहुति दी जाती है ॥१६॥ अन्तिम अनुयाज में सब घी लाकर छोड़ देता है, क्योंकि यही प्रयाज और अनुयाज है। इसलिये वहाँ अनुयाजों में भी वह हानिकारक शत्रु से यजमान के लिए बलि दिलवाता है। जो खद्य है उससे बलि दिलवाता है। अनुयाजों में बलि दिलवाता है ॥१७॥ अध्याय ८—ब्राह्मण ३ अब वह दो स्रुचों (जुहू और उपभृत्) को अलग करता है इस मन्त्र से—"अग्नीषोम- योरुज्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि' (यजु० २।१५)—"अग्नि और सोम की जीत से मैं विजयी होऊँ। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" जुहू को पूर्व से सीधे हाथ से पूर्व की ओर हटाता है इस मन्त्र से—"अग्नीषोमौ तमपनुदतां योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि", (यजु० २।१५)—"अग्नि और सोम उसको हटा दें, जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। अन्न की इस प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" उपभृत् को बायें हाथ से पश्चिम की ओर हटाता है, यदि यजमान स्वयं हटावे तो इस प्रकार से ॥१॥ और यदि अध्वर्यु (हटावे तो वह कहेगा)—"अग्नीषोमयो रुज्जितिमनूज्जयत्वयं यजमानो वाजस्यैनं प्रसवेन प्रोहाम्यग्नीषोमौ तमपनुदतां यमयं यजमानो द्वेष्टि यश्चैनं द्वेष्टि वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि" (यजु० २।१५) — “अग्नि और सोम की जीत से यह यजमान विजयी होवें। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ। अग्नि और सोम उसको हटा दें जो इस यजमान से द्वेष करता है या जिससे यह यजमान द्वेष करता है। इस अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" यह पौर्णमास यज्ञ में ऐसा करता है, क्योंकि पौर्णमास यज्ञ अग्नि-सोम का है ॥२॥ अमावश्या में वह यह कहता है—"इन्द्राग्न्योरुज्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामीन्द्राग्नी तमपनुदतां योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि" (यजु० २।१५) —"इन्द्र और अग्नि की जीत से मैं विजयी होऊँ। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ। इन्द्र और अग्नि उसको हटा दें, जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। अन्न की इस प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" यह उस समय कहना चाहिए जब यजमान स्वयं कहे ॥३॥ और अध्वर्यु कहे तो इस प्रकार—"इन्द्राग्न्योरुज्जितमनूज्जयत्वयं यजमानो वाजस्यैनं प्रसवेन प्रोहामीन्द्राग्नी तमपनुदतां यमयं यजमानो द्वेष्टि यश्चैनं द्वेष्टि वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि।" "इन्द्र और अग्नि की जीत से यजमान विजयी होवे। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ। इन्द्र और अग्नि उसको हटा दें, जिससे यह यजमान द्वेष करता है या जो इस यजमान से द्वेष करता है। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" यह आमावास्य यज्ञ में होता है। इन्द्र और अग्नि ही अमावश्या के देवता हैं। इस प्रकार वह चमचों को भिन्न-भिन्न देवतों के लिए अलग करता है। यही कारण है कि वह इस प्रकार उनको अलग करता है ॥४॥ जो जुहू के पीछे यजमान होता है और उपभृत् के पीछे वह जो उससे शत्रुता करता है। इस प्रकार वह यजमान को पूर्व में लाता है, और जो उसका शत्रु है उसको वह पीछे हटा देता